The Token System827 / 1154

The Token System – Chapter 827

6 min read November 6, 2026

बंसी रुका। उसने अपनी टूटी कलाई की तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोला, "मन्नू, रामलाल के घर कोई पोता नहीं। रामलाल के तीन बेटे थे, सब मर गए। उसकी एक पोती थी — जो उसने भवानी के होम से बचाई थी।"

"तो पोता कौन है?"

"यही तो," बंसी ने काग़ज़ की तरफ़ देखा, "यही तो समझ नहीं आ रहा।"

तभी भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई — बूढ़ी, भारी, पर साफ़।

"वो पोता मैं हूँ।"

सब मुड़े। भीड़ के सबसे पीछे, सड़क के किनारे, एक औरत खड़ी थी — सफ़ेद साड़ी, सिर पर दुपट्टा, हाथ में लाठी। उमर पचास से ऊपर। चेहरा पहचाना-सा।

काकी ने छड़ी नीचे कर दी। "बीरा?" वो फुसफुसाईं।

औरत आगे आई। रुकी, मेरे सामने। फिर बोली, "तू मन्नू है? किशनचंद का बेटा?"

"हाँ।"

"मैं बीरा देवी हूँ।" उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "और ये काग़ज़ झूठ है। मैं रामलाल की पोती नहीं हूँ। मैं उसकी बहू हूँ। और रामलाल का कोई पोता नहीं था। उसकी एक ही संतान थी — मेरा बेटा अमर।"

भीड़ में सन्नाटा छा गया।

पर मेरे हाथ में टोकन फिर गरम हुआ। और इस बार उस पर एक नया शब्द उभरा।

"देख। पहले।"

मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उन्होंने भी टोकन देखा। उनका मुँह खुला रह गया।

"ये… ये वही टोकन है?" उन्होंने धीरे से पूछा।

"हाँ।"

"तो फिर," उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा, "मुझे पता है ये काग़ज़ किसने लिखा। ये लिखाई मेरे दराज़ में नहीं आई — ये मेरे दराज़ से गई थी। और जिसने भेजी, वो मेरे ही दफ़्तर में बैठता है।"

"कौन?"

"मेरा चपरासी। जो सुबह झाड़ू लगाता है। वो तीन दिन से गायब है।"

उसी वक़्त राजेंद्र ने ऊपर वाले आदमी को हथकड़ी पहनाई और उसकी जेब से कुछ निकाला — एक पुरानी चिट्ठी। उसने पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये तेरे नाम है," उसने कहा।

मैंने खोली। सिर्फ़ एक लाइन थी।

"अगर तू ये पढ़ रहा है, तो तेरे पास वो है जो मेरे पास है। आज रात छत पर आ। — तीसरा।"

"तीसरा?" मैंने चिट्ठी राजेंद्र को वापस थमाई। "तीसरा कौन?"

राजेंद्र ने कंधे उचकाए। "मुझे क्या पता। तेरे नाम आई है, तू जाने।"

बीरा देवी ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और मेरे पास आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ में कोई काँप नहीं।

"मन्नू," उन्होंने कहा, "अमर मेरा बेटा था। दस साल पहले भवानी के होम में भर्ती हुआ। तीन महीने में मर गया। बुखार बताया गया। पर मैंने उसका शरीर देखा था — गले पर निशान थे।"

काकी आगे आईं। "तू चुप क्यों रही दस साल?"

"डर के मारे। भवानी ने मुझे साफ़ कहा था — बोलूंगी तो अगली बार मेरी लाश उठेगी।" बीरा देवी ने लाठी घुमाई। "पर आज सुबह काकी ने मुझे बताया कि तेरा भी कोई अपना उसी होम में गया है। तो फिर डर खत्म।"

मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। वो अभी भी टोकन को घूर रहे थे।

"शेखर बाबू, वो चपरासी — उसका नाम?"

"रामदीन।" मैंने कहा। "नहीं, रुको। बंसी के भतीजे का नाम भी रामदीन है।"

बंसी ने हाथ उठाया। "मेरा भतीजा रामदीन तो सुबह से मेरे साथ है। पूरे दिन भीड़ में रहा।"

"तो दो रामदीन हैं," मैंने कहा। "शेखर बाबू, तुम्हारा चपरासी कैसा दिखता है?"

"पतला, लंबा, तेईस-चौबीस साल का होगा। बाईं आँख पर ज़ख्म का निशान।"

बंसी की आवाज़ अचानक रुंध गई। "बाईं आँख पर निशान… मन्नू, मेरे भतीजे की बाईं आँख पर भी निशान है। और वो पिछले तीन दिन से घर नहीं आया। मैंने सोचा थोड़ी नोकरी-चाकरी में लगा होगा।"

अब मेरा सिर घूमने लगा। भीड़ में लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे।

राजेंद्र ने पकड़े हुए पीली अँगूठी वाले आदमी का कंधा झकझोरा। "बोल, तेरा मालिक कौन है?"

वो आदमी मुस्कुराया। दाँत टूटा हुआ था। "मालिक अंदर बैठा है। बाहर वालों को क्या बताऊँ।"

"कौन अंदर?"

"जो तुम सबको यहाँ खींचकर लाया।" उसने ठुड्डी उठाकर भीड़ की तरफ़ इशारा किया। "ये सब जुट गए, तो मुझे यहीं पकड़ लिया। सोचो — किसे फायदा?"

"बकवास बंद कर।"

पर उसकी बात मेरे दिमाग़ में चुभ गई। मैं उस वक़्त भीड़ जुटाने में लगा था, पर मुझे भीड़ जुटाने का ख़्याल किसने दिया था?

रामदीन ने। बंसी के भतीजे ने। उसने कहा था — "चाचा, इतने लोग हैं, सबको बुला लो, भवानी की हवा खत्म कर दो।"

मैंने रामदीन को ढूँढा। भीड़ के कोने में वो एक दुकान की सीढ़ी पर खड़ा था, मोबाइल कान से लगाए, और उसके होंठ हिल रहे थे। मेरी नज़र उससे टकराई, तो उसने फ़ोन काटा।

"रामदीन!" मैंने आवाज़ दी।

वो सीढ़ी से उतरा, धीरे-धीरे मेरे पास आया। "क्या हुआ मन्नू भाई? काम हो गया न — शेखर बाबू मिल गए।"

"किससे फ़ोन पर बात कर रहा था?"

"घर से।" उसने मुस्कुराकर कहा। "माँ पूछ रही थी कब आऊँगा।"

उसकी बाईं आँख पर निशान साफ़ दिख रहा था। मैंने एक कदम आगे बढ़ा।

शेखर बाबू अचानक मेरे बगल से निकले। वो सीधे रामदीन के सामने जाकर खड़े हो गए।

"रामू," उन्होंने कहा। मेरी आवाज़ गई। वो उसे नाम से जानते थे।

रामदीन के चेहरे का रंग उतर गया। "बाबू, वो… इलाज हुआ क्या आपका? रामलाल के बाद…"

"मैंने तुझे कभी रामू नहीं कहा," शेखर बाबू ने कहा। "मैंने हमेशा रामदीन कहा है। तो तूने ये नाम कहाँ से पकड़ा?"

रामदीन पीछे हटा। दो कदम, तीन। उसकी नज़र गेट पर गई।

भवानी गेट पर ही खड़ा था। हथकड़ी लगी थी, दो सिपाही पकड़े थे। उसने रामदीन को देखा और धीरे से बोला, "चुप रह।"

रामदीन रुक गया।

बंसी आगे आया। "ये क्या है भाई? तू भवानी के साथ था?" उसकी आवाज़ टूट रही थी। "तेरी माँ मरी, तूने कहा था भवानी ने दवा के पैसे दिए। वो पैसे कहाँ से आ रहे थे?"

रामदीन ने मुँह खोला। फिर बंद कर दिया।

"बोल!" बंसी ने उसका कंधा पकड़ लिया। "बोल!"

"चाचा, वो…"

"रामदीन।" ये आवाज़ बीरा देवी की थी। वो बीच में आईं। "तू अमर को जानता था?"

रामदीन का शरीर कठोर हो गया।

"मैं…"

"तू उसी वार्ड में काम करता था न? दिन में। भवानी के यहाँ।" बीरा देवी की लाठी ज़मीन पर थपकी। "मेरा बेटा मरा, तू उसी रात ड्यूटी पर था। बोल — उस रात क्या हुआ था?"

रामदीन का चेहरा फूटने लगा। बंसी ने उसे छोड़ दिया। एक कदम पीछे हट गया।

रामदीन ने अपना हाथ उठाया, जैसे कुछ कहना चाहता हो। पर फिर वो मुड़ा और दौड़ा।

राजेंद्र ने चिल्लाया, "पकड़ो!"

दो सिपाही उसके पीछे भागे। मैं भी दौड़ने ही वाला था कि शेखर बाबू ने मेरा बाजू पकड़ लिया।

"मन्नू, रुक।"

"क्या?"

"वो भागेगा," शेखर बाबू ने धीरे से कहा। "गिरफ्तारी से बचने के लिए नहीं। वो बताने जा रहा है।"

"किससे?"

"अपने मालिक से।" उनकी आँखों में कुछ चमका। "और मालिक यहाँ नहीं है। मैं शर्त लगाता हूँ, ये तो बस पहला पत्ता है।"

रामदीन भीड़ के पीछे खो गया। सिपाही पीछे लगे थे।

मैं शेखर बाबू की तरफ़ मुड़ा। "तुम्हें कब पता चला कि तुम्हारा चपरासी रामदीन है?"

"आज शाम।" उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "जब मैंने ये लाइन पढ़ी और इसे दराज़ में रखे काग़ज़ों से मिलाया। रामदीन रोज़ मेरी मेज़ साफ़ करता था। मेरी डायरी का पन्ना फाड़ना उसके लिए खेल था। पर डायरी मेरी थी, लिखाई उसकी। और उस लिखाई की एक ख़ासियत है — मुझे तीन दिन पहले दिखी थी, जब उसने मेरे लिए एक रसीद लिखी।"

वो रुके। फिर बोले, "मगर मेरी समझ में एक बात नहीं आई। अगर ये लाइन उसने लिखी, तो उसने इसे दराज़ में छोड़ा क्यों? नष्ट कर देता।"

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