The Token System – Chapter 826
मैंने खिड़की की तरफ़ फिर देखा। शेखर बाबू कुर्सी पर सिर झुकाए बैठे थे। पर उनका एक हाथ अब खुला था — रस्सी ढीली पड़ी थी और वो धीरे-धीरे उसे अपने पैरों की तरफ़ खींच रहे थे।
तभी मेरे पीछे ज़मीन पर पैरों की आहट आई।
मैं मुड़ा।
सीढ़ी के नीचे, चारदीवारी से सटकर, एक बूढ़ा खड़ा था। सफ़ेद दाढ़ी, कंधे पर टाट, हाथ में लाठी — और लाठी पर उलटा कोना-चिह्न, जो मेरे टोकन के निशान का उल्टा था।
"मैंने कहा था न," उसने कहा, "हिसाब आदमी का होता है। आज हिसाब तुझे खींच रहा है, और तू नहीं जानता कि खींचने वाला कौन है।"
"तुम कौन हो?" मैंने पूछा।
"मैं वही हूँ," उसने कहा, "जो तेरे पापा के पीछे खड़ा था — और जिसे तेरे पापा ने कभी नहीं देखा।"
उसने लाठी उठाई और सीढ़ी पर रख दी।
"नीचे आ," उसने कहा। "मैं तुझे अंदर ले चलूँगा। और याद रख — अंदर जो औरत खिड़की से झाँक रही है, वो सरोज नहीं है।"
"तो कौन है?"
"वो," उसने धीरे से कहा, "बीरा देवी है। अमर की माँ। और आज वो अपने बेटे का हिसाब लेने आई है।"
मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ — एक बार, ज़ोर से।
॥
मैं सीढ़ी से उतरा ही था कि बूढ़े ने लाठी मेरे रास्ते में आड़ी कर दी।
"इतनी जल्दी?" उसने कहा। "जब देखो तोड़ने दौड़ता है। तेरे पापा भी ऐसे ही थे।"
"मेरे पापा को तुम जानते थे?"
"जानता था तो नहीं कहूँगा। पीछे खड़ा था, इसलिए पहचानता हूँ।" उसने टाट ठीक किया। "पर तू अभी अंदर नहीं जाएगा। जैसे अंदर जाना है, वैसे अंदर तीन आदमी हैं। तेरे पास डंडा है?"
"नहीं।"
"तो फिर मेरे साथ चल। बात करनी है।"
मैंने पीछे देखा। शेखर बाबू की खिड़की पर रोशनी कम थी। रामदीन गया था, पता नहीं पहुँचा या नहीं। मैंने जेब से फ़ोन निकाला और राजेंद्र का नंबर मिलाया।
"सुन रहे हो?" मैंने कहा।
"हाँ, बोल।"
"होम के पीछे बंद कमरे में शेखर बाबू हैं। ज़िंदा हैं। मैंने उन्हें खिड़की से देखा।"
दूसरी तरफ़ चुप्पी हुई। फिर राजेंद्र बोला, "पक्का?"
"पक्का। उन्होंने शीशे पर लिखकर बताया।"
"मन्नू, मैं तो यहाँ हूँ, पर वारंट लेकर भी अंदर घुसने के लिए मुझे औपचारिक शिकायत चाहिए। ज़बानी नहीं चलेगा। तू काग़ज़ लिखकर दे, सुबह मैं टीम लेकर आऊँगा।"
"सुबह?" मेरी आवाज़ निकल गई। "सुबह तक ये लोग काग़ज़ जला देंगे।"
"मेरे हाथ बँधे हैं।"
"अच्छा," मैंने कहा। "तो हाथ खोलो।"
फ़ोन काट दिया।
बूढ़ा मुझे देख रहा था। उसने कहा, "दरवाज़ा तोड़ेगा?"
"नहीं। भीड़ बनाऊँगा।"
उसने पहली बार हँसा। "ये ठीक है। भीड़ से डरते हैं ये लोग। पुलिस से नहीं डरते, काग़ज़ से नहीं डरते — भीड़ से डरते हैं।"
बंसी को फ़ोन किया। "दुकान के पीछे जो काकी की गली है, वहाँ से सबको बुला। ग्यारह परिवार वाले जो अदालत में गवाही दे चुके हैं — उनको भी। सुमन को बोल।"
"क्या करेगा?"
"होम के गेट पर खड़े हो जाओ। ख़ाली हाथ। कोई डंडा नहीं, कोई पत्थर नहीं। सिर्फ़ खड़े रहना है और बोलना है।"
"क्या बोलना है?"
"जो सच है। कि अंदर शेखर बाबू बंधे हैं।"
दस मिनट में दो दर्जन लोग होम के गेट पर थे। काकी सबसे आगे, सिर पर दुपट्टा, हाथ में छड़ी। रामकिशन की बहू पीछे। ग्यारह परिवारों के लोग — कोई चप्पल में, कोई कुर्ते में। सुमन सफ़ेद कोट में दौड़ी आई, उसका स्टेथोस्कोप अभी भी गले में था।
गेट पर दो आदमी खड़े थे। एक मोटा, दूसरा लंबा। लंबे ने गेट अंदर से बंद कर दिया।
"तोड़ो मत!" मैंने आवाज़ दी। "बस बोलो।"
काकी ने छड़ी उठाई और गेट पर मारी — एक, दो, तीन।
"शेखर बाबू!" वो चिल्लाईं। "शेखर बाबू! अंदर हो?"
कोई जवाब नहीं।
"शेखर बाबू!"
तभी अंदर से आवाज़ आई — दबी हुई, फटी हुई, पर साफ़।
"मैं यहाँ हूँ! पीछे के कमरे में! मेरे पास काग़ज़ हैं!"
भीड़ में हलचल मच गई।
"काग़ज़!" किसी ने कहा। "काग़ज़ हैं उनके पास!"
"तोड़ो!" काकी चिल्लाई।
गेट पर दो और आदमी आ गए। अब चार थे। पर भीड़ बढ़ रही थी। पीछे से सुमन की आवाज़ आई — "रहमान अली अस्पताल में भर्ती हैं, उनका काग़ज़ किसने छिपाया?"
"मेरी ज़मीन का काग़ज़!" रामकिशन की बहू चिल्लाई।
"मेरी बहन का!" किसी और ने कहा।
गेट लोहे का था, पर दो जगह से ज़ंग खाया था। काकी ने अपनी छड़ी उसी जगह मारी। छड़ी का सिरा अंदर चला गया।
तभी ऊपर की खिड़की खुली।
एक आदमी निकला — लंबा, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में पीली अँगूठी।
"यहाँ कोई बंद नहीं है!" वो चिल्लाया। "सब झूठ! कौन बंद है? दिखाओ!"
भीड़ ने शोर किया।
तभी सबसे पीछे, होम के किनारे से, एक दरवाज़ा खुला — वो छोटा दरवाज़ा जो रसोई से बाहर आता था।
वहाँ से शेखर बाबू निकले।
उनके हाथ आगे बँधे थे। मुँह पर कोई कपड़ा ढीला लटक रहा था। चश्मा नहीं था। पैर नंगे। एक कदम चले, फिर लड़खड़ा गए — पर नहीं गिरे। सीधे भीड़ की तरफ़ देखा।
"मैं," उन्होंने हाँफते हुए कहा, "मैं यहाँ तीन दिन से बंद हूँ। मेरे पास काग़ज़ हैं। लेकिन पहले मुझे पानी दो।"
काकी दौड़कर गईं। बंसी ने पानी की बोतल दी। शेखर बाबू ने पानी पिया, फिर मेरी तरफ़ देखा और बोले, "बेटा, सॉरी। मैं तीन दिन से तुझे ही कोस रहा था। सोचा तू ही ले गया।"
"अब मत सोचो," मैंने कहा। "अंदर कौन है?"
"वही," उन्होंने ऊपर देखा। "जो ऊपर खड़ा है। और उसके दो आदमी।"
तभी गली के मोड़ से सफ़ेद जीप आई। राजेंद्र उतरा, छह सिपाही, वारंट हाथ में।
"मन्नू!" वो चिल्लाया। "मैं शिकायत लिखवाकर आया हूँ, पर एक शर्त पर — तू गवाह है। जो देखा, सब बताएगा।"
"लिखवाइए," मैंने कहा।
राजेंद्र गेट के पास पहुँचा। ऊपर वाले आदमी ने बंदूक जैसा कुछ निकाला — नहीं, सिर्फ़ चाबी थी जो वो हिला रहा था। राजेंद्र ने एक इशारा किया। दो सिपाही गेट पर चढ़े, दो पीछे से।
गेट खुला।
शेखर बाबू ने मेरी बाँह पकड़ी। उनका हाथ काँप रहा था।
"वो," उन्होंने कहा, "वो ऊपर वाला जो है — वो भवानी का आदमी नहीं। उसके काग़ज़ में एक और नाम है। और वो नाम मैंने पहले भी देखा है।"
"कहाँ?"
"मेरे अपने अस्पताल की फाइलों में। रामलाल के केस में।"
मैं रुका। "रामलाल? वो जो अदालत में आया था, पोती के इलाज वाला?"
"हाँ। उसका नाम जब जज साहब ने सुना था, तब उन्होंने जाँच का ऐलान किया था। मुझे याद है।" शेखर बाबू ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला — वहाँ एक पतला लिफ़ाफ़ा सिला हुआ था। उन्होंने उसे फाड़ा, एक कोरा काग़ज़ निकाला और उलट दिया।
उसके पीछे एक लाइन लिखी थी, पेंसिल से, बहुत छोटे अक्षरों में।
"हिसाब का असली मालिक: रामलाल का पोता।"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद था।
"मुझे तीन दिन से यही समझ नहीं आ रहा," उन्होंने कहा। "ये लाइन मेरी नहीं है। मेरी लिखाई नहीं है। पर ये मेरे दराज़ में थी।"
"रामलाल का पोता?" मैंने कहा। "पर अदालत में तो रामलाल ख़ुद आया था। उसका पोता…"
मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया। इतना ठंडा कि मैंने हाथ जेब में डालकर उसे निकाला। उस पर अंक नहीं थे। सिर्फ़ दो शब्द थे।
"देख। वही।"
बंसी मेरे पास आया, हाँफ रहा था। "ऊपर वाला पकड़ा गया। उसके पास बहुत काग़ज़ थे — रजिस्टर, फाइलें। राजेंद्र सब सील कर रहा है।"
"बंसी," मैंने कहा, "रामलाल कौन है? असली में?"
बंसी ने मुँह बनाया। "रामकिशन का भांजा। तू जानता है न।"
"और उसका पोता?"
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