The Token System – Chapter 825
"भागो," उन्होंने आगे लिखा। "तीसरा तुम्हें देख रहा है।"
मेरे हाथ की उँगली जम गई। तीसरा। वो नाम जो हर काग़ज़ पर आता था, हर आवाज़ में बोलता था।
बंसी ने मेरा पैर खींचा।
"क्या हुआ?" उसने फुसफुसाया।
"शेखर बाबू अंदर हैं," मैंने कहा। "ज़िंदा हैं।"
रामदीन ने साँस छोड़ी — जैसे कोई बोझ उतरा हो।
"पर वो कह रहे हैं कि फँसाने की चाल है," मैंने कहा। "दरवाज़े पर तीन आदमी हैं।"
"तीन आदमी," बंसी ने कहा, "और हम तीन। हिसाब बराबर।"
"चुप," मैंने कहा। "रुको।"
क्योंकि मुझे उस वक़्त कुछ और सुनाई दिया था। होम की छत पर, पानी की टंकी के पास, हल्की-सी खड़खड़ाहट — जैसे कोई रस्सी खींच रहा हो।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। छत पर एक परछाई हिली। फिर रुक गई।
"नीचे उतरो," मैंने बंसी से कहा। "जल्दी।"
हम तीनों सीढ़ी से नीचे उतरे। चारदीवारी के साथ-साथ चलकर पीछे वाले फाटक तक आए। वहाँ पहुँचे तो फाटक खुला था — और बंद होने की जगह पर दो पैरों के निशान, कीचड़ में ताज़े।
"कोई हमारे पीछे आया है," रामदीन ने धीरे से कहा। "या हमारे आगे जा चुका है।"
बंसी ने अपनी टूटी कलाई उठाकर उस पैर के निशान पर रखी।
"बड़ा पैर," उसने कहा। "भारी आदमी। और सीधा अंदर गया है — होम की तरफ़।"
मेरे हाथ में फ़ोन था। स्क्रीन पर एक मैसेज आ चुका था — अनजान नंबर से।
"अंदर आ जाओ, मनोहर। तेरे पापा का काग़ज़ तेरे बिना नहीं खुलेगा।"
मैंने स्क्रीन बंद की। जेब से टोकन निकाला। वो अब गरम था — धीरे-धीरे, पर लगातार। जैसे किसी ने उसे आग के पास रख दिया हो।
"क्या लिखा है?" बंसी ने पूछा।
मैंने टोकन पलटा। उस पर दो शब्द उभरे थे, छोटे-छोटे, जैसे किसी ने सुई से खुरचे हों।
"अकेले नहीं।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो अब क्या?" उसने पूछा।
"अब," मैंने कहा और टोकन जेब में रखा, "हम वो करेंगे जो वो नहीं चाहता।"
मैंने फ़ोन उठाया और हरीश चंद्र को मिलाया। पाँच बजे का वक़्त था, पर घंटी दूसरी बार में उठी।
"मन्नू?" उनकी आवाज़ नींद में थी।
"वकील साहब," मैंने कहा, "शेखर बाबू मिल गए। भवानी के होम के पीछे बंद कमरे में हैं। राजेंद्र को वारंट चाहिए और मुझे आपकी आवाज़ चाहिए।"
"क्या करना है?"
"जज साहब से बात कीजिए। कहिए — गवाह अगर ज़िंदा है, तो सुनवाई में उसे पेश करना अदालत का काम है, पुलिस का नहीं।"
दूसरी तरफ़ चुप्पी हुई। फिर उन्होंने कहा, "तुम्हारे पापा भी ऐसे ही बोलते थे — सीधा और बेधड़क।"
फ़ोन कटा। मैंने बंसी को देखा। उसने अपनी टूटी कलाई को दुपट्टे से कसा और हँसा।
"तेरे पापा के ज़माने के लोग नहीं रहे," उसने कहा। "पर देख, अभी भी तीन बचे हैं — तू, मैं और रामदीन।"
रामदीन ने अपना डंडा उठाया। "मैं चौथा हूँ। और मेरी उमर कम नहीं हो रही।"
हम हँसे। पहली बार उस रात।
सुबह के साढ़े छह बजे थे, जब हरीश चंद्र का फ़ोन आया — जज साहब का आदेश आ गया था: होम के पीछे का कमरा खुलेगा, पर सिर्फ़ अदालत के नुमाइंदे और पुलिस की निगरानी में, और कमरे से निकला हर काग़ज़ सील होकर सीधा अदालत में जाएगा।
राजेंद्र सात बजे पहुँचा। छह सिपाही, एक सफ़ेद जीप। मैंने फ़ाटक पर उसका इंतज़ार किया।
"वारंट?" मैंने पूछा।
उसने जेब से मुड़ा काग़ज़ निकाला।
"जज साहब ने ख़ुद हस्ताक्षर किए हैं," उसने कहा। "पर एक बात, मन्नू — अंदर भवानी के आदमी हैं। मुझे गोली चलाने का हुक्म नहीं है।"
"चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी," मैंने कहा। "बस आप दरवाज़े पर खड़े रहिए और मेरी आवाज़ सुनिए।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा।
"तू अंदर क्या करेगा?"
"मैं अंदर नहीं जा रहा," मैंने कहा। "टोकन कह रहा है — अकेले नहीं। तो मैं पीछे की खिड़की पर जाऊँगा। और वो तीन आदमी जो दरवाज़े पर बैठे हैं, उन्हें कोई चाहिए जो उन्हें बाहर खींचे।"
बंसी ने हाथ उठाया।
"मैं खींचता हूँ," उसने कहा। "मेरे पास दुकान की सारी गालियाँ हैं।"
रामदीन ने डंडा टिकाया।
"और मैं?" उसने पूछा।
"आप," मैंने उसकी तरफ़ देखा, "आप अंदर जाएँगे।"
उसका चेहरा बदला।
"मैं?"
"आपके हाथ में एक चीज़ है," मैंने कहा। "बंद कमरे की कुंडी। चालीस साल पहले आपने वो कुंडी बनाई थी। आपको उसका पूरा नाप याद है। और शेखर बाबू को कोई ऐसा आदमी चाहिए जो उनका हाथ पकड़कर उठाए।"
रामदीन की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया और अपने डंडे को ज़मीन पर टिकाया।
"चल," उसने कहा। "काफ़ी देर हो गई।"
हम तीनों फिर उसी गली से गए। सात बजे की धूप पीली थी और होम की चारदीवारी पर पड़ रही थी। बंसी पहले सामने के फाटक पर गया। हम पीछे रुके।
दो मिनट बाद बंसी का फ़ोन आया।
"तीन आदमी फाटक पर आए हैं," उसने फुसफुसाया। "एक मोटा, दो पतले। मोटे के पास लोहे की छड़ है। मैंने अभी होम के कामगार वाले रास्ते से चक्कर काटकर ख़बर भेजी है कि पीछे की तरफ़ पुलिस आई है। वो देखने जा रहे हैं।"
"बस दो मिनट," मैंने कहा।
रामदीन सीढ़ी पर चढ़ा। मैं उसके पीछे। खिड़की का शीशा अभी वैसा ही था और अंदर शेखर बाबू कुर्सी पर बैठे थे। रामदीन ने शीशे पर अपनी हथेली टिकाई।
शेखर बाबू ने सिर उठाया। चश्मे के पीछे की आँखें एक पल के लिए रुकीं। फिर वो उठकर कुर्सी हिलाने लगे। रामदीन ने खिड़की का शीशा हाथ से खटखटाया और अपना डंडा ऊपर करके दिखाया — जिस पर पीतल की मुठिया थी।
शेखर बाबू की आँखें बड़ी हुईं। उन्होंने सिर हिलाया।
मैंने शीशे पर उँगली से लिखा — "कैसे?"
उन्होंने अपनी कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। फिर उँगली से हवा में कुछ बना कर बताया — पहले एक खड़ी लकीर, फिर दो आड़ी। मुझे समझ नहीं आया। फिर रामदीन ने मेरा कंधा दबाया।
"दीवार," उसने कहा। "वो कह रहे हैं कि कुंडी दीवार के अंदर है।"
"कैसे मिलेगी?"
रामदीन ने अपनी जेब से एक छोटी तार निकाली। "मैं चालीस साल पहले उस दरवाज़े का नाप लेकर आया था," उसने कहा। "इसलिए नहीं भूला कि कुंडी किस ऊँचाई पर है।"
फिर सीढ़ी से नीचे उतरा और मुझे देखा।
"तू खिड़की पर रह। अगर मैं पंद्रह मिनट में न आऊँ, तो बंसी को भेज।"
"आप अंदर कैसे जाएँगे?"
"पीछे की तरफ़ एक खिड़की है — रसोई के पास। उसका शीशा टूटा है। सिर्फ़ बच्चे के हाथ जितनी जगह है, पर मेरा डंडा जाएगा।"
वो चला गया। मैं खिड़की पर अकेला रह गया।
शेखर बाबू ने फिर शीशे पर उँगली रखी।
"दरवाज़ा। तीन आदमी। तीसरा और चालाक।"
मैंने सिर हिलाया।
"तुम अकेले?" उन्होंने लिखा।
"नहीं," मैंने लिखा।
उन्होंने सिर हिलाया और कुर्सी पर वापस बैठ गए।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। राजेंद्र की सफ़ेद जीप गली के मोड़ पर खड़ी थी। बंसी वहीं था, हाथ में तार वाला फ़ोन।
फिर कुछ हुआ।
होम के अंदर, पहली मंज़िल पर, एक खिड़की खुली — और उसमें से एक औरत का चेहरा दिखा। मैंने उसे नहीं पहचाना। वो एक पल के लिए रुकी, फिर खिड़की बंद कर दी।
मेरे हाथ अपने आप टोकन की तरफ़ गए। टोकन ठंडा हो रहा था।
"क्या हुआ?" बंसी ने फ़ोन पर पूछा।
"पहली मंज़िल पर एक औरत दिखी," मैंने कहा। "कोई और है अंदर।"
"औरत?"
"काले बाल, सफ़ेद कुर्ता।"
बंसी एक पल चुप रहा।
"मन्नू," उसने धीरे से कहा, "उस होम में सिर्फ़ एक औरत का सफ़ेद कुर्ता हो सकता है।"
"कौन?"
"सरोज। भवानी की बीवी। वो जो तीन साल से गायब है।"
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