The Token System – Chapter 824
मेज़ के नीचे, लकड़ी के तख़्ते के साथ, एक छोटा डिब्बा चिपका हुआ था — लोहे का, ज़ंग लगा। मैंने उसे खींचा। वो ढीला था।
अंदर — एक मोटी कॉपी, दो लिफ़ाफ़े, और एक छोटी पीतल की चाबी।
मैंने मोटी कॉपी खोली। पहले पन्ने पर एक ही लाइन — "ये वो काग़ज़ हैं जो भवानी के हर काग़ज़ को झूठा साबित करते हैं। मैं पच्चीस साल से इन्हें रोज़ छूता हूँ और रोज़ डरता हूँ। आज डर ख़त्म।"
मैंने कॉपी को उठाया। उसके नीचे एक पुरानी तस्वीर थी — तीन आदमी, हवेली के सामने, और उनके पीछे एक औरत खड़ी थी।
बंसी ने तस्वीर पर झुककर देखा।
"ये," उसने कहा और उँगली रखी, "ये तो तेरी माँ है।"
मैंने उसकी उँगली के नीचे देखा। औरत का चेहरा धुँधला था, पर आँखें — वही आँखें।
"माँ," मैंने धीरे से कहा।
मैंने कॉपी के पीछे का लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें एक ही काग़ज़ था — तीन लाइनें, शेखर बाबू की लिखाई में।
"मनोहर,
मैंने तेरे पिता से वादा किया था कि जब तक ज़िंदा हूँ, ये काग़ज़ भवानी को नहीं मिलेंगे।
आज मैं वो वादा नहीं निभा पा रहा।
तेरी माँ के नाम के नीचे जो लिखा है, उसे पढ़ना। और मुझे माफ़ करना।
— शेखर"
मैंने काग़ज़ पलटा।
नीचे, एक पुरानी स्याही में, चार लाइनें थीं। पहली लाइन में एक नाम — कौशल्या। दूसरी में — "हवेली की चौथी हिस्सेदार।" तीसरी में — "उसका हिस्सा उसके बेटे को, जो कभी हवेली में नहीं आया।" और चौथी — "जो इसे छिपाएगा, उसका नाम भी मिट जाएगा।"
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
"मन्नू," उसने कहा, "ये काग़ज़ अब तेरे पास है।"
"नहीं," मैंने कहा और काग़ज़ कॉपी में रखकर बंद किया। "ये काग़ज़ अब अदालत में जाएगा।"
हम बाहर दौड़े। गाड़ी में बैठे। घड़ी देखी — नौ बजने में बीस मिनट।
बंसी ने गाड़ी तेज़ की और पहली बार उसने कुछ नहीं कहा। बस सड़क खत्म होती गई और अदालत की इमारत सामने आने लगी।
अदालत के गेट पर भीड़ पहले से ज़्यादा थी। अख़बार वाले। पुलिस। और सीढ़ियों पर खड़ी सुमन, लाल बस्ता सीने से लगाए, मेरी तरफ़ देख रही थी।
गाड़ी रुकी। मैं दौड़ा। सुमन ने मेरी तरफ़ कदम बढ़ाया।
"मिल गया?" उसने पूछा।
मैंने कॉपी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"मिल गया," मैंने कहा। "और अब इसे अंदर ले चलते हैं।"
सुमन ने कॉपी ली। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी।
"शेखर बाबू?" उसने पूछा।
"राजेंद्र उनके पास गया है," मैंने कहा। "हम अंदर चलते हैं।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। पहली सीढ़ी पर मैंने पीछे मुड़कर देखा — सड़क के उस पार, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, और उसके शीशे से कोई मेरी तरफ़ देख रहा था।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। गाड़ी का शीशा ऊपर चढ़ा और वो चली गई।
सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मन्नू," उसने कहा, "अंदर।"
मैंने सिर हिलाया और सीढ़ियाँ चढ़ता रहा।
अदालत का दरवाज़ा खुला था। अंदर, बेंच के पीछे, जज साहब बैठे थे और उनके सामने हरीश चंद्र खड़े थे। कमरे में सन्नाटा था — पचास लोग, और सबकी आँखें दरवाज़े पर।
हम अंदर घुसे। सुमन ने लाल बस्ता और कॉपी सामने रखी।
जज साहब ने चश्मे से ऊपर देखा।
"मनोहर," उन्होंने कहा, "तुम्हारे पास क्या है?"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने कॉपी खोली और पहला पन्ना जज साहब की तरफ़ बढ़ाया।
"जज साहब," सुमन ने कहा, "ये वो काग़ज़ हैं जिनके लिए शेखर बाबू आज रात भवानी के होम गए थे।"
कमरे में एक आवाज़ उठी — किसी के उठने की, कुर्सी के खिसकने की।
मैं मुड़ा। पीछे की बेंच पर, सबसे आख़िरी कोने में, एक आदमी खड़ा हो रहा था — काले कुर्ते में, चेहरा छिपाए। उसने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया।
पहरा ने अपनी लाठी ज़मीन पर मारी।
"बैठ," उसने कहा। "हिसाब अभी शुरू हुआ है।"
आदमी रुक गया। फिर धीरे से बैठ गया।
जज साहब ने काग़ज़ पढ़ना शुरू किया।
॥
डिब्बा मेरे हाथ में था और टोकन अभी भी जेब में गरम हो रहा था, जब मेरा फ़ोन बजा। मैंने स्क्रीन देखी — माँ का नंबर था, पर आवाज़ दीपा की थी, और वो फूट-फूटकर रो रही थी।
"मन्नू भैया," वो बोली, "पापा का फ़ोन करने वाला कोई और था। वो मेरे पापा की आवाज़ नक़ल कर रहा था।"
"क्या कह रहा था?" मैंने पूछा।
"कह रहा था — शेखर बाबू, काग़ज़ तुम्हारी दराज़ में नहीं, हमारे पास हैं। ज़्यादा मत हिलो, वरना बेटी का पता भूल जाओगे।"
मेरी मुट्ठी अपने आप बंद हो गई। जो आदमी फ़ोन कर रहा था, वो शेखर बाबू के घर की दराज़ें जानता था। दराज़ें सिर्फ़ तीन आदमी जानते थे — शेखर बाबू, कम्मो देवी, और भवानी।
मैंने राजेंद्र को मिलाया। घंटी तीन बार बजी।
"मन्नू," उसकी आवाज़ में हवा की सनसनाहट थी, "मैं होम के फाटक पर खड़ा हूँ। भवानी थाने में बैठा है, आदमी बाहर खड़े हैं, और मैं बिना वारंट अंदर नहीं घुस सकता।"
"तो वारंट लो।"
"वारंट के लिए काग़ज़ चाहिए, और काग़ज़ अभी तुम्हारे हाथ में है, मेरे पास नहीं।" वो थोड़ा रुका। "सुबह साढ़े नौ बजे अदालत में सब कुछ है — मैं वहीं पहुँचता हूँ। उससे पहले किसी को कुछ नहीं होना चाहिए।"
"शेखर बाबू को हो सकता है।"
"तो जल्दी करो, मन्नू। और अकेले मत जाना।"
फ़ोन कटा। मैंने बंसी को देखा।
"रामदीन को बुला," मैंने कहा। "और दुकान का शटर गिरा।"
आधी रात हो चुकी थी। बंसी ने चाय बनाई, तीनों कप लेकर खटिया पर बैठे। रामदीन सामने बैठा था, हाथ जोड़े, सिर झुकाए।
"होम के पीछे एक बंद कमरा है," रामदीन ने धीरे से कहा। "पुराना। लोहे का दरवाज़ा। मैंने उस दरवाज़े को चालीस साल में खुलते एक बार देखा है।"
"दरवाज़ा कैसे खुलता है?" बंसी ने पूछा।
"बाहर से नहीं। अंदर से एक कुंडी है — पूरी पीतल की। जो अंदर होगा, वही खोलेगा।" उसने आँख उठाई। "इसीलिए कहते थे — जो अंदर गया, वो बोलता नहीं, सिर्फ़ हिसाब देता है।"
"तो हमें कुंडी तोड़नी पड़ेगी," बंसी ने कहा।
"कुंडी तोड़ने से दरवाज़ा नहीं खुलेगा," रामदीन ने सिर हिलाया। "पीछे एक खिड़की है — छोटी, हाथ भर। सलाखें नहीं, सिर्फ़ शीशा। जो अंदर हो, वो शीशे पर हाथ रख सकता है। बस।"
मैं खटिया से उठ गया।
"चलो," मैंने कहा।
हम तीनों गली से निकले। मन्नू का मन कह रहा था कि टोकन चुप है — न गरम, न ठंडा। यही सबसे डरावना था।
होम के पीछे की गली में कुत्ते बैठे थे, और कोई नहीं। चारदीवारी के पीछे, रसोई की खिड़की के नीचे, एक टूटी सीढ़ी पड़ी थी। रामदीन ने सीढ़ी टिकाई। बंसी ने फ़ोन की रोशनी जलाई और मुझे धक्का दिया।
"तू चढ़," उसने कहा। "तेरी उँगलियाँ छोटी हैं।"
मैं चढ़ा। खिड़की का शीशा धूल से भरा था। मैंने हथेली से पोंछा और अंदर झाँका।
कमरे के बीच एक कुर्सी थी। कुर्सी पर कोई बैठा था — सिर झुका, हाथ सामने बँधे, मुँह पर कपड़ा। मैंने शीशे पर उँगली से टक-टक की।
सिर उठा। चश्मा नाक पर टेढ़ा, काँच एक तरफ़ से टूटा — पर वो शेखर बाबू थे।
मेरी साँस रुक गई। मैंने शीशे पर हथेली रखी। वो कुर्सी से उठने की कोशिश करने लगे, हाथ बंधे थे, कुर्सी हिल गई। फिर वो खिड़की तक आए, अपना सिर शीशे से टिकाया और उँगली उठाई।
उन्होंने शीशे पर धूल के बीच लिखना शुरू किया — अक्षर उल्टे बन रहे थे, मुझे पढ़ने के लिए दिमाग़ पलटना पड़ रहा था।
"अंदर आओ मत। ये फँसाने वाली चाल है। दरवाज़े पर तीन आदमी हैं।"
मैंने हाथ हिलाया कि समझ गया। पर मैं वापस नहीं हटा।
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