The Token System – Chapter 823
"मन्नू भैया," उसने कहा — और फिर बोल नहीं पाई। गला रुंध गया।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"दीपा," मैंने कहा, "कब से?"
"रात से," उसने कहा। "पापा रात को सोए नहीं। मैंने देखा, वो बैठकर कुछ लिख रहे थे। फिर फ़ोन आया। मैंने सुना — वो किसी से ऊँची आवाज़ में बोले, 'नहीं, ये काग़ज़ मैं नहीं दूँगा,' और फिर बड़बड़ाते रहे।"
"क्या बड़बड़ाते रहे?" मैंने पूछा।
"मैं पूरा नहीं सुना," उसने कहा, "पर इतना सुना — 'भवानी के होम में कोई काग़ज़ है जो सब बदल देगा। मैं उसे लेने जा रहा हूँ।'"
बंसी ने कहा, "बेटा, क्या वो अकेले गए?"
दीपा ने सिर हिलाया। "मैंने कहा, पापा, मैं भी चलूँ? तो वो हँसे और बोले — 'तू सो जा, बेटा। सुबह तेरे भैया आएँगे, उन्हें चाय बना देना।' और फिर वो गए। और लौटे नहीं।"
"तेरे भैया?" मैंने पूछा।
"आप," उसने कहा, "पापा कहते थे — मनोहर मेरा दूसरा बेटा है।"
मुझे कुछ कहना था, पर आवाज़ नहीं निकली।
दीपा ने मेरी तरफ़ देखा और फिर धीरे से बोली, "मन्नू भैया, पापा ने जाने से पहले एक लिफ़ाफ़ा मेज़ पर छोड़ा था। मेरे नाम पर। मैंने खोला। उसमें बस एक पर्ची थी।"
"क्या लिखा था?"
दीपा ने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। मैंने उसे खोला। शेखर बाबू की लिखाई में एक ही लाइन थी — "दीपा, अगर मैं लौटूँ तो मुझे मत पूछना कि मैं कहाँ गया था। और अगर न लौटूँ तो मनोहर से कहना कि तीसरा कमरा — दूसरी मंज़िल — उत्तर वाली खिड़की।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"भवानी का होम," मैंने कहा। "दूसरी मंज़िल। उत्तर वाली खिड़की।"
"वो अकेले गया," बंसी ने कहा, "उस घर में जहाँ भवानी के आदमी रात-दिन बैठे हैं।"
"और उसके पास काग़ज़ थे," मैंने कहा, "जो सब बदल सकते हैं।"
दीपा फिर बोली, "मन्नू भैया, पापा ने एक और बात कही थी — जब मैंने पूछा कि आप क्या लेने जा रहे हैं, तो उन्होंने कहा, 'वो काग़ज़ जो भवानी के काग़ज़ों को झूठा साबित करेगा। मैं पच्चीस साल से उसे छिपाए बैठा था। अपनी जान बचाने के लिए। आज मैं नहीं छिपाऊँगा।'"
मैंने फ़ोन निकाला। हरीश चंद्र को मिलाया।
"हरीश चंद्र जी," मैंने कहा, "शेखर बाबू रात को भवानी के होम गए हैं। अकेले। कुछ काग़ज़ लेने। वो अब तक नहीं लौटे।"
दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर हरीश चंद्र की आवाज़ — इस बार साफ़, तेज़।
"मनोहर," उन्होंने कहा, "तुम अभी उस घर में मत जाओ। मैं जज को फ़ोन करता हूँ और राजेंद्र को भेजता हूँ। तुम सीधे अदालत पहुँचो। नौ बजे तक।"
"पर शेखर बाबू—"
"मनोहर," उन्होंने कहा, "शेखर बाबू मेरे दोस्त हैं। और मैं तुम्हें उस घर में अकेले नहीं भेजूँगा। अदालत पहुँचो। अगर उन्हें कुछ हो गया, तो उनकी गवाही उनकी फ़ाइल बोलेगी। और वो फ़ाइल तुम्हारे पास है।"
मैंने सुमन को याद किया। लाल बस्ता उसके पास था।
"हरीश चंद्र जी," मैंने कहा, "शेखर बाबू की सबसे बड़ी फ़ाइल अभी सुमन के पास है। वो अदालत जा रही है।"
"तो फिर ठीक है," उन्होंने कहा। "अदालत पहुँचो। और मनोहर — अगर शेखर पच्चीस साल से उस काग़ज़ को छिपाकर रख रहा था, तो वो काग़ज़ उस घर में नहीं, बाहर है। शेखर उतना बेवकूफ़ नहीं है कि उसे अपने साथ ले जाए।"
फ़ोन कटा।
मैंने दीपा की तरफ़ देखा। वो सामने खड़ी थी, दोनों हाथ जोड़े हुए।
"दीपा," मैंने कहा, "तू घर के अंदर जा और दरवाज़ा बंद कर ले। किसी को भी मत खोलना, सिवाय पुलिस के।"
"और पापा?"
"मैं उन्हें लेकर आऊँगा," मैंने कहा।
वो मेरी आँखों में देखती रही। फिर सिर हिलाया और अंदर चली गई। दरवाज़ा बंद हुआ। कुंडी की आवाज़ आई।
मैं कार की तरफ़ बढ़ा। बंसी ने पीछे से कहा, "अब?"
"अदालत।"
"और शेखर बाबू?"
मैंने कार का दरवाज़ा खोला और उसकी तरफ़ मुड़ा।
"हरीश चंद्र ने एक बात कही जो सही है," मैंने कहा। "शेखर बाबू काग़ज़ अपने साथ नहीं ले गए होंगे। वो उस घर में गए, काग़ज़ लेने। अगर उन्हें वो मिल गया, तो वो उसे कहीं छिपाएँगे। और अगर नहीं मिला, तो वो उसी को ढूँढ रहे हैं जो हम ढूँढ रहे हैं।"
"क्या मतलब?"
"पच्चीस साल से वो जिस काग़ज़ को छिपाकर बैठे थे," मैंने कहा, "वो काग़ज़ उन्होंने कभी किसी को नहीं दिखाया। न भवानी को, न हरीश चंद्र को, न मुझे। आज रात वो उसे लेने गए — मतलब वो काग़ज़ उनके पास पहले से था। भवानी के होम में नहीं। वहाँ कुछ और है जो उन्हें उस काग़ज़ तक ले जा सकता था।"
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।
"तो फिर हम अदालत जा रहे हैं," उसने कहा, "और शेखर बाबू उस घर में अकेले हैं?"
"नहीं," मैंने कहा और कार में बैठ गया। "हम अदालत जा रहे हैं, और शेखर बाबू के पास जाने वाला कोई और है।"
मैंने फ़ोन पर एक नंबर मिलाया — राजेंद्र का।
एक घंटी। दो घंटी।
"बोलो।"
"राजेंद्र," मैंने कहा, "शेखर बाबू भवानी के होम में हैं। रात से। अकेले। उनका फ़ोन बंद है।"
दूसरी तरफ़ कुछ देर चुप्पी। फिर उसकी आवाज़ — वो आवाज़ जो मैंने कभी नहीं सुनी थी, सख़्त और सीधी।
"कितने आदमी हैं वहाँ?"
"पता नहीं। कम से कम दस।"
"मेरे पास छह हैं। मैं चार और बुला रहा हूँ। तुम कहाँ हो?"
"रास्ते में। अदालत जा रहा हूँ। हरीश चंद्र ने कहा है—"
"हरीश चंद्र ने ठीक कहा है," राजेंद्र ने कहा। "तुम अदालत पहुँचो। गवाही रुकनी नहीं चाहिए। और सुनो — अगर उन्होंने शेखर बाबू को कुछ किया, तो उस घर का हर काग़ज़ ज़ब्त होगा। हर एक।"
फ़ोन कटा।
मैंने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। सड़क खाली थी। सुबह की धूप पेड़ों से छनकर आ रही थी। बंसी चुपचाप गाड़ी चला रहा था।
"बंसी," मैंने कहा।
"हूँ।"
"अगर वो काग़ज़ शेखर बाबू के पास पच्चीस साल से था," मैंने कहा, "तो वो उन्होंने कहाँ छिपाया होगा?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। गाड़ी की रफ़्तार धीमी हुई।
"उस आदमी के पास ज़्यादा जगह नहीं थी," उसने कहा। "छोटा घर। दफ़्तार भी। पर वो पच्चीस साल से जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरता था, उसे ऐसी जगह रखेगा जहाँ कोई ढूँढने की सोच भी न करे।"
"कहाँ?"
बंसी ने कुछ सोचा। फिर बोला, "उसकी मेज़। वही मेज़ जिस पर उसने पच्चीस साल काम किया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"जिस मेज़ के नीचे वो बैठता था," बंसी ने कहा, "उसी मेज़ के नीचे। चलो, जल्दी चलो। अदालत पहुँचने से पहले एक बार अस्पताल का रिकॉर्ड कमरा।"
मैंने फ़ोन निकाला। सुमन को मिलाया।
"सुमन," मैंने कहा, "तू अदालत पहुँच गई?"
"हाँ। हरीश चंद्र यहाँ हैं। पहरा भी। बंसी का भतीजा भी।"
"सुन," मैंने कहा। "शेखर बाबू रात को भवानी के होम गए थे। फ़ोन बंद है। राजेंद्र जा रहा है। और मैं और बंसी एक बार अस्पताल लौट रहे हैं — रिकॉर्ड कमरे में। शेखर बाबू की मेज़ के नीचे कुछ हो सकता है।"
दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर सुमन की आवाज़ — धीमी, पर मज़बूत।
"मन्नू," उसने कहा, "अगर तुम साढ़े नौ बजे तक नहीं पहुँचे, तो मैं गवाही दूँगी। तुम्हारे बिना।"
"मैं पहुँचूँगा।"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा। "पर मैं बता रही हूँ — अगर नहीं पहुँचे, तब भी गवाही होगी। तेरी ज़रूरत नहीं। तेरा हिसाब मैं चुका दूँगी।"
फ़ोन कटा। मैंने उसे जेब में रखा।
बंसी ने गाड़ी तेज़ की।
अस्पताल का रिकॉर्ड कमरा अब भी खुला था। हम दौड़ते हुए गए। सीढ़ियाँ, गलियारा, दरवाज़ा।
मैंने शेखर बाबू की मेज़ के नीचे हाथ डाला।
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