The Token System – Chapter 822
सुनाई दिया — घंटी बज रही है। दूर, किसी कमरे में। कोई उठा नहीं।
"शेखर बाबू?"
घंटी बजती रही। फिर लाइन कट गई।
मैंने फिर मिलाया। इस बार बूँद-बूँद सुनाई दी — कोई फ़ोन मेज़ पर पड़ा है और उसके आस-पास कुछ नहीं है। इतना सन्नाटा कि बूँद की आवाज़ भी चुभ रही थी।
"क्या हुआ?" सुमन ने पूछा।
"शेखर बाबू का फ़ोन है," मैंने कहा, "पर वो उठा नहीं रहे। उनकी गवाही साढ़े नौ बजे है। अब साढ़े आठ हैं। वो कभी बिना बताए नहीं रुकते।"
बंसी ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और मिलाया।
"मेरी भी घंटी जा रही है," उसने कहा। "उठाते नहीं।"
सुमन ने कहा, "मैं अंदर जाकर राजेंद्र को बता दूँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "पहले देख लें। शायद वो सिर्फ़ रिकॉर्ड कमरे में बैठे हों और फ़ोन वहीं छूटा हो।"
मैं सीढ़ियाँ उतरा। कम्मो देवी ने पीछे से कहा, "मन्नू, ये डिब्बा—"
"आप इसे लेकर हरीश चंद्र के पास चली जाइए," मैंने कहा। "साढ़े नौ बजे सुनवाई है। मैं किसी को भी यहाँ से जाने नहीं दूँगा — एक बार शेखर बाबू को देखकर आ जाऊँ।"
पहरा अपनी लाठी टिकाए खड़ा रहा।
"मैं तेरे साथ चलता हूँ," उसने कहा।
"आप अदालत में रहिए," मैंने कहा। "अगर भवानी का कोई आदमी सुनवाई रोकने की कोशिश करे, तो आपका वहाँ होना ज़रूरी है।"
वो कुछ सोचकर रुक गया। फिर बोला, "जल्दी लौटना। नौ बजे अदालत का दरवाज़ा बंद हो जाएगा तो मैं नहीं खुलवा पाऊँगा।"
मैं, बंसी और सुमन उलटे पाँव अस्पताल की तरफ़ चले। कम्मो देवी उस लड़के के साथ हरीश चंद्र के दफ़्तार की तरफ़ मुड़ गईं।
अस्पताल का गलियारा सुबह-सुबह खाली था। नीचे इमरजेंसी में एक बूढ़ी औरत दवा लेने आई थी, बाकी सब सुनसान।
रिकॉर्ड कमरे का दरवाज़ा खुला पड़ा था।
मैं रुका। बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
"देख," उसने धीरे से कहा, "दरवाज़े का ताला टूटा नहीं है। खुला है।"
मैं अंदर गया। मेज़ पर काग़ज़ बिखरे थे — फ़ाइलें, रजिस्टर, पुरानी रसीदें — सब इस तरह गिरे जैसे किसी ने हाथ मारकर उठाया हो। और उसी मेज़ पर, बीच में, शेखर बाबू का चश्मा पड़ा था। एक काँच टूटा हुआ। चश्मे के पास चाय की प्याली — आधी भरी, ऊपर पपड़ी जमी। हाथ लगाया तो प्याली ठंडी थी।
"ये घंटों पुरानी है," सुमन ने कहा। "सुबह की नहीं।"
कुर्सी पीछे धकेली हुई थी, फ़र्श पर। जैसे कोई उठकर खड़ा हुआ हो — या खींचा गया हो।
मैं झुका। फ़र्श पर चश्मे की एक टूटी काँच की कनी पड़ी थी और उसके पास मिट्टी के जूते का एक निशान — छोटा, गोल।
"यहाँ कोई आया था," सुमन ने कहा। "और शेखर बाबू ने उसे रोकने की कोशिश की।"
बंसी दरवाज़े पर खड़ा होकर बाहर गलियारे में देख रहा था।
"गलियारे में कोई नहीं," उसने कहा। "और नीचे गेट पर वो पुराना चौकीदार है — वो सो रहा है।"
मैंने मेज़ की दराज़ खींची। कुछ काग़ज़, एक पुरानी कलम, और सबसे ऊपर एक छोटी पर्ची — शेखर बाबू की साफ़ लिखाई में। मैंने उसे उठाया।
पर्ची पर लिखा था — "अगर मैं न पहुँचूँ तो हरीश चंद्र को बताना। काग़ज़ लाल बस्ते में हैं। और बेटी का फ़ोन नंबर मेरी डायरी में है।"
"मतलब वो जानते थे," सुमन ने कहा। "उन्हें पता था कि कुछ हो सकता है।"
"और उन्होंने मुझे नहीं बताया," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ में जो था, वो सुमन समझ गई। उसने कहा, "मन्नू, वो आदमी पचपन साल से डर में जी रहा था। डरा हुआ आदमी भरोसा करना सबसे आख़िर में सीखता है।"
मैंने कमरे में चारों तरफ़ देखा। अलमारी के पीछे, एक कोने में, लाल कपड़े का बस्ता पड़ा था — आधा छिपा, जैसे जल्दी में धकेल दिया गया हो।
मैंने उसे खोला। अंदर — हवेली की एक पुरानी चाबी, तीन मोटे लिफ़ाफ़े, और एक छोटी कॉपी। लिफ़ाफ़ों पर तारीख़ें लिखी थीं। और कॉपी के पहले पन्ने पर एक ही लाइन — "जब मेरी ज़रूरत पड़े, ये काग़ज़ मेरी जगह बोलेंगे।"
सुमन ने लिफ़ाफ़ों को उलटा। सबसे पुराने पर तारीख़ थी — पाँच साल पहले की। और उस पर शेखर बाबू की लिखाई में एक नाम — मोहन।
"ये वही मोहन है?" मैंने पूछा।
सुमन ने काग़ज़ खोला और पढ़ने लगी। उसका चेहरा बदल गया।
"मन्नू," उसने कहा, "यहाँ लिखा है — 'मोहन को भवानी के होम भेजा गया, क्योंकि वो असली काग़ज़ जानता था। उसकी मौत की खबर मुझे तीसरे दिन मिली। मैंने डर के मारे कुछ नहीं कहा।'"
सुमन ने काग़ज़ नीचे रखा।
"मैंने उस औरत से कहा था," उसने धीरे से कहा, "कि मुझे नहीं पता था कि वो बचेगा या नहीं। झूठ कहा था। मुझे पता था। मैं यही जानती थी।"
बंसी ने दरवाज़े से कहा, "मन्नू, ये काग़ज़ बाद में। अभी शेखर बाबू कहाँ हैं, ये सोच।"
वो सही कह रहा था।
मैंने फ़ोन निकाला। हरीश चंद्र का नंबर मेरे पास था — कल रात उनके दफ़्तार में मिला था।
घंटी तीन बार बजी। फिर आवाज़ — "हरीश चंद्र बोल रहा हूँ।"
"हरीश चंद्र जी," मैंने कहा, "मनोहर बोल रहा हूँ। शेखर बाबू का फ़ोन बंद है। रिकॉर्ड कमरा खुला मिला, काग़ज़ बिखरे हैं, उनका चश्मा टूटा पड़ा है, और एक पर्ची मिली है जिसमें लिखा है कि अगर वो न पहुँचें तो आपको बताऊँ।"
दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर हरीश चंद्र की आवाज़ — धीमी, सधी हुई, पर अंदर से काँपती।
"मनोहर," उन्होंने कहा, "शेखर पच्चीस साल से रोज़ सुबह साढ़े आठ बजे मेरे दफ़्तार के बाहर से गुज़रता है। आज नहीं गुज़रा। मैंने सोचा देर होगी। तुम्हारी बात सुनकर लगता है कुछ गड़बड़ है।"
"आप क्या कहते हैं?"
"मैं कहता हूँ," उन्होंने कहा, "तुम सीधे उसके घर जाओ। उसकी बेटी अकेली है। और मनोहर — सुनो — अदालत का वक़्त मत गँवाओ। अगर साढ़े नौ बजे तक तुम वापस नहीं पहुँचे, तो सुनवाई मेरे भरोसे। मैं जज को बता दूँगा कि एक गवाह के साथ कुछ हुआ है।"
"ठीक है।"
फ़ोन रखकर मैंने सुमन और बंसी की तरफ़ देखा।
"मैं शेखर बाबू के घर जा रहा हूँ," मैंने कहा। "तुम दोनों अदालत जाओ।"
"मैं तेरे साथ चलूँगा," बंसी ने कहा।
"नहीं। अदालत में तेरा होना ज़रूरी है। तू वहाँ जो गवाह है—"
"अदालत में मेरी गवाही मेरे भाई की है," बंसी ने कहा। "पर तू अकेला जाएगा और तुझे कुछ हो गया, तो मेरी गवाही का क्या फ़ायदा?"
मैं रुक गया। वो सही कह रहा था।
"ठीक है," मैंने कहा। "सुमन, तू अदालत जा। पहरा वहाँ है, हरीश चंद्र वहाँ है।"
सुमन ने लाल बस्ता मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये तेरे पास रहेगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "ये तेरे पास रहेगा। अगर मैं न पहुँचूँ, तो यही काग़ज़ तेरी गवाही बनेंगे।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर बस्ता अपने सीने से लगाया और सिर हिलाया।
"तू लौट," उसने कहा। "नौ बजे तक।"
मैं और बंसी अस्पताल से निकले। बाहर बंसी की नीली कार खड़ी थी।
"तेरी कार?" मैंने पूछा।
"भतीजे की है," उसने कहा। "उसने चाबी दी है। बोला — चाचा, आज तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी।"
हम बैठे। कार सड़क पर निकली।
शेखर बाबू का घर पुरानी बस्ती में था — तंग गली, जिसके आख़िर में पीली दीवार वाला दो कमरे का मकान। मैंने उसे कभी अंदर से नहीं देखा था। बस एक बार दरवाज़े से सिर झाँका था, जब शेखर बाबू ने मुझे कोई फ़ाइल दी थी।
कार गली के मोड़ पर रुकी। दूर, दरवाज़े पर एक लड़की बैठी थी — दीपा। स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में। उसके हाथ में फ़ोन था और वो उसे बार-बार मिला रही थी।
हम पास पहुँचे। वो उठी। उसकी आँखें लाल थीं।
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