The Token System – Chapter 809
मैंने टोकन जेब में रखा — वो अब भी उल्टा कोना दिखा रहा था, पर उसके नीचे की लकीर कुछ गहरी हो गई थी, जैसे कोई नाम उभरना चाह रहा हो और न उभर पा रहा हो।
"अब," मैंने कहा, "हमें उससे पहले उस आदमी को ढूँढना है।"
सुमन ने छोटू की तरफ़ देखा — बच्चा अब भी साँस ले रहा था, धीमी, पर लगातार। "पहले मेरा काम," उसने कहा। "और मैं तुम्हारी मदद करूँगी, पर एक शर्त पर। जो भी हो, ये सिर्फ़ मेरे हाथ से बाहर जाएगा।"
बाहर गलियारे में अचानक हलचल बढ़ी — किसी ने किसी को डॉक्टर बुलाने को कहा। मैंने दरवाज़े से झाँका। दो सफ़ेद कुर्ते वाले लोग स्ट्रेचर लेकर भाग रहे थे, और उनके पीछे एक औरत चिल्ला रही थी — "मेरा बच्चा! मेरा बच्चा!"
सुमन दौड़ी। मैं भी पीछे-पीछे।
स्ट्रेचर पर एक लड़का था — पाँच-छह साल का, आँखें बंद, होंठ नीले। औरत उसे पकड़कर रो रही थी। सुमन ने स्ट्रेचर रुकवाया और नाड़ी देखी। फिर उसका चेहरा मेरी तरफ़ उठा।
"मन्नू," उसने कहा, "ये वही लक्षण हैं। बिल्कुल वही।"
मैंने टोकन जेब में महसूस किया — वो एक बार फिर गरम हो गया था। और इस बार उस पर एक शब्द था, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — "रोको।"
सुमन ने स्ट्रेचर को गलियारे के बीच में रुकवा दिया। "इसे वार्ड में मत ले जाओ," उसने सफ़ेद कुर्ते वालों से कहा। "यहीं रोको।"
"मैडम, डॉक्टर को—"
"मैं डॉक्टर हूँ।" सुमन ने लड़के की कलाई पकड़ी, आँखें झुकाकर देखीं। "बच्चे को उल्टी हुई थी?"
औरत सिसकते हुए बोली, "रात को। दो बार।"
"और क्या दिया तुमने उसे?"
"कुछ नहीं! बस…" औरत की नज़र गलियारे के कोने पर पड़ी और वो चुप हो गई।
सुमन ने उसकी ठुड्डी पकड़कर चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया। "बस क्या?"
"वो आदमी आया था," औरत ने होंठ काँपते हुए कहा। "सफ़ेद कुर्ता। कहा था बच्चा कमज़ोर है, ताक़त का इंजेक्शन लगा दूँगा। पैसे नहीं लिए। बस अँगूठा लगवाया एक काग़ज़ पर।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया। "आज?" मैंने पूछा। "आज आया था?"
"कल रात।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो शब्दों में नहीं आता। फ़तेह भागा नहीं था। फ़तेह अभी भी इसी अस्पताल के अंदर था, और वो काम कर रहा था।
"स्ट्रेचर वापस वार्ड में ले जाओ," सुमन ने कहा। "पर एक शर्त — कोई भी सफ़ेद कुर्ते वाला, जो तुम्हें न पहचानता हो, बच्चे के पास नहीं आएगा। समझे?"
वो दोनों सिर हिलाकर चले गए।
मैंने सुमन का हाथ पकड़कर उसे गलियारे के किनारे खींचा। "सुन," मैंने धीरे से कहा, "अगर फ़तेह अंदर है, तो वो किसी और का कुर्ता पहनकर निकल सकता है। हमें हर बाहर जाने वाले दरवाज़े पर आदमी चाहिए।"
सुमन ने अपनी जेब से टूटी शीशी निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "इसे ले। मुझे बच्चे के पास जाना है। और मन्नू—" उसने मेरी आँखों में देखा, "—काकी को अपने साथ रखना। वो इस अस्पताल की हर दीवार जानती है।"
मैं कमरे में लौटा। बंसी दरवाज़े पर खड़ा था, उसका भतीजा उसके पीछे। अमृता कुर्सी पर बैठी थी, हाथ गोद में, आँखें लाल।
"बंसी," मैंने कहा, "तुम्हारे भतीजे को बाहर का दरवाज़ा सँभालना होगा। और तुम—"
"मैं अंदर रहूँगा," बंसी ने कहा। "इस कमरे के दरवाज़े पर। काकी को साथ ले जा।"
काकी चारपाई से उठ चुकी थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा, जैसे कोई काम पर निकलने से पहले करता है। "मुझे पता है पिछला दरवाज़ा," वो बोली। "जहाँ से गाड़ियाँ माल उतारती हैं। वहाँ भी एक आदमी खड़ा होना चाहिए।"
हम निकले। काकी के कदम मेरे मुक़ाबले तेज़ थे। बुढ़ापे में भी उसकी चाल में वो ज़िद थी जो जवानी में संसार से लड़ी होगी।
जब हम पिछले दरवाज़े के पास पहुँचे, तो वहाँ भीड़ थी। मज़दूर, स्ट्रेचर, नीले कपड़ों में दो आदमी। काकी रुकी और उसने भीड़ में नज़र दौड़ाई।
"वहाँ," उसने धीरे से कहा।
मैंने देखा। एक आदमी सफ़ेद कुर्ते में, बाल नीचे झुकाए, एक ट्रॉली के पीछे खड़ा था। चेहरा छिपा था। पर उसकी बाँह पर वही निशान था जो फ़तेह के कुर्ते पर था — कोई काग़ज़, कोई चिट्ठी, एक फटा हुआ कोना।
मैं कुछ कहने ही वाला था कि काकी ने मेरा हाथ दबाया। "चुप," उसने फुसफुसाया। "वो अकेला नहीं है।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। तीन और आदमी थे — एक दरवाज़े के बाहर, एक मालगाड़ी के पास, एक उस कौने में जहाँ बिजली का तार लटक रहा था। तीनों सफ़ेद कुर्ते में। तीनों का अंदाज़ एक जैसा — हाथ जेब में, आँखें नीची।
"ये फ़तेह का गिरोह है," मैंने कहा।
"ये गिरोह नहीं," काकी ने जवाब दिया। "ये इलाज का कारोबार है।"
टोकन मेरी जेब में ठंडा हो गया। फिर अचानक गरम। इतना गरम कि मैंने जेब से हाथ निकाल लिया। और जब मैंने उसे ध्यान से देखा, तो उस पर लिखा शब्द एक नहीं, दो थे। "रोको" के नीचे एक पतली लकीर में — "आज।"
मैंने काकी को देखा। "तुम यहीं रुको। जो भी हो, मत हिलना।"
"कहाँ जा रहे हो?"
"उस आदमी का कुर्ता देखना है।" मैंने शर्ट की कॉलर ठीक की। "नाम से नहीं, निशान से।"
मैं भीड़ में घुसा। उस आदमी के पास पहुँचने से पहले मुझे एक पल सोचना था — क्या कहूँ? अगर मैं सीधे आमने-सामने आ गया, तो वो भागेगा। पर अगर मैं उसके पीछे से आया, तो शायद उसके मुँह से कुछ सुन सकूँ।
तीन कदम दूर से मैं रुका। आदमी ने अपना बायाँ हाथ ट्रॉली पर रखा और फिर ट्रॉली रोककर अपने कुर्ते की जेब से एक पुर्ज़ा निकाला। जब उसने पुर्ज़ा खोला, तो उसके अंदर एक छोटी सी गोली थी — नीली, चमकती। वो उसे एक काँच की शीशी में डालने ही वाला था कि मैंने कहा, "अच्छी दवा है?"
वो जैसे बिजली से झटका खाकर मुड़ा। उसकी आँखें सिकुड़ीं, फिर उसने एक नकली मुस्कान बनाई। "बहनजी के लिए है। कमज़ोरी की दवा।"
"कौन सी बहनजी?"
"वो… वार्ड में…" उसने हाथ से इशारा किया। और इशारा करते ही उसकी कलाई का काग़ज़ मेरी नज़र में आ गया। उस पर एक नंबर था — तीन सौ बीस। और उसके नीचे एक छोटा सा उल्टा निशान।
वही निशान। वही कोना।
"अपना कुर्ता उतारो," मैंने कहा।
"क्या?"
"कुर्ता। उतारो।"
वो हँसा, पर उसकी हँसी में डर था। "आपको क्या लगता है—"
"मुझे लगता है कि तुम्हारी जेब में जो गोली है, वो दवा नहीं, ज़हर है। और मुझे लगता है कि तुम्हारा नाम फ़तेह नहीं है, क्योंकि फ़तेह भाग गया था — पर तुम उसके बाद भी काम कर रहे हो।"
आदमी का चेहरा बदला। वो पीछे हटा, ट्रॉली उसके हाथ से छूटी और शोर मचा। चारों तरफ़ लोग मुड़े।
और उसी पल काकी की आवाज़ आई, ऊँची और साफ़। "पकड़ो इसे! ये वही है जो मेरे बच्चे को मारने आया था!"
वो आदमी दौड़ा।
मैंने उसका कुर्ता पकड़ा, पर वो फिसल गया — कुर्ता मेरे हाथ में रह गया, वो निकल गया। दौड़ता हुआ वो सीधे सामने के बड़े दरवाज़े की तरफ़ गया, जिधर से लोग आते-जाते थे।
और फिर वो वहाँ पहुँचा।
दरवाज़े पर एक लंबा जवान खड़ा था। मोटी मूँछें, चौड़े कंधे, हाथ बाँस की लाठी पर टिका। उसने कुछ नहीं कहा। बस जैसे ही आदमी उसके पास पहुँचा, उसने अपना हाथ बढ़ाकर उसकी छाती पर रख दिया — इतने ज़ोर से कि वो एक कदम भी आगे न बढ़ सका।
"ठाकुर साहब का आदमी भागता है तो कहीं और भागता है," बंसी का भतीजा बोला। "यहाँ नहीं।"
॥
बंसी के भतीजे ने आदमी की छाती पर हाथ रखा तो वो पूरा रुक गया। पर रुका नहीं, बस रुका था। फिसल कर बगल में खड़ी ट्रॉली के पीछे घूमा और भीड़ में घुलना चाहा। तभी सुमन की आवाज़ गलियारे के सिरे से आई।
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