The Token System – Chapter 810
"गेट बंद करो! कोई बाहर नहीं जाएगा!"
दो वार्ड बॉय भागकर मुख्य दरवाज़े पर पहुँचे। एक गार्ड जो अब तक मूर्ति की तरह खड़ा था, हिला और अपनी कुर्सी से उठकर सीधा दरवाज़े की तरफ़ चल दिया। सुमन ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं — वो पहले से ही फ़ोन कान पर लगाए थी।
"थाना? इमरजेंसी वार्ड। वार्ड दो का पीछे का हिस्सा। एक आदमी ने बच्चों को ज़हर दिया है, हिरासत में है, गाड़ी भेजो।"
फ़ोन बंद करके उसने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, काग़ज़ मेरे हाथ में दो।"
"मैंने उसका कुर्ता उतार लिया था—"
"कुर्ता दो। काग़ज़ दो। जो भी है, सब दो। अब ये मेरा केस है।"
मैंने कुर्ता और उसमें लिपटी शीशी उसे थमाई। वो आदमी अब भी दरवाज़े के पास खड़ा था — बंसी के भतीजे के हाथ के नीचे, बिना कुर्ते के, सिर्फ़ बनियान में। कमज़ोर दिख रहा था। जोश में जो आदमी अभी भाग रहा था, वो अब डर से काँप रहा था।
मैं उसके पास गया। "तेरा नाम?"
वो हाँफ रहा था। "…मोहम्मद।"
"फ़तेह मोहम्मद?"
"नहीं। सिर्फ़ मोहम्मद। फ़तेह मेरा… मेरा साथी है।"
"फ़तेह मोहम्मद," सुमन पीछे से बोली। "रजिस्टर में यही नाम है। पर जो अभी भागा, वो फ़तेह था — और तू?"
आदमी ने नज़र नीची कर ली। "मैं… उसका चचेरा भाई।"
"और तू यहाँ क्या कर रहा था?"
"मैं सिर्फ़ काग़ज़ लेने आया था।"
"काग़ज़?" मैंने उसकी जेब से वो पुर्ज़ा निकाला जो मैंने पहले देखा था — बच्चों के नाम, उम्र, बीमारी। "ये काग़ज़?"
उसने देखा और चेहरा फेर लिया।
"इसमें छोटू का नाम तीसरे नंबर पर है," मैंने कहा। "और इसके नीचे जो नंबर है — तीन सौ बीस — वो क्या है? कमरा? बेड? या गिनती?"
"मुझे नहीं पता—"
"तेरे हाथ पर बँधा यही नंबर था। तो पता है।"
उसने मुँह खोला, फिर बंद कर लिया।
तभी गलियारे में पैरों की आवाज़ आई। मैंने पीछे मुड़कर देखा — रामदीन आ रहा था। दौड़ नहीं रहा था, क्योंकि उसकी टाँगें साथ नहीं देती थीं। पर जिस रफ़्तार से वो आ रहा था, उसमें जल्दबाज़ी थी। पीछे शेखर बाबू थे, चश्मा हाथ में, नाक पर नहीं।
"क्या हुआ?" रामदीन ने हाँफते हुए पूछा।
"सुमन ने पकड़ लिया," मैंने कहा। "एक ज़हर वाला।"
रामदीन ने उस आदमी को देखा। "ये तो… ये तो वही है जो भवानी के होम में मरीज़ों के फ़ॉर्म भरता था।"
"तू इसे जानता है?" सुमन ने पूछा।
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस काग़ज़ की तरफ़ जो मेरे हाथ में था। और जैसे ही उसकी नज़र उस पन्ने पर पड़ी, उसका चेहरा बदल गया। वो सफ़ेद पड़ गया। सच में — रंग उतर गया हो ऐसा।
"क्या हुआ?" मैंने कहा।
"ये…" उसने उँगली बढ़ाई। "ये सूची कहाँ से आई?"
"उसकी जेब से।"
रामदीन ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। उँगली एक लाइन पर रुकी। वो लाइन पहली नज़र में सबसे ऊपर लिखी थी — किसी और के नाम के नीचे, पुरानी स्याही में, जैसे बाद में जोड़ी गई हो। उस पर लिखा था — "कमला देवी। मरीज़ की बहन। अँगूठा।"
"मेरी बहन," रामदीन ने धीमे से कहा। "कमला। ये नाम… ये नाम इस सूची में क्यों है?"
"ये सूची बच्चों की है," मैंने कहा। "बच्चों के नाम, उम्र—"
"नहीं।" रामदीन ने काग़ज़ उलटा किया। "ये पीछे का हिस्सा है। आगे नहीं। ये… ये पुरानी लिस्ट है। यहाँ ऊपर मेरी बहन का नाम है, और नीचे लिखा है — 'हिस्सा: तीन सौ बीस।'"
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। रामदीन सही कह रहा था। आगे वाले हिस्से में बच्चों के नाम थे, पर पीछे की तरफ़ एक अलग लिस्ट थी — पुरानी, फीकी स्याही, जिसमें बड़ों के नाम थे और हर नाम के आगे एक नंबर। कमला देवी का नाम दूसरी लाइन में था। और उसके आगे — तीन सौ बीस।
"ये वही काग़ज़ है," रामदीन ने कहा। "जो भवानी ने कमला के हाथ से छीना था। ये उस बात का हिसाब है — जो उसने बेचा।"
"क्या बेचा?"
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। आँखें सूखी थीं, पर मुँह से आवाज़ ऐसी निकली जैसे गला कट रहा हो। "हवेली का चौथा हिस्सा। कमला के नाम था। भवानी ने उसे मिटवा दिया, और उसके बदले… इस सूची में तीन सौ बीस का नंबर चढ़ा दिया। मतलब, कमला के बच्चे पर भी उसी हिसाब की लाइन चली। छोटू उसकी बेटी का बेटा है।"
सुमन ने अब तक चुप नहीं रहा था — वो हमारी बातें सुन रही थी और साथ में अपने फ़ोन पर कुछ टाइप कर रही थी। अब उसने फ़ोन जेब में रखा और सीधे रामदीन के सामने आई।
"रामदीन, ये काग़ज़ मुझे दो।"
"पर—"
"मुझे दो। अब ये मेरा केस है। मैं इसे सील करके रखूँगी, और अगर तुम इसे छूना चाहते हो तो थाने में आकर छूना। समझे?"
रामदीन ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। मैंने हल्का सा सिर हिलाया। उसने काग़ज़ सुमन को दे दिया।
सुमन ने काग़ज़ को अपनी कोट की अंदरूनी जेब में रखा, फिर उस आदमी की तरफ़ मुड़ी जो अब भी दरवाज़े के पास बैठा था।
"तू बोल। क्या तूने छोटू को दवा दी?"
"मैंने किसी को कुछ नहीं दिया।"
"झूठ।" सुमन एक कदम आगे बढ़ी। "छोटू की जाँच में पीली स्याही वाला वही तेल मिला है जो उस आदमी की जेब से निकली शीशी में है — जो अभी तेरे भाई के साथ भागा। और ये शीशी?" उसने अंदरूनी जेब से काँच की टूटी शीशी निकाली। "ये अमृता लाई। लेबल मिलता है। तेरा ही लेबल है।"
आदमी का मुँह खुला रह गया।
"पर मैं… मैं सिर्फ़—"
"सिर्फ़ क्या? फ़ॉर्म लेकर आया था? काग़ज़ लेकर आया था? तीन दिन से काकी की उँगली पकड़कर अँगूठा माँग रहा था — वो क्या था? काग़ज़ का काम?"
वो चुप हो गया।
"चुप क्यों हो गया?" सुमन ने कहा। "बोल।"
"मुझे ऊपर से हुक्म मिला था।"
"किससे?"
"मैं… मैं बता नहीं सकता।"
"बता देगा।" सुमन की आवाज़ इतनी सपाट थी कि मुझे भी ठंड लगी। "थाने में बता देगा।"
तभी दरवाज़े से आवाज़ आई — किसी के दौड़ने की। मैंने देखा, राजेंद्र आ रहा था। वर्दी में, कमीज़ का एक बटन खुला, सिर पर पसीना। उसके पीछे दो सिपाही थे।
"मिल गया क्या?" मैंने पूछा।
"नहीं।" राजेंद्र ने साँस ली। "गाड़ी से कूदा, एक औरत को धक्का दिया, भीड़ में ग़ायब हो गया। पर ये रह गया।" उसने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें एक नीली गोली थी — काँच की छोटी शीशी में। "उसकी जेब से गिरी।"
सुमन ने शीशी ली और रोशनी में देखी। "यही है।" फिर राजेंद्र की तरफ़। "ये मरीज़ पर पहला हमला नहीं है। इस हफ़्ते तीसरा बच्चा है। पहले दो नहीं बचे। और अगर सिर्फ़ मेरी बात मानो तो चौथा भी आने वाला था।" उसने नई मरीज़ की माँ की तरफ़ इशारा किया जो अब भी अपने बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। "उसके बच्चे को कल रात इसी आदमी ने मुफ़्त इंजेक्शन दिया था। पाँच-छह साल का बच्चा। उसकी माँ ने अँगूठा लगाया — उसे पता भी नहीं क्या लिखवाया।"
राजेंद्र ने उस आदमी की तरफ़ देखा। मोहम्मद। उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
"उठा इसे," राजेंद्र ने अपने सिपाहियों से कहा। "हथकड़ी लगा।"
मोहम्मद ने एक बार मेरी तरफ़ देखा। ऐसे देखा जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर सिपाही उसे खींचकर उठा रहे थे।
"रुको," मैंने कहा। "एक बात।"
राजेंद्र ने रुकने का इशारा किया।
मैं मोहम्मद के सामने झुका। "तेरे भाई ने तीन बच्चों को मारा। तूने क्यों नहीं रोका?"
उसने मुँह फेर लिया।
"तू बोलता नहीं," मैंने धीमे से कहा। "तेरे भाई का नाम बता। नहीं तो कल तेरे नाम पर भी वही लगेगा जो उस पर लगेगा। और भवानी किसी को नहीं बचाता।"
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