The Token System808 / 1154

The Token System – Chapter 808

7 min read November 6, 2026

तभी गलियारे में दो जूतों की आवाज़ आई। राजेंद्र आ रहा था — वर्दी में, चेहरे पर वो थकान जो दो रात से सोया नहीं। उसके पीछे एक कॉन्स्टेबल था।

"क्या मिला?" मैंने पूछा।

राजेंद्र ने काग़ज़ात मेरे हाथ से लिए और एक नज़र में पढ़ गया। "ये सूची कहाँ से आई?"

"उसकी जेब से," मैंने कहा। "और शीशी चारपाई के नीचे से। सुमन ने बचा लिया।"

राजेंद्र ने सफ़ेद कुर्ते वाले की कलाई पर हथकड़ी लगाई। "नाम?"

"फ़तेह — डॉक्टर फ़तेह।"

राजेंद्र ने सुमन की तरफ़ देखा।

"ये डॉक्टर नहीं है," सुमन ने कहा।

राजेंद्र ने फ़तेह को गलियारे की तरफ़ खींचा। फ़तेह के पैर लड़खड़ा रहे थे। जाते-जाते उसने एक बार मेरी तरफ़ मुड़कर देखा और कुछ कहने ही वाला था कि राजेंद्र ने खींच लिया।

"अभी नहीं," राजेंद्र ने कहा। "थाने में।"

दो मिनट बाद बंसी का भतीजा भी बाहर चला गया — बंसी ने उसे इशारा किया था। मुझे लगा कि वो उस लड़के से गलियारे के दोनों सिरों पर नज़र रखवा रहा है।

कमरे में सिर्फ़ मैं, सुमन और छोटू रह गए। काकी दरवाज़े के बाहर बेंच पर बैठ गई थीं, बंसी उनके पास।

सुमन ने छोटू की नाड़ी देखी, फिर मेरी तरफ़ मुड़ी। "मन्नू, अब मैं तुमसे एक बात कहूँगी और तुम्हें झूठ नहीं बोलना। ये शीशी किसी भी सरकारी अस्पताल के स्टोर में नहीं मिलती। ये बाहर से आती है — सिर्फ़ नर्सिंग होम के लिए।"

"मतलब भवानी के होम से।"

"मतलब किसी के हाथ से जो उस होम तक पहुँच रखता है। यहाँ के अंदर।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए। "कौन?"

"मैं नहीं जानती। पर मैं जानती हूँ कि ये बच्चा अगर मर गया, तो सिर्फ़ एक काग़ज़ बनेगा — 'मरीज़ अस्पताल में भर्ती था, इलाज के दौरान मौत।' और उस काग़ज़ पर किसी का नाम नहीं होगा।"

"तो काग़ज़ होने ही क्यों दो?"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा — ऐसे जैसे कोई बहुत पुरानी बात याद आ गई हो। "क्योंकि अगर काग़ज़ नहीं बना तो जाँच होगी। और जाँच होने से उन्हें डर है।"

मैंने खाली शीशी उसके हाथ में लौटाई। "ये तुम रखो। तुम्हारी जेब इस वक़्त सबसे सुरक्षित जगह है।"

सुमन ने शीशी को अपने कोट की अंदरूनी जेब में डाला और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। पर रुकी। "एक बात और।" उसने आवाज़ धीमी की। "मेरा तबादला लिखने वाला अधिकारी — मैंने उसका नाम पता किया। काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने वाला कोई अज्ञात अधिकारी नहीं है। वो असली आदमी है, और वो इस अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड में दर्ज है।"

"कौन?"

"नाम अभी नहीं लूँगी।" उसने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "क्योंकि अभी मेरे पास सिर्फ़ एक इशारा है, सबूत नहीं। और अगर ग़लत नाम बोल दिया तो जो असली आदमी है वो सतर्क हो जाएगा।"

"तो मुझे क्या करना है?"

सुमन ने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा। "ये सूची सबसे ज़रूरी चीज़ है। इसमें जो तीसरा नाम काटा गया है — वो कोई बच्चा नहीं है। वो किसी का नाम है जिसे हटाना था।"

मैंने काग़ज़ फैलाया। तीसरी लाइन पर कलम के दबाव के निशान साफ़ थे। मैंने उँगली से उस जगह को छुआ। "ये दबाव देखो। जिसने काटा है, उसने ज़ोर लगाया है — जैसे अपना ही नाम काट रहा हो।"

सुमन ने देखा। "या जिसका नाम जानता था।"

तभी मेरी जेब में टोकन फिर हिला — न गरम, न ठंडा। बस एक हल्की धक्का-सी। मैंने निकाला तो उस पर कोई शब्द नहीं था। बस एक कोना — जो अभी मौजूद नहीं था। कोना सीधा नहीं था, उल्टा था। और उसके नीचे एक छोटी लकीर उभरी — जिसका कोई मतलब मुझे नहीं पता था।

सुमन ने देखा और उसका चेहरा कठोर हो गया। "ये वही निशान है," उसने कहा, "जो उस आदमी की कलाई पर था। सुनहरी अँगूठी पर।"

"फ़तेह की?"

"नहीं।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "जो बाहर गाड़ी में बैठा था।"

मैंने टोकन जेब में रखा। "तो इसका मतलब ये है कि टोकन मुझे उसी की तरफ़ इशारा कर रहा है?"

"या फिर वो तुम्हारी तरफ़।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि गलियारे से काकी की आवाज़ आई — ऊँची, काँपती। मैं दौड़कर बाहर गया।

काकी बेंच से उठकर खड़ी थीं और उनके सामने एक औरत खड़ी थी — सफ़ेद साड़ी, सिर ढका हुआ, हाथ में छोटा थैला। वो वही औरत थी जिसे बंसी ने फ़तेह से कुछ लेकर ऑटो में भागते देखा था।

"तू यहाँ कैसे?" बंसी ने उसका रास्ता रोका।

औरत ने काकी की तरफ़ देखा। "मैं… मैं आपसे कुछ कहने आई थी।"

"क्या कहने?"

औरत ने थैला आगे बढ़ाया। "ये रख लो। और मुझे भूल जाओ।"

मैंने थैला खोला। उसमें एक छोटा काग़ज़ था जिस पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे — "मैं भूल नहीं सकती।" और उसके नीचे एक और चीज़ — एक पारदर्शी शीशी, टूटी हुई, जिसमें दो बूँद पीली स्याही बची थी।

सुमन ने पीछे से झाँका और उसके मुँह से एक लंबी साँस निकली। "यही है। यही तेल है जो बच्चे को दिया गया।"

औरत ने काकी की तरफ़ देखा और उसकी आँखों में पानी आ गया। "वो मेरी बहन का बेटा था," वो बोली। "तीन महीने पहले। भवानी के होम में। उसे भी यही दिया गया। और उसका काग़ज़ बन गया — 'इलाज के दौरान मौत'।"

काकी की साँस रुक गई।

औरत ने कहा, "मैं तब से उसी शीशी को लिए घूम रही हूँ। किसी को बताया नहीं। डर से। पर आज…" उसकी आवाज़ टूटी। "आज जब मैंने सुना कि इस बच्चे को भी वही दिया गया, मैं चुप नहीं रह सकी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुम्हारा नाम?"

"अमृता।" उसने सिर उठाया। "और अगर तुम इसे अदालत तक ले जाओ, मैं गवाही दूँगी।"

बंसी ने गलियारे के दोनों सिरों पर नज़र दौड़ाई। "पहले अंदर चलो।" उसने औरत को कमरे में धकेला और दरवाज़ा बंद किया।

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "अब हमारे पास दो शीशी हैं। एक खाली, एक टूटी। दोनों एक ही तेल की।"

सुमन ने दोनों को अपनी जेब में रखा। "और दो गवाह — एक काकी, एक ये औरत।" फिर उसने औरत की तरफ़ देखा। "क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारी बहन का बेटा कब भर्ती हुआ था?"

"पंद्रह तारीख़। पंद्रह तारीख़ को। और उसी रात मर गया। सुबह काग़ज़ पर लिखा था — 'इलाज के दौरान'। पर मैंने उसे उस रात देखा था — वो मरा नहीं था। वो साँस ले रहा था।"

सुमन का चेहरा पत्थर हो गया। "तो किसी ने उसकी साँस रोकी।"

कमरे में चुप्पी छा गई।

मैंने काग़ज़ों को एक जगह रखा — फ़तेह की सूची, अमृता की टूटी शीशी, और वो काग़ज़ जिस पर उसने लिखा था कि वो भूल नहीं सकती। "अब हमें एक और बात पता करनी है," मैंने कहा। "ये फ़तेह का हुक्म देने वाला ऊपर वाला कौन है। और उसकी सुनहरी अँगूठी पर यही उल्टा निशान क्यों है।"

सुमन ने मेरी जेब से टोकन देखा — जो अब भी वो उल्टा कोना दिखा रहा था। "मन्नू," उसने धीरे से कहा, "ये टोकन इस वक़्त किसी ऐसे आदमी की तरफ़ इशारा कर रहा है जो इस शहर में नहीं है। या है, पर किसी और नाम से।"

"कैसे पता?"

"क्योंकि ये कोना उल्टा है। सीधा नहीं।"

दरवाज़े पर दस्तक हुई। बंसी ने खोला — बाहर बंसी का भतीजा खड़ा था, हाँफता हुआ।

"चाचा," वो बोला, "वो सफ़ेद गाड़ी वाला आदमी — फ़तेह — थाने ले जाते वक़्त गाड़ी से कूद गया। राजेंद्र भागा उसके पीछे, पर उसने एक औरत को रास्ते में धक्का दिया और भीड़ में ग़ायब हो गया।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।

"फ़तेह भाग गया," उसने कहा। "पर वो जानता है कि हमारे पास क्या है।"

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