The Token System – Chapter 807
"काकी।" मैंने उनका हाथ पकड़ा। "आपने कुछ नहीं किया। जो कर रहा है, वो आपको डरा रहा है। डरना नहीं है।"
"सब कहते हैं," काकी ने सिसकते हुए कहा। "गाँव में सब कहते थे — सुखदेव की बही में जिसका नाम, वो बचता नहीं। मैंने हँसी उड़ाई थी। अब देखो।"
दरवाज़े से सुमन घुसी। उसके कपड़ों पर सफ़ेद कोट नहीं था — सिर्फ़ नीली साड़ी और हाथ में स्टेथोस्कोप। वो सीधी छोटू की चारपाई पर आई, एक नज़र उसका चेहरा देखा और पीछे मुड़कर नर्स से चिल्लाई, "आठ मिलीग्राम डेक्सामेथासोन, अभी। और ड्रिप खोलो। मैंने कहा था — खोलो!"
"मैडम, पहले से चढ़ रहा है—"
"रोक दो। नया लगाओ। दो बोतल अभी।"
वो छोटू के ऊपर झुकी और उसकी आँखें देखने लगी। फिर मेरी तरफ़ मुड़ी। "तुमने काग़ज़ क्या किया?"
"जेब में है।"
"किसने दिया?"
मैंने गेट वाली बात बताई — सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, लिफ़ाफ़ा, तीसरे की बात। सुमन शांत सुनती रही, पर उसकी उँगलियाँ छोटू की कलाई पर दबी थीं और मुझे लगा वो नाड़ी गिन नहीं रही, बस उँगली टिकाए हुए है।
"तीसरा," वो बोली। "इस वार्ड में इस हफ़्ते तीसरा बच्चा है जिसे ज़हर मिला। पहले दो बचे नहीं।"
मेरा मुँह खुला रह गया। "तुमने पुलिस को बताया?"
"बताया। कल।" उसने कड़वी हँसी हँसी। "और आज सुबह मुझे नोटिस मिला — मेरा तबादला। एक हफ़्ते में। इस शहर से बाहर।"
काकी की सिसक सुनकर सुमन ने उनकी तरफ़ देखा और फिर धीरे से मेरे कान के पास कहा, "अब तुम भी जान लो — अगर ये बच्चा बच गया, तो इनके लिए ये सिर्फ़ एक और बच्चा है। और अगर मर गया, तो एक और डरा हुआ गाँव। दोनों में उनका फ़ायदा है।"
छोटू ने अचानक पूरे शरीर से झटका खाया। उसकी पीठ चारपाई से उठी और फिर गिर पड़ी। मुँह से झाग निकला। सुमन ने उसे करवट दिलाई और नर्स को आदेश देने लगी।
मैंने काकी को अपनी तरफ़ खींचा। "काकी, बाहर चलिए। यहाँ मत देखिए।"
"नहीं—"
"काकी।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "मैं वादा करता हूँ, छोटू को कुछ नहीं होगा। पर मुझे आपकी ज़रूरत है। आपको माँ के पास जाना है। बंसी आपको ले जाएगा।"
काकी ने मेरा चेहरा देखा। "और तू?"
"मैं यहाँ रहूँगा।"
शायद मेरी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो उन्हें भरोसा दे गया, क्योंकि उन्होंने एक बार छोटू की तरफ़ देखा और फिर सिर हिलाया। बंसी ने उनका हाथ पकड़ा और दोनों बाहर चले गए।
सुमन ने खून की दो शीशियाँ भेजने का आदेश दिया। "जल्दी। कह दो, मैं खुद देखूँगी। और लैब वाले को बोलो, ये सैंपल किसी के हाथ में न जाए। सीधे मुझे।"
नर्स भागी।
कमरे में सिर्फ़ मैं, सुमन और छोटू का शरीर — जो अब भी झटकों में था। सुमन की आँखों में पानी था, पर हाथ स्थिर थे।
"मन्नू," उसने कहा। "तुम्हारी जेब में जो गरम हो रहा है — अगर वो रास्ता दिखाता है, तो अभी दिखने का वक़्त है।"
मैंने टोकन निकाला। वो लाल तक गरम था। और उस पर शब्द नहीं था। सिर्फ़ एक तरफ़ इशारा था — एक छोटी धारी, जो नीचे की तरफ़ मुड़ी थी, चारपाई के पाए की तरफ़।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
"नीचे," मैंने कहा। "चारपाई के नीचे।"
सुमन झुकी और वार्ड की दूधिया रोशनी में फ़र्श पर हाथ फेरने लगी। उसकी उँगली किसी चीज़ पर रुकी। उसने उसे बाहर खींचा।
एक छोटी खाली शीशी। काँच की। ऊपर सफ़ेद ढक्कन। और उस पर एक पीला लेबल — जिस पर मोटे काले अक्षरों में एक लंबा नाम लिखा था।
सुमन ने शीशी को उजाले में उठाया। उसका चेहरा सफ़ेद हो गया — सफ़ेद, जैसे उसने किसी को मरा हुआ देख लिया हो।
"ये तो…" उसकी आवाज़ फटी। "ये तो वही दवा है जो बच्चों को कभी नहीं देनी चाहिए।"
"क्या मतलब?"
वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखों में डर था, पर उससे भी बड़ा कुछ और — पक्का भरोसा, कि अब वो हारेगी नहीं।
"मतलब ये," उसने धीरे से कहा, "कि जिसने ये दिया है, वो इस अस्पताल के अंदर बैठा है। और मेरा तबादला लिखने वाला भी वही है।"
बाहर गलियारे में पैरों की आवाज़ आई। कई पैर। और कोई किसी को चुप रहने को कह रहा था। सुमन ने शीशी अपनी जेब में डाली और मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू," उसने कहा। "अब तुम अपना रास्ता बंद मत करना।"
॥
दरवाज़े पर बंसी का भतीजा खड़ा था — वो लंबा, दुबला लड़का जो थाने के बाहर पान की दुकान चलाता था, और जिसका नाम बंसी ने एक बार ही लिया था। उसने सफ़ेद कुर्ते वाले की छाती पर हाथ रख दिया, इतने ज़ोर से कि आदमी पीछे हटकर दीवार से टकरा गया।
"ठाकुर साहब का आदमी भागता है तो कहीं और भागता है," भतीजे ने कहा। "यहाँ नहीं।"
सफ़ेद कुर्ते वाले ने इधर-उधर देखा — गलियारे में मरीज़ों के परिवार, दो सफ़ाई कर्मचारी, और बंसी के पीछे खड़ी काकी, जो हाथ जोड़े बस उसे देख रही थी। आदमी का चेहरा पसीने से भीग गया।
"मैं डॉक्टर हूँ," वो फिर बोला, आवाज़ में वो पुराना ढोंग लौटाने की कोशिश करते हुए। "मुझे यहाँ से जाने का हक़ है।"
सुमन ने खाली शीशी रूमाल में लपेटी और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "मन्नू, ये तुम रखो।" फिर वो आदमी के सामने जाकर खड़ी हो गई। "तेरा नाम क्या है?"
"फ़तेह। डॉक्टर फ़तेह।"
सुमन ने एक पल भी नहीं लिया। "इस अस्पताल में फ़तेह नाम का कोई डॉक्टर नहीं है। तीन साल का रिकॉर्ड है मेरे पास। एक भी फ़तेह नहीं।"
आदमी की आँखें फड़कीं। मैंने देखा कि उसका दाहिना हाथ जेब की तरफ़ जा रहा है — धीरे-धीरे, पता न चले ऐसे। मैंने दो कदम बढ़ाकर उसका हाथ पकड़ लिया और जेब से निकाल दिया। उसमें एक छोटी शीशी थी — पीली स्याही जैसा तेल, बिल्कुल वैसा जैसा बंसी ने बताया था — और एक मुड़ा काग़ज़।
काग़ज़ खोला। बच्चों के नाम-उम्र-बीमारी की सूची। सबसे ऊपर छोटू। नीचे से तीसरा नाम काटा हुआ था — किसी ने कलम से मिटाया था, पर दबाव के निशान बचे थे। और सबसे नीचे, कोने में, वही 'रा-क'।
"ये सूची किसकी है?" सुमन ने पूछा।
आदमी ने मुँह नहीं खोला।
काकी आगे आईं। उनकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़। "ये रोज़ आता था। रोज़। मेरे बच्चे को कहता — बाबा, ताक़त का इंजेक्शन लगाना है, ताकि तू जल्दी ठीक हो जाए। और हर बार यही कहता — काग़ज़ पर अँगूठा लगा दो, फिर इलाज मुफ़्त। मैं मना करती रही। आज ये ज़बरदस्ती कर रहा था।"
सुमन ने आदमी की तरफ़ देखा। "कितनी बार?"
"तीन बार," काकी ने कहा। "तीन दिन।"
सुमन का चेहरा बदल गया। उसने तुरंत पीछे मुड़कर नर्स को बुलाया। "छोटू का पेट धुलवाओ, अभी। और खून की तीन जाँच — तीनों वक़्त की मात्रा मुझे अलग-अलग चाहिए। जो भी सैंपल जाए, वो सीधे मेरे हाथ में आए। लैब वाले को बोल दो, मेरे सामने से हटे नहीं।"
नर्स भागी। सुमन ने उस दबे हुए नाम की तरफ़ इशारा किया। "ये किसका नाम है?"
आदमी ने ज़मीन देखी।
"देखो," मैंने कहा, "तू जो भी बोलेगा, वो मेरे कान में जाएगा और काग़ज़ पर लिखा जाएगा। पर अगर तू चुप रहा, तो जो लिखा जाएगा वो तेरे नाम पर जाएगा। तेरा चुनाव।"
आदमी ने एक बार सुमन को देखा, फिर मेरी तरफ़। "मुझे ऊपर से हुक्म मिला है," वो काँपती आवाज़ में बोला। "मैं सिर्फ़ काग़ज़ लाता हूँ। अँगूठा मिल जाए तो रास्ता साफ़। न मिले तो…" वो रुका।
"तो?"
"तो दूसरा रास्ता।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। हम दोनों को एक ही बात समझ आ गई थी — "दूसरा रास्ता" का मतलब वही ज़हर था जो छोटू के शरीर में अभी भी था।
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