The Token System – Chapter 806
मैं सीढ़ियों की तरफ़ भागा। नीचे इमरजेंसी का गलियारा था। भीड़ थी। मैंने चारों तरफ़ देखा — कोई सफ़ेद साड़ी वाली औरत नहीं दिखी। बाहर का दरवाज़ा खुला था, और बाहर धूप में लोग आ-जा रहे थे।
फिर मैंने देखा — एक ऑटो खड़ा था, उसमें एक औरत बैठ रही थी। उसने सिर पर दुपट्टा खींच लिया था। ऑटो चला।
मैंने भागकर पीछे से नंबर पढ़ने की कोशिश की, पर धूल में ढका था। ऑटो मुड़ गया।
मैं लौटकर ऊपर आया। सुमन वार्ड के बाहर खड़ी थी, हाथ में एक काग़ज़।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"छोटू स्टेबल है। अभी ख़तरे से बाहर नहीं, पर साँस संभल रही है।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये उस आदमी की जेब से गिरा था। मैंने उठा लिया।"
मैंने काग़ज़ खोला। बच्चों की सूची थी — नाम, उम्र, बीमारी। दस-बारह नाम। हर नाम के आगे एक तारीख़। और सबसे ऊपर एक नाम — छोटू। उम्र दस साल। बीमारी — ज़हर। तारीख़ आज की।
नीचे कोने पर हल्की पेंसिल से दो अक्षर — रा-क।
मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे कुछ नहीं था।
"ये नाम किसने लिखे?" सुमन ने पूछा।
"यही तो सवाल है।" मैंने काग़ज़ जेब में रखा। "और ये 'रा-क'?"
सुमन ने कंधे उठाए। "मुझे नहीं पता।"
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। एक हल्की गरमाहट, जैसे किसी ने अँगुली से छुआ हो। मैंने जेब में हाथ डाला, पर निकाला नहीं। सुमन सामने खड़ी थी।
"मन्नू," सुमन ने कहा। "तुम्हारे पास कुछ है।"
"क्या?"
"वो। जो तुम जेब में छिपा रहे हो। मैं मूर्ख नहीं हूँ। पिछले कई दिनों से तुम्हारी जेब में कुछ है जो कभी गरम होता है और कभी ठंडा। और जब वो गरम होता है, तुम्हारी आँखें बदल जाती हैं।"
मैं चुप रहा।
"मैं नहीं पूछूँगी," वो बोली। "पर एक बात कहूँ — अगर उस चीज़ से इस बच्चे की जान बच सकती है, तो मत छिपाओ।"
"वो किसी की जान नहीं बचा सकती," मैंने कहा, और मुझे अपनी आवाज़ अजीब लगी। "वो सिर्फ़ रास्ता दिखाती है। इलाज तुम करती हो।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा, और फिर उसने सिर हिलाया। "ठीक है। तो रास्ता दिखाओ। ये 'रा-क' कौन है?"
मैंने सोचा। रा… क… रामलाल? नहीं, रामलाल तो परदादा था। राघव? राघव तो कुँवर का काग़ज़ी नाम था। रा-क।
"रामकिशन?" मैंने धीरे से कहा।
"रामकिशन तो खुद पीड़ित है," सुमन ने कहा। "वो क्यों बच्चों की सूची बनाएगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "रा-क, रामकिशन नहीं है।" और तभी मुझे याद आया — रामलाल की बही, रामलाल का नाम। रामलाल का बेटा सुखदेव। सुखदेव की बही। और उस बही के आख़िरी पन्ने पर एक नाम जो अदालत में नहीं आया।
"रा-क…" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम कुछ जानते हो।"
"मुझे अंदाज़ा है," मैंने कहा। "पर पक्का नहीं।"
तभी बंसी दौड़ता हुआ आया। "मन्नू — नीचे गेट पर भवानी का आदमी खड़ा है। कह रहा है, ऊपर से बुलावा आया है — काकी से माफ़ी माँगने।"
"माफ़ी?" मैंने कहा। "भवानी थाने में है।"
"पता नहीं। वो बोला — बड़े साहब का बुलावा है। और बड़े साहब भवानी नहीं हैं।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसका चेहरा कठोर था।
"मन्नू," उसने धीरे से कहा। "अगर भवानी थाने में है और उसका आदमी यहाँ घूम रहा है, तो इसका मतलब — जो ऊपर बैठा है, वो अभी भी ऊपर है।"
मैंने बंसी से कहा, "काकी को लेकर वार्ड के अंदर चले जाओ। दरवाज़ा बंद कर लो। मैं नीचे देखता हूँ।"
"अकेले?"
"तू काकी के पास रुक।"
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। गेट पर भीड़ थी। एक आदमी सफ़ेद कुर्ते में खड़ा था, हाथ में कोई लिफ़ाफ़ा। वो मुझे देखकर आगे आया।
"मनोहर जी?"
"हाँ।"
"बड़े साहब का संदेश है।" उसने लिफ़ाफ़ा बढ़ाया।
मैंने नहीं लिया। "कौन बड़े साहब?"
"जो अभी तक बाहर है। थाने के।" उसने धीरे से कहा। "भवानी सिंह का पहला आदमी। जिसने बही बनाई थी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"लिफ़ाफ़ा लो," उसने कहा। "अंदर बच्चे का नाम है। और एक तारीख़।"
"कौन सा बच्चा?"
"वही जो आज बच गया।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरे सीने पर रख दिया और मुड़कर चला गया।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी — "आज वो बच गया। कल नहीं बचेगा। और जो बचाने आएगा, वो अपना हिसाब लेकर आए — पूरा।"
मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे कोना-चिह्न था — वो ही दो लकीरें और बिंदु। पर ये बार उल्टा।
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा नहीं था। वो गरम था। और उस पर एक शब्द उभरा था — "तीसरा।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और सीधा वार्ड की तरफ़ भागा। सीढ़ियों पर बंसी मिला — उसका मुँह सूखा हुआ था।
"काकी?" मैंने पूछा।
"अंदर हैं। दरवाज़ा बंद है।" बंसी ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "मन्नू, तूने कुछ निकाला जेब से। मैंने देखा।"
"बाद में।"
"नहीं, अभी।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "तू तीन दिन से अजीब है। रात को उठकर बैठता है। बंसी, बंसी बोलता है नींद में। और आज सुबह मैंने तेरा बिस्तर छुआ तो वो गरम था — तू सोया नहीं था वहाँ, फिर भी तकिया गरम।"
"बंसी—"
"मैं तेरा भाई हूँ। सगा नहीं, पर सगा ही हूँ। मुझे बता।"
मैं रुका। गलियारे में लाइट की ट्यूब भिनभिना रही थी। दूर कहीं कोई बर्तन गिरा।
"मेरे पास एक टोकन है," मैंने कहा। "परदादा का। वो गरम होता है जब कुछ गड़बड़ होने वाला होता है। और उस पर शब्द उभरते हैं।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "तू मज़ाक कर रहा है।"
"करता तो अच्छा होता।" मैंने टोकन जेब से निकाला। वो अब भी गरम था। बंसी ने हाथ बढ़ाया, पर छुआ नहीं।
"इस पर लिखा है — तीसरा," मैंने कहा।
"तीसरा क्या?"
"पता नहीं। पर आज जो काग़ज़ मिला, उस पर 'रा-क' लिखा था। और अभी गेट पर जो आदमी आया, उसने कहा — 'जो बचाने आएगा, वो अपना हिसाब लेकर आए, पूरा।'"
बंसी का चेहरा बदला। "मन्नू, ये सब छोड़। काकी अंदर अकेली हैं।"
हम वार्ड दो के दरवाज़े पर पहुँचे। दरवाज़ा बंद था। मैंने खटखटाया।
"काकी, मैं हूँ। मन्नू।"
अंदर से सिसकने की आवाज़ आई, फिर कुंडी खुली। काकी ने दरवाज़ा खोला। उनकी आँखें लाल थीं और हाथ में छोटू की उँगली दबाए हुए थीं, जैसे कहीं खो जाने से डर रही हों।
"वो आदमी?" मैंने पूछा।
"चला गया।" काकी की आवाज़ काँप रही थी। "कह गया — कल सुबह तक सोच लो। काग़ज़ पर अँगूठा लगा दो, बच्चा ठीक। नहीं तो…"
"नहीं तो?"
"बोला — जो लोग इस अस्पताल में इस बच्चे को बचाने की कोशिश करते हैं, उनके घर भी पहुँच जाते हैं।" काकी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, तेरी माँ अकेली है घर पर।"
मेरे पैर के नीचे ज़मीन खिसकी। मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"मैं अभी जाता हूँ," बंसी बोला।
"नहीं।" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "तू काकी के पास रुक। मैं फ़ोन करता हूँ।"
मैंने मोबाइल निकाला। माँ का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही। कोई नहीं उठा। दूसरी बार। तीसरी बार।
"मन्नू?" काकी ने धीरे से कहा।
"कुछ नहीं। सो गई होंगी।" पर मेरा गला सूख रहा था। माँ कभी दस बजे से पहले नहीं सोतीं।
तभी छोटू ने कराहना शुरू किया। उसकी साँसें तेज़ और छोटी हो गईं, जैसे कोई मशक दबा रहा हो। उसके होंठ नीले पड़ने लगे और उँगलियाँ ठंडी — मैंने उसका हाथ छुआ तो लगा जैसे बर्फ़ की डली पकड़ी हो।
"सुमन!" मैं चिल्लाया। "बंसी, सुमन को बुला!"
बंसी भागा। मैंने छोटू का हाथ अपनी हथेली में लिया और उसे रगड़ने लगा। काकी ने दोनों हाथ जोड़ लिए और फूट-फूटकर रोने लगीं।
"मेरा बच्चा," वो बोलीं। "मेरा बच्चा। मैंने क्या किया। मैंने अँगूठा नहीं लगाया तो क्या होगा? मुझे लगा देना चाहिए था—"
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