The Token System – Chapter 805
अस्पताल की सीढ़ियाँ मैं तीन-तीन उठाकर चढ़ रहा था। पीछे बंसी हाँफ रहा था, पर रुका नहीं। वार्ड दो का दरवाज़ा आते ही अंदर से आवाज़ आई — काकी रो रही थी, और कोई मर्दाना आवाज़ कह रही थी, "बुढ़िया, अँगूठा लगा दे। बच्चा ठीक हो जाएगा। देख नहीं रही, साँस रुक रही है?"
मैंने दरवाज़ा धक्के से खोला।
सफ़ेद कुर्ते वाला एक आदमी छोटू की चारपाई के पास खड़ा था। एक हाथ में काग़ज़, और दूसरे हाथ से काकी की उँगली पकड़कर स्याही की दवात की तरफ़ खींच रहा था। छोटू की चारपाई के पास पानी का गिलास लुढ़का था। बच्चे के होंठ नीले पड़ रहे थे और साँस तेज़-तेज़ चल रही थी। उसकी गर्दन की नसें खिंची हुई थीं।
"हाथ छोड़," मैंने कहा और आदमी का कलाई पकड़कर पीछे खींचा।
वो मुड़ा। चालीस के आसपास, उजला चेहरा, छोटी आँखें। "मैं डॉक्टर हूँ। तमीज़ से बात कर।"
"डॉक्टर हो तो नाड़ी देख, काग़ज़ नहीं।" मैंने उसके हाथ से काग़ज़ खींच लिया। "ये बच्चा मर रहा है और तू अँगूठा ले रहा है?"
"ये हमारे होम का फ़ॉर्म है। इलाज के लिए ज़रूरी है।"
"कौन सा इलाज?" मैंने काग़ज़ पलटा। पीले काग़ज़ पर बड़े अक्षरों में लिखा था — बाहर भेजने की सहमति। अँगूठे की जगह खाली थी।
बंसी ने आदमी की जेब की तरफ़ इशारा किया। "क्या रखा है जेब में?"
आदमी ने हाथ आगे किया। "कुछ नहीं।"
मैंने खुद हाथ डाला। एक छोटी दवात निकली, पीतल की, ढक्कन खुला। मैंने सूँघा — स्याही नहीं थी। कोई तेल था, हल्का पीला, बदबूदार।
"ये स्याही नहीं है," मैंने कहा।
काकी ने मेरी बाँह पकड़ ली। उसका हाथ काँप रहा था। "मन्नू, बेटा… मैंने नहीं लगाया। मैंने कहा, ये तो पागल है। पर जबरदस्ती…"
"बैठ काकी।" मैंने उसे कुर्सी पर बिठाया। "कुछ नहीं होगा।"
आदमी पीछे हटा। "देखो, मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ। मुझे हुक्म मिला है। ऊपर से।"
"किसका हुक्म?"
"जो हुक्म देता है, उसका नाम नहीं लेते।"
मैंने मोबाइल निकाला। सुमन का नंबर लगाया। एक रिंग, दो रिंग, तीसरी पर आवाज़ आई — "हाँ?"
"वार्ड दो," मैं चिल्लाया। "जल्दी आओ। इस बच्चे को कुछ दिया गया है। खून की जाँच करो। और एक आदमी है यहाँ, सफ़ेद कुर्ते में, खुद को डॉक्टर बता रहा है — इसे रोक लो।"
"दो मिनट।" फ़ोन कट गया।
सफ़ेद कुर्ते वाले ने मेरी तरफ़ देखा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
बंसी उसके सामने खड़ा हो गया, टूटे हाथ को सहलाते हुए। "भाई, दो मिनट रुक जा। डॉक्टर आ रही है।"
"हट।"
"हटता हूँ, पर तेरे बाद।"
आदमी ने बंसी को धक्का दिया। बंसी पीछे हटा पर गिरा नहीं। मैंने पीछे से आदमी का कुर्ता पकड़ लिया और अपनी तरफ़ खींचा। वो मुड़ा और मेरे सीने पर हाथ चला दिया। मैं चारपाई के पास गिरा, पर उठकर फिर लपका।
तभी दरवाज़ा खुला और सुमन सफ़ेद कोट में अंदर आई। उसके पीछे दो नर्सें थीं।
"क्या हो रहा है यहाँ?" सुमन की आवाज़ सख़्त थी।
वो मेरी तरफ़ देखे बिना छोटू की चारपाई के पास पहुँची। उसने छोटू का हाथ उठाया, नाड़ी देखी, फिर पलकें उठाकर आँखों में रोशनी डाली। उसका चेहरा सख़्त हो गया।
"बीपी गिर रहा है। ऑक्सीजन लगाओ, तुरंत। और खून का नमूना लो — इलेक्ट्रोलाइट, यूरिया, क्रिएटिनिन, सब। जल्दी।" वो मुड़ी। "ये आदमी कौन है?"
"खुद को डॉक्टर बता रहा था," मैंने कहा। "काकी का अँगूठा लगवा रहा था। बाहर भेजने का फ़ॉर्म।"
सुमन ने आदमी को देखा। "अस्पताल में किसी को अँगूठा नहीं लगाना होता। इलाज होता है। तुम किस अस्पताल से हो?"
आदमी ने कुछ नहीं कहा।
"तमीज़ से पूछ रही हूँ। नाम?"
"मैं… मैं सिर्फ़ काम करता हूँ।"
"तो काम बंद।" सुमन ने नर्स की तरफ़ देखा। "सिक्योरिटी बुलाओ। अभी।"
आदमी ने एक कदम पीछे हटकर दरवाज़े की तरफ़ देखा। बंसी वहीं खड़ा था। वो रुका। फिर सिक्योरिटी आई और उसे बाहर ले गई।
सुमन छोटू के पास झुकी। "बच्चे को क्या दिया?"
"पता नहीं," काकी ने रोते हुए कहा। "वो आया, बोला बच्चे को होम ले जाना है, काग़ज़ पर अँगूठा लगा दो। मैंने मना किया तो पानी का गिलास उठाया, बोला — पिला दे, इसकी साँस रुक रही है।"
"वो पिलाया?"
"नहीं। मैंने गिलास छीनकर फेंक दिया।" काकी ने फ़र्श की तरफ़ इशारा किया जहाँ गिलास पड़ा था। "पर उससे पहले… वो एक दफ़ा पिला चुका था।"
सुमन का मुँह कड़वा हुआ। "कब?"
"थोड़ी देर पहले। जब मैं पानी लेने गई थी।"
सुमन ने नर्स की तरफ़ देखा। "सैंपल जल्दी। और मुझे वो गिलास दो, सील करके लैब भेजो।"
मैंने छोटू को देखा। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे हवा न मिल रही हो। मेरा गला सूख गया।
"सुमन," मैंने धीरे से कहा। "इसे बचाओ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर छोटू की तरफ़। "मैं कोशिश कर रही हूँ, मन्नू। ये मेरा काम है। पर तुम बाहर जाओ।"
"मैं नहीं जाऊँगा।"
"तो चुपचाप खड़े रहो।"
वो नर्सों को आदेश देती रही, और मैं दीवार से टिककर खड़ा रहा। बंसी ने काकी के पास जाकर उसका कंधा थामा।
तभी छोटू की चारपाई के नीचे से कुछ लुढ़का।
छोटी खाली शीशी, काँच की, भूरे रंग की। वो चारपाई के पाए से टकराकर रुकी।
सुमन की नज़र उस पर पड़ी। उसने शीशी उठाई, रोशनी के सामने की, ढक्कन खोला और सूँघा। उसका चेहरा एक पल में सफ़ेद हो गया।
"ये तो…" उसने शीशी को अपनी हथेली पर पलटा। "ये तो वही दवा है जो बच्चों को कभी नहीं देनी चाहिए।"
"क्या है?" मैंने पूछा।
सुमन ने शीशी मुट्ठी में बंद कर ली। "ये बड़ों की दवा है। साँस रोक देती है। बच्चे को दी तो शरीर अंदर से ठंडा पड़ने लगता है।" उसने छोटू की तरफ़ देखा। "इसकी हालत इसीलिए बिगड़ी। इसने पानी में घोलकर दी होगी।"
काकी की रोने की आवाज़ बढ़ गई। "मैंने देखा था… मैंने देखा था उसे… पर समझी नहीं…"
"काकी," सुमन ने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा, "तुम्हारी वजह से ये बच्चा ज़िंदा है। तुमने गिलास नहीं पीने दिया। बस अब रोओ मत, मेरे साथ चलो। नर्स तुम्हें फ़ॉर्म भरने को कहेगी। जो-जो हुआ, सब बताना। हर शब्द।"
काकी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो नर्स के साथ चली गई, पर जाते-जाते मेरा हाथ थामे रही।
सुमन ने शीशी एक थैली में डालकर सील की। "ये लैब जाएगी। और मैं इसकी कॉपी रखूँगी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये आदमी बाहर गया, तो फ़ोन करेगा। किसी को।"
"जानती हो किसे?"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो भाव था जो मैंने अदालत में देखा था — थकान और ज़िद एक साथ।
"मन्नू, इस अस्पताल में एक से एक आदमी भवानी का है। तुमने सुना नहीं, वो सफ़ेद कुर्ते वाला खुद क्या बोला — मुझे हुक्म मिला है। ऊपर से।"
"तो ऊपर वाला भी पकड़ा जाएगा।"
"पहले बच्चा बचे।" वो छोटू की तरफ़ मुड़ी। "नर्स, ऑक्सीजन का फ्लो बढ़ाओ। और मुझे ड्रिप में पोटैशियम चाहिए — अभी।"
वो काम में लग गई। मैं बाहर आया। गलियारे में बंसी दीवार से टिका खड़ा था, एक हाथ पट्टी में।
"वो आदमी?" मैंने पूछा।
"सिक्योरिटी वाला उसे नीचे ले गया। पर मन्नू…" बंसी ने आवाज़ धीमी की। "नीचे जाते वक़्त उसने जेब से कुछ निकालकर गलियारे के कोने पर बैठी औरत को दिया।"
"कौन औरत?"
"पता नहीं। सफ़ेद साड़ी, सिर ढका। वो उठकर सीढ़ियों से नीचे उतर गई।"
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