The Token System799 / 1154

The Token System – Chapter 799

6 min read November 6, 2026

“क्या हो रहा है?” उसने कहा।

“ये आदमी बच्चे का अँगूठा लगवा रहा था,” मैंने कहा। “बैग देखो।”

राजेंद्र ने बैग उठाया और काग़ज़ निकाले। एक पर छोटू का नाम था और नीचे लिखा था — “बाहर भेजने की सहमति।” अँगूठे की जगह खाली थी।

“ये क्या है?” राजेंद्र ने कहा।

“भवानी का होम भेजने का काग़ज़। बच्चे का अँगूठा लगते ही ये बच्चा सरकारी अस्पताल से निकल जाता।”

राजेंद्र ने आदमी को उठाया। तभी सुमन की आवाज़ आई — गलियारे के दूसरे छोर से।

“मन्नू!”

वो अपने पीछे हाथ हिला रही थी। मैं दौड़ा। छोटू के बिस्तर के पास नर्स खड़ी थी, मुँह पर हाथ रखे। छोटू का शरीर काँप रहा था, आँखें खुली थीं पर कुछ पहचान नहीं रहा था। सुमन ने उसकी बाँह में सुई लगाई और उंगली से काउंट करने लगी।

“रिपोर्ट,” उसने नर्स से कहा। “अभी। ब्लड टेस्ट पहले, फिर ड्रिप।”

“क्या हुआ?” मैंने कहा।

“ज़हर,” सुमन ने कहा। “कुछ ऐसा जो देर से असर करता है। मुझे अंदाज़ा है — चूहों की दवा या कोई कीटनाशक। इतनी छोटी मात्रा में कि बच्चा घंटे भर बाद गिरे और कोई समझ न पाए।”

“इलाज?”

“इलाज शुरू कर रही हूँ। पर मुझे तुरंत भर्ती करना होगा — आईसीयू में। इसके पहले कि ये और गिरे।”

“यहाँ भर्ती करो।”

“यहाँ जगह नहीं है।”

“तो जगह बनाओ।” मेरी आवाज़ अपने ही कानों में कठोर लगी। “ये बच्चा यहाँ से कहीं नहीं जाएगा।”

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सवाल पूछ रही थीं — क्यों इतना ज़ोर?

“अगर बाहर भेजा,” मैंने धीरे से कहा, “तो रास्ते में कुछ हो जाएगा। और कोई ये नहीं कहेगा कि कुछ हुआ।”

सुमन ने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया।

“ठीक है। वार्ड दो में एक बेड खाली है। मैं उसे आईसीयू में तब्दील करवाती हूँ। तू जा और राजेंद्र को कह — बाहर दरवाज़े पर आदमी खड़ा करे।”

“उस आदमी के साथ क्या किया?”

“राजेंद्र ने उसे नीचे बंद किया है। बैग मेरे पास।”

मैं सीढ़ियों की तरफ़ गया। नीचे लॉबी में राजेंद्र खड़ा था, आदमी उसके पीछे, हथकड़ी पहने, सिर झुकाए।

“बोल,” राजेंद्र कह रहा था। “किसने भेजा?”

“मैं डॉक्टर हूँ,” आदमी ने कहा। “डॉक्टर फ़तेह, नर्सिंग होम खेत्री। मुझे नौकरी पर रखा गया था। मुझे नहीं पता था काग़ज़ —”

“काग़ज़ पर बच्चे का नाम तेरे हाथ से भरा गया,” राजेंद्र ने कहा।

तभी अस्पताल के बाहर की तरफ़ से क़दमों की आवाज़ आई — तेज़, कई लोगों की। दरवाज़ा खुला और रामदीन अंदर आया, पीछे विक्रम और एक सिपाही। रामदीन के हाथ में एक पुराना पीला लिफ़ाफ़ा था।

“मन्नू,” उसने कहा, “हवेली से निकलकर सीधे यहाँ आया। वो आदमी जो तुझे फ़ोन कर रहा था, हवेली के पीछे नहीं है। वो यहीं था।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“क्या मतलब?”

“हवेली के पीछे वाली आवाज़ रिकॉर्ड थी — धमकी हवेली से नहीं, इसी अस्पताल के किसी कमरे से बोली गई थी। पीछे लगी है। उसने तुझे हवेली भेजकर यहाँ का रास्ता ख़ाली करना चाहा।”

“और वो?” मैंने उस सफ़ेद कुर्ते वाले की तरफ़ इशारा किया।

“ये तो मोहरा है,” रामदीन ने कहा। “असली आदमी वो है जिसने इसे भेजा।”

वो डॉक्टर फ़तेह मेरी तरफ़ देखकर बोला, “मुझे नहीं पता, मुझे तो बस ये काग़ज़ दिया गया था। कहा गया था कि वार्ड में बच्चे का अँगूठा लगवा दो, बदले में मेरे होम के तीन महीने का किराया माफ़।”

“किसने कहा?”

“वो आदमी जो होम के पीछे बैठता है — पीली अँगूठी वाला।”

मैंने देखा कि रामदीन का हाथ काँप रहा था। वो आगे आया, छोटू की तरफ़ बढ़ा और उसका माथा छुआ।

“ये बच्चा भवानी का मरीज़ नहीं है,” उसने कहा, आवाज़ भारी थी। “ये बच्चा इसकी माँ का है — कमला का। और कमला —”

वो रुका।

“क्या?” मैंने कहा।

“कमला मेरी बहन थी,” रामदीन ने कहा। “जिसका नाम बही से मिटाया गया था।”

कमरे में एक पल को सब रुक गया। सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। बंसी दरवाज़े पर खड़ा था, मुँह खुला।

“तो ये बच्चा तेरा भांजा है?” मैंने कहा।

“हाँ। और भवानी ने ये बच्चा छह महीने पहले अपने होम में भर्ती करवाया था — मेरी बहन को डराकर। उसने कहा था, बच्चे को बचाना है तो हवेली का काग़ज़ भवानी के नाम कर दो।”

“और कमला ने नहीं किया,” बंसी ने कहा।

“नहीं किया। इसलिए उसे भी नर्सिंग होम में डाल दिया गया, बच्चे के साथ। फिर शेखर बाबू ने उसे बचाया — बाहर निकलवाया। कमला आज भी उसी खेत्री की झुग्गी में छिपी है।”

रामदीन ने छोटू की तरफ़ देखा और उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

“ये ज़हर इस बच्चे को भवानी के आदमी ने दिया। ताकि अगर काग़ज़ वाले दाँव न चले, तो बच्चा ही खत्म हो जाए और कमला टूट जाए।”

मेरे पेट में ऐसी ठंडी चीज़ उठी जो मुँह से बाहर आनी थी, पर मैंने खींच ली। मैंने छोटू की तरफ़ देखा — कम्बल के नीचे वो छोटा से शरीर, नसों में ड्रिप, होठ सूखे।

“सुमन,” मैंने कहा, “इसे बचाना है। जो चाहिए वो लगा। जो दवा चाहिए वो मँगा। पैसे की बात मत कर।”

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “पैसे?”

“मेरे पास है।”

वो एक पल मेरी आँखों में देखती रही, फिर सिर हिलाया।

“ठीक है। पर तू मेरे सवाल का जवाब दे — तेरे पास इतना पैसा कहाँ से आता है बार-बार?”

“बाद में।”

“यही तो तू हर बार कहता है।”

“बाद में, सुमन।”

वो चली गई। मैंने डॉक्टर फ़तेह की तरफ़ देखा।

“तू मेरे साथ चल,” मैंने राजेंद्र से कहा। “इसका बयान इसके होम वालों की मौजूदगी में होगा।”

“मैं क्या करूँ?” विक्रम ने कहा।

“तू दरवाज़े पर खड़ा रह। और जो भी सफ़ेद कुर्ते में दिखे, उसकी तलाशी।”

रामदीन ने मेरा हाथ पकड़ा। “मन्नू, एक बात।”

“क्या?”

“हवेली के पीछे जो आवाज़ बोली थी वो रिकॉर्ड थी, पर वो रिकॉर्ड बजाने वाला यहीं था। मुझे लगता है इस अस्पताल में उसका कोई अड्डा है। पीछे की तरफ़ पुराना रिकॉर्ड कमरा है न?”

“हाँ।”

“वहाँ जाकर देख। मैंने यहाँ आते वक़्त देखा कि उस कमरे की खिड़की के पीछे रोशनी थी — और सुबह वहाँ सन्नाटा था।”

राजेंद्र ने सिर हिलाया। “मैं दो सिपाही लेकर चलता हूँ।”

“मैं भी चलूँगा,” मैंने कहा।

पुराना रिकॉर्ड कमरा अस्पताल की दूसरी मंज़िल के कोने पर था — बंद दरवाज़ा, ऊपर धूल में मकड़ी के जाले। राजेंद्र का सिपाही दरवाज़े पर था जब हम पहुँचे।

“दरवाज़ा बंद है साहब,” उसने कहा। “अंदर से आवाज़ आ रही थी, फिर बंद हो गई।”

“तोड़ो।”

“पर —”

“तोड़ो।”

सिपाही ने कंधा मारा। दरवाज़ा जर्जर था, दूसरी बार में खुल गया। अंदर अँधेरा था, रोशनी केवल खिड़की से, और धूल की मोटी परत।

मेज़ पर एक छोटा टेप रिकॉर्डर रखा था — पुराना, चमड़े के बैग वाला। उसकी टेप अभी भी घूम रही थी। मैंने बटन दबाया तो काकी की आवाज़ आई — “बंसी… वो फिर आ गए…” — और फिर वही मोटी आवाज़।

“ये रिकॉर्ड यहीं बना,” राजेंद्र ने कहा।

“हाँ।” मैंने रिकॉर्डर उठाया। उसके नीचे एक पीली पर्ची थी — कोना-चिह्न के साथ। मैंने पढ़ा —

“हिसाब अब बच्चों पर नहीं, बड़ों पर चलेगा। — तीसरा।”

राजेंद्र ने पर्ची पढ़ी। “तीसरा?”

“वो,” मैंने कहा। “जिसका नाम कोई काग़ज़ नहीं बताता।”

तभी सुमन की आवाज़ दरवाज़े से आई। “मन्नू!”

वो हाँफ रही थी, हाथ में एक काग़ज़ था — फटा, पीला, फोल्ड किया हुआ।

“रिपोर्ट आ गई,” उसने कहा। “ज़हर की पुष्टि हो गई — चूहा मारने की दवा, पानी में घोली हुई। ये बच्चा बच जाएगा, पर उसे दो दिन रहना पड़ेगा।”

“ठीक है।”

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