The Token System798 / 1154

The Token System – Chapter 798

7 min read November 6, 2026

बंसी ने पानी की बोतल खोली और छोटू को पिलाया। राजेंद्र ने अपनी गाड़ी बुलाई ताकि छोटू को अस्पताल ले जाया जाए। हम उसे बाहर ले आए। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे पर लगी और वो थोड़ा सुकून से साँस लेने लगा।

अस्पताल के बाहर विक्रम ने कहा, “तिजोरी खुल चुकी है, दादा का काग़ज़ हमारे पास है और भवानी के आदमी पकड़े गए हैं। अब अगला काम साफ़ है — भवानी के सारे काग़ज़ अदालत में पेश करना। जज के सामने आज नहीं तो कल सच आएगा ही।”

“अदालत से पहले एक काम बाकी है,” मैंने कहा।

“क्या?” विक्रम ने पूछा।

“छोटू को सुरक्षित रखना। भवानी के आदमी अभी भी काकी के घर पर थे। सिपाही उन्हें ले गए, पर भवानी के पास और भी आदमी हैं। अगर उसे पता चल गया कि बच्चा बच गया, तो वो कुछ और करेगा। हमें छोटू और काकी को किसी सुरक्षित जगह पर रखना होगा।”

विक्रम ने सिर हिलाया। “मेरे घर पर रख लो। किसी को पता नहीं चलेगा।”

“ठीक है,” मैंने कहा। “कल सुबह हम अदालत जाएँगे। पर आज रात…”

मेरी बात अधूरी रह गई। बंसी की जेब में मोबाइल बजा। उसने निकाला और स्क्रीन देखी।

“काकी का नंबर है,” उसने कहा और फ़ोन उठाया।

“काकी?” उसने कहा।

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई — काकी की नहीं, किसी आदमी की। मोटी, धीमी आवाज़।

“काग़ज़ दे दे, वरना तेरा पोता अस्पताल से घर नहीं जाएगा।”

बंसी का चेहरा पत्थर हो गया। उसने मेरी तरफ़ देखा और फ़ोन स्पीकर पर डाल दिया।

“कौन बोल रहा है?” मैंने कहा।

“बात करने वाला भवानी का आदमी हूँ,” आवाज़ आई। “बुढ़िया और उसका पोता दोनों मेरे कब्ज़े में हैं। तू सोच रहा होगा कि तूने बच्चे को बचा लिया। वो तो बस इम्तिहान था। असली बात ये है कि तेरे पास जो काग़ज़ है, वो मेरे हाथ में आते ही बच्चा घर पहुँच जाएगा। वरना अस्पताल का दरवाज़ा उसके लिए हमेशा के लिए बंद।”

बंसी हँसा। “तू झूठ बोल रहा है। काकी घर पर हैं और छोटू बाहर।”

“तो फ़ोन का नंबर देख,” आवाज़ आई। “काकी का घर का फ़ोन है। और अगर अभी भी यक़ीन नहीं आता, तो सुन।”

फ़ोन में खड़खड़ाहट हुई। फिर काकी की फटी आवाज़ आई, “बंसी… वो फिर आ गए… वो लोग छत से आए…”

आवाज़ कट गई। फ़ोन पर वही मोटी आवाज़ लौटी। “अब बता, काग़ज़ कहाँ मिलेगा?”

मैंने फ़ोन की तरफ़ देखा। विक्रम ने मेरी तरफ़ देखा। बंसी की मुट्ठी कस गई।

“एक घंटा देता हूँ,” आवाज़ आई। “काग़ज़ लेकर पुरानी हवेली के पीछे आ जा। और अकेला। वरना बुढ़िया का पोता फिर वहीं लौट जाएगा, जहाँ से तूने उसे अभी निकाला है।”

फ़ोन कट गया। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।

“अब?” उसने कहा।

मैंने मेडिकल की सीढ़ियों से नीचे देखा — नीचे गाड़ियाँ, सिपाही, रोशनी। और ऊपर छोटू की आवाज़ आ रही थी, नर्स को कुछ बता रहा था।

मैंने टोकन जेब से निकाला। यह बार वो सिर्फ़ गरम नहीं था। उस पर एक शब्द उभरा था — हवेली।

॥

“हवेली,” बंसी ने मेरे हाथ से टोकन देखा। “अब हवेली क्यों?”

मैंने टोकन जेब में ठूँसा और मेडिकल की सीढ़ियों की तरफ़ भागा।

“वो काकी के घर से बोल रहा था,” मैंने कहा, “पर छोटू यहाँ है। मतलब वो दो जगह बँटा है। जो आदमी हमें फ़ोन कर रहा है, वो हवेली के पीछे बैठा है। और छोटू के कमरे में कोई उसका आदमी है।”

बंसी मेरे साथ भागा। “तो फ़ोन किसने किया?”

“जिसने काकी की आवाज़ रिकॉर्ड की है। शायद आज रात फिर।”

अस्पताल के अंदर घुसते ही मैंने सुमन को फ़ोन मिलाया। घंटी तीन बार बजी, फिर उठी।

“मन्नू, तू कहाँ है?” सुमन की आवाज़ में हवा की सी सनसनाहट थी, जैसे वो भाग रही हो।

“अस्पताल आ रहा हूँ। छोटू कैसा है?”

“बिगड़ रहा है। बुख़ार उतरा नहीं, साँस भारी हो गई। और यहाँ एक आदमी घूम रहा है जो बार-बार तीस नंबर वार्ड के बाहर से गुज़रता है। मैंने उसे रोका तो बोला — मैं साहब का आदमी हूँ, बच्चा साहब का मरीज़ है।”

“उसे वार्ड से दूर रख। मैं पाँच मिनट में पहुँच रहा हूँ।”

“जल्दी कर।”

फ़ोन कटा। बंसी मेरे पीछे दौड़ रहा था, एक हाथ पर पट्टी बँधी थी, फिर भी सीढ़ियाँ दो-दो चढ़ रहा था।

“एक बात पूछूँ?” उसने कहा।

“पूछ।”

“अगर ये सब भवानी का खेल है, तो हवेली के पीछे वो हमें क्यों बुला रहा है जब उसे पता है कि काग़ज़ हमारे पास है?”

“क्योंकि उसे नहीं पता कि काग़ज़ कौन सा है। उसे लगता है हमारे पास एक ही काग़ज़ है — काकी वाला। वो चाहता है कि हम वही लेकर आएँ, ताकि बाकी काग़ज़ वो अदालत से पहले जला दे।”

बंसी ने कुछ नहीं कहा।

तीस नंबर वार्ड का दरवाज़ा खुला था। अंदर सफ़ेद रोशनी थी और बच्चों की खाँसी की आवाज़ें। छोटू बिस्तर पर पड़ा था, चेहरा पीला, होंठ सूखे। उसके बगल में एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था, हाथ में काग़ज़ और स्याही पैड। काकी की कुर्सी छोटू के बिस्तर के पास खाली पड़ी थी।

“अँगूठा यहाँ लगाओ,” वो आदमी छोटू के हाथ की तरफ़ झुक रहा था। “बस एक अँगूठा। फिर तू घर चला जाएगा।”

“हाथ हटा।”

मैंने उसका कंधा पकड़कर खींचा। वो घूमा — चालीस के आसपास, गोल चेहरा, चमड़े का बैग कंधे पर।

“तू कौन है?” उसने कहा।

“ये बच्चा मेरे साथ जाएगा,” मैंने बिस्तर और उसके बीच खड़े होकर कहा। “तू कौन है?”

“मैं भवानी साहब के होम से आया हूँ —”

“भवानी साहब इस वक़्त हवालात में हैं,” मैंने कहा। “उनका होम बंद है। तो तू किसका आदमी है?”

आदमी का चेहरा एक पल के लिए ढीला पड़ा, फिर उसने बैग सीना से लगाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

“एक मिनट।”

सुमन दरवाज़े पर खड़ी थी, दोनों हाथ जेब में, स्टेथोस्कोप गले में।

“बच्चे के कमरे से निकल,” उसने कहा। “वरना मैं सिक्योरिटी बुलाती हूँ।”

“डॉक्टर साहब, मैं तो बस —”

“मैंने कहा निकल।”

आदमी दरवाज़े से फिसला और गलियारे में तेज़ क़दमों से निकल गया। सुमन अंदर आई, छोटू की कलाई पकड़ी, नाड़ी देखी, फिर बच्चे की आँख की पुतली में टॉर्च मारी।

“ये नींद में नहीं है,” उसने कहा। “ये बेहोशी है।”

“क्या हुआ इसे?”

“मुझे शक है कुछ खिलाया गया है। पिछले एक घंटे में किसी ने इसे कुछ दिया — पानी, दूध, कुछ भी।”

“काकी?”

“काकी तो यहाँ थी, पर वो पंद्रह मिनट पहले बाहर गई — किसी ने उसे नीचे बुलाया।”

मैंने बंसी की तरफ़ देखा।

“वो फ़ोन,” बंसी ने कहा। “काकी का घर से नहीं था। वो यहीं से बोला गया था। काकी को नीचे बुलाया गया, उससे फ़ोन करवाया गया, फिर उसे किसी कमरे में बंद कर दिया गया।”

“तो काकी अस्पताल में ही है?” मैंने कहा।

“हो सकती है,” सुमन ने कहा। “नीचे इमरजेंसी के पीछे दो कमरे बंद पड़े हैं जिनका ताला स्टोर का है।”

“तू छोटू के पास रह,” मैंने सुमन से कहा। “बंसी, तू नीचे चल। मैं उस आदमी को पकड़ता हूँ।”

“अकेला मत जा,” बंसी ने कहा।

“तू काकी को ढूँढ। मैं उसे।”

मैं गलियारे में भागा। सफ़ेद कुर्ते वाला अभी सीढ़ियों की तरफ़ जा रहा था। मैंने उसकी कमर पर बैग देखा — चमड़े का, बड़ा, भारी। मैंने दौड़कर उसका बैग पीछे से खींचा। वो लड़खड़ाया, सीढ़ी की रेलिंग पकड़ी और मुड़ा।

“तू मुझे छू नहीं सकता,” उसने कहा।

“ये बैग क्या है?”

“काग़ज़।”

“कौन से काग़ज़?”

वो सीढ़ियों से नीचे भागने लगा। मैंने उसकी बाँह पकड़ी। उसने बैग मेरे मुँह पर दे मारा — कोना मेरे गाल पर लगा, आँख के नीचे जलन हुई। मैंने उसका हाथ मरोड़ा और वो सीढ़ियों पर गिरा। बैग खुला, काग़ज़ फैल गए — कुछ सफ़ेद, कुछ पुराने पीले। नीचे सीढ़ी पर एक सिपाही की गोली जैसी आवाज़ आई — राजेंद्र अपने दो सिपाहियों के साथ सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।

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