The Token System – Chapter 795
पीछे से राजेंद्र की गाड़ी का हॉर्न बजा।
और मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया — और उस नई लकीर के नीचे “र” के बाद, जैसे कोई हाथ धीरे-धीरे बाक़ी अक्षर लिख रहा हो, मुझे लगा कि टोकन को अब पता है कि सच किसके नाम पर खुलेगा।
अदालत के अंदर की हवा बाहर से भारी थी। छत के पंखे धीरे घूम रहे थे, और किसी की कलाई की घड़ी की टिक-टिक पूरे हॉल में सुनाई दे रही थी।
हम पीछे की बेंच पर बैठे। कुँवर सबसे आगे। उसके हाथ में एक काग़ज़ था जो शेखर बाबू ने दिया था — उस पर रामदीन का पूरा बयान लिखा था।
“पढ़ लिया?” शेखर बाबू ने पूछा।
“पढ़ लिया,” कुँवर ने कहा। “पर एक लाइन समझ नहीं आई। यहाँ लिखा है कि हिसाब लिखने वाले का हाथ काँपता नहीं था। मतलब?”
रामदीन पीछे से बोला, “मतलब ये कि जो आदमी झूठे हिसाब लिखता है, उसका हाथ काँपता है। मेरा नहीं काँपा। क्योंकि मैंने झूठ नहीं लिखा था। मैंने बस वही लिखा जो भवानी ने बोला।”
“तो गुनाह किसका?” कुँवर ने पूछा।
“काग़ज़ पर मेरा नाम है,” रामदीन ने कहा। “गुनाह तो मेरा ही है।”
शेखर बाबू ने बीच में टोका, “अभी गुनाह की बात मत करो। पहले सुखदेव माली को ढूँढ़ो।”
“माली तो बाग़ में मिलेगा,” बंसी ने कहा।
“वो बाग़ अब भवानी का नहीं रहा,” शेखर बाबू ने कहा। “तुम जाओ, पता करो। मैं यहाँ कुँवर के साथ रहूँगा।”
बंसी उठा। मैं भी उठा।
“तू बैठ,” बंसी ने कहा। “तू यहीं रह।”
“मैं चलूँगा,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे पास एक टोकन है जो अभी ‘र’ लिख रहा है। मुझे देखना है कि ‘र’ के बाद क्या आता है।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया। हम बाहर निकले।
बाग़ का गेट खुला था, पर अंदर कोई नहीं था। माली की क्यारियाँ सूखी पड़ी थीं। बंसी ने आवाज़ दी — कोई जवाब नहीं। हम पीछे की तरफ़ गए, जहाँ पुरानी झोपड़ी थी।
झोपड़ी के दरवाज़े पर ताला लगा था। ताले पर धूल जमी थी — जैसे महीनों से कोई नहीं आया।
“सुखदेव माली यहीं रहता था,” बंसी ने कहा। “दस साल पहले।”
“फिर?”
“फिर मालिक ने उसे हटा दिया। चाचा ने बताया था — भवानी ने खुद हटाया था।”
मैंने ताले को छुआ। ज़ंग लगा था। तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ, और इतना गरम हुआ कि मैंने तुरंत हाथ निकाल लिया।
“क्या हुआ?” बंसी ने पूछा।
“टोकन,” मैंने कहा। “यहाँ कुछ है।”
बंसी ने ताला तोड़ने के लिए पत्थर उठाया। “नहीं,” मैंने कहा। “रुक। अगर तोड़ेंगे, तो पता चल जाएगा कि हम आए थे।”
“तो?”
“तो पहले आसपास देखते हैं।”
हम झोपड़ी के पीछे गए। वहाँ एक खिड़की थी जिसका शीशा टूटा था। बंसी ने अंदर हाथ डाला और कुंडी खोली। हम अंदर घुसे। अँधेरा था। फर्श पर भूसा और टूटे गमले पड़े थे।
कोने में एक लोहे की संदूक थी। छोटी, पर भारी। बंसी ने उसे खींचा। बंद थी, पर ताला नहीं था। ढक्कन उठाया।
अंदर कुछ काग़ज़ थे। पुराने, पीले पड़े। और उनके नीचे एक डायरी।
मैंने डायरी खोली। पहले पन्ने पर नाम लिखा था — सुखदेव माली। और उसके नीचे एक लाइन — “जो मैंने देखा, वो लिख दिया। अगर मेरे बाद कोई पढ़े, तो सच जान ले।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “पढ़।”
मैंने पन्ने पलटे। ज़्यादातर बाग़ के काम का हिसाब था — पौधे, पानी, मज़दूरी। फिर एक पन्ना आया जहाँ लिखाई बदल गई थी। तारीख़ थी — बीस साल पुरानी।
“आज भवानी साहब ने मुझे हवेली बुलाया। बोले, तुम एक काग़ज़ पर गवाही देना। मैंने पूछा, किस बात की? बोले, बस इतना कि जो हिसाब मैंने लिखवाया, वो उन्होंने खुद लिखा था। मैंने कहा, साहब, मैं झूठ नहीं बोलूँगा। भवानी साहब हँसे। बोले, झूठ नहीं, बस नाम बदलना है।”
मैंने पन्ना पलटा।
“मैंने इनकार कर दिया। भवानी साहब ने कहा, ठीक है, सोच लो। अगले दिन मेरी क्यारी के पौधे उखड़े मिले। फिर मेरा बेटा बीमार पड़ा। डॉक्टर का ख़र्चा भवानी साहब ने दिया — और फिर वही बात दोहराई।”
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। “आगे।”
“आज मैंने गवाही दे दी। काग़ज़ पर मेरा अंगूठा है। मैंने कह दिया कि हिसाब भवानी के बाप हरि सिंह ने नहीं, भवानी ने खुद लिखवाया। पर मेरा दिल नहीं मानता। मैंने एक आदमी को बीच में खड़ा देखा था — जो कुछ नहीं बोला। बस देखता रहा।”
वहीं पन्ना ख़त्म हो गया। अगले पन्ने पर सिर्फ़ दो लाइनें थीं।
“अगर मैं मर जाऊँ, तो ये डायरी कुँवर को देना। वो अभी छोटा है, पर जब बड़ा हो, तो पढ़े।”
और नीचे — “ये हिसाब मेरे हाथ का नहीं है। ये हिसाब भवानी के मुँह का है।”
मैंने डायरी बंद की। मेरे हाथ काँप रहे थे।
“बंसी,” मैंने कहा, “ये डायरी अदालत में जानी चाहिए।”
“जाएगी,” बंसी ने कहा। “पर पहले सुखदेव को ढूँढ़ना होगा। वो ज़िंदा है तो गवाही देगा।”
“अगर ज़िंदा नहीं है?”
बंसी ने डायरी मेरे हाथ से ली और अपनी जेब में रखी। “तो ये डायरी ही गवाह बनेगी।”
हम झोपड़ी से बाहर निकले। तभी सामने की तरफ़ से आवाज़ आई — किसी के चलने की। हम दीवार के पीछे छिपे। एक आदमी आया। सफ़ेद कपड़े, हाथ में लाठी। उसने झोपड़ी के ताले को देखा, फिर खिड़की की तरफ़ बढ़ा।
“ये तो भवानी का आदमी है,” बंसी ने फुसफुसाया। “इसे कहते हैं जगत।”
जगत ने खिड़की के अंदर झाँका। फिर उसने भीतर जाने की कोशिश की। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और इशारा किया — “भाग।”
हम दीवार के सहारे-सहारे पीछे की तरफ़ निकले, और बाग़ की बाड़ कूदकर बाहर आए। पीछे से जगत की आवाज़ आई, “कौन है वहाँ!”
हम दौड़े। सड़क तक आए। बंसी ने एक ऑटो रोका।
“अदालत,” बंसी ने कहा।
ऑटो चला। मैंने पीछे देखा — जगत बाड़ के पास खड़ा था, और उसके हाथ में लाठी थी जो वो हवा में हिला रहा था, जैसे किसी को इशारा कर रहा हो।
अदालत पहुँचे तो कुँवर का नाम पुकारा जा रहा था। हम भीतर घुसे। शेखर बाबू ने हमें देखा और उनके चेहरे पर पहली बार थोड़ी राहत आई।
“कुँवर अंदर जा रहा है,” शेखर बाबू ने कहा। “तुम दोनों पीछे बैठो।”
कुँवर उठा। उसने अपनी कमीज़ ठीक की। फिर वो मुड़ा और मेरी तरफ़ देखा।
“डायरी मिली?” उसने पूछा।
“मिली,” मैंने कहा।
“उसमें क्या लिखा है?”
“जो तुझे सुनना चाहिए,” बंसी ने कहा। “पर अभी नहीं। पहले अंदर जा।”
कुँवर ने सिर हिलाया और भीतर चला गया।
अदालत के भीतर जज की कुर्सी ऊँची थी। कुँवर के सामने काग़ज़ रखे गए। जज ने पूछा, “कुँवर सिंह, क्या तुम्हारे नाम पर ज़मीन का हिसाब है?”
कुँवर ने कहा, “है।”
“कितनी?”
“तीन सौ बीस बीघा।”
हॉल में सन्नाटा छा गया। भवानी की तरफ़ से कोई उठा — उसका वकील।
“मैं ये कबूल नहीं करता कि वो ज़मीन मेरी है,” कुँवर ने कहा। “मैं बस इतना कहता हूँ कि काग़ज़ पर मेरा नाम है। मैंने वो ज़मीन आज तक नहीं देखी।”
जज ने भवानी की तरफ़ देखा। “भवानी सिंह, तुम्हारा क्या कहना है?”
भवानी खड़ा हुआ। उसकी आँखें कुँवर पर थीं। “मैं अपने बेटे को बचाने के लिए सब कुछ करूँगा।”
“बचाने की ज़रूरत नहीं,” कुँवर ने कहा। “मुझे सच चाहिए।”
शेखर बाबू खड़े हुए। “माई लॉर्ड, मेरे पास एक तस्वीर है।”
तस्वीर जज के सामने रखी गई। शेखर बाबू ने कहा, “इस तस्वीर के पीछे लिखा है — रामदीन ने हिसाब लिखा, पर भवानी ने उसे अपने नाम पर चढ़ाया। गवाह: सुखदेव माली।”
जज ने तस्वीर पलटी और पीछे की लिखाई पढ़ी। फिर उन्होंने रामदीन की तरफ़ देखा।
“रामदीन, तुम इस बारे में क्या कहते हो?”
रामदीन खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मैंने हिसाब लिखा था। पर मैंने उसे किसी के नाम पर नहीं चढ़ाया। चढ़ाने वाला कोई और था।”
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