The Token System – Chapter 794
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। फिर राजेंद्र की तरफ़। फिर मेरी तरफ़। उसके होंठ हिले, पर पहले कुछ नहीं निकला। फिर वो बोला, “मैं तुझे बचा रहा था।”
कुँवर हँसा। वो हँसी नहीं थी — वो आवाज़ थी जो तब निकलती है जब अंदर कुछ टूटता है। “बचा रहा था?” उसने दोहराया। “मुझे किससे बचा रहा था, ठाकुर साहब? उसी हिसाब से बचा रहा था जिसमें मेरा नाम सबसे ऊपर लिखा है? या उस हिसाब से जिसमें मेरा नाम ही मेरे बाप ने मिटाया है?”
“तेरा बाप तो वही है,” भवानी ने रामदीन की तरफ़ इशारा करके कहा। “जो तेरे आगे खड़ा है।”
“मेरा बाप,” रामदीन ने पहली बार अपनी आवाज़ में ज़ोर लाकर कहा, “कभी नहीं था और कभी नहीं होगा — जिसने मेरे नाम पर काग़ज़ लिखा और सोचा कि उसका बेटा मेरा बेटा बन जाएगा। तूने मुझे बस एक घूँघट की तरह पीछे रखा। भवानी को जो लोग चाहते थे, उनसे तू मुझे छिपाता रहा, और मुझे लगा कि तू बचा रहा है — पर तू बस अपना हिसाब बचा रहा था।”
भवानी का चेहरा बदला। सिपाहियों ने उसकी बाँह पकड़ी, पर उसने हाथ झटक दिया और आगे बढ़ा।
“तू बोलता है कि तूने कुछ नहीं देखा,” वो कुँवर से बोला, और उसकी आवाज़ अब सिपाहियों की भीड़ में भी साफ़ सुनाई दे रही थी। “मैं तुझे बताता हूँ कि मैं क्या करता था। जब तेरी माँ मरी थी — मेरी नहीं, मेरी बीवी बीरा — तू तब पैदा भी नहीं हुआ था। उस रात को होम के पीछे के कमरे में मैंने तेरी माँ का हाथ पकड़ा था और उसे कहा था — ‘बच्चा मेरे नाम पर रख देंगे, काग़ज़ पर।’ नहीं तो उस साल होम पर बंबई की कंपनी का क़र्ज़ आ गया होता, और तू और मैं सड़क पर होते।”
“तो तूने मेरा नाम क़र्ज़ के बदले गिरवी रखा,” कुँवर ने कहा। “मुझे बताए बिना।”
“मैं तुझे बताता तो तू पूछता — क्यों? और मैं जवाब नहीं दे सकता था,” भवानी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो लाचारी थी जो मैंने उसके मुँह से कभी नहीं सुनी थी। “मैं तेरे बाप की क़सम खाता हूँ, कुँवर — मैंने जो भी किया, तेरे बाप ने मुझे करने को कहा था। ये तेरा रामदीन नहीं — मेरा बाप हरि सिंह। उसने ही कहा था, ‘बेटे के नाम पर रख, काम दूसरों से करा।’ मैंने तुझे बचाया था।”
“झूठ,” कुँवर ने कहा। एक शब्द। दो अक्षर। पर उसने पूरी गली में गूँज कर दिया।
राजेंद्र आगे आया और भवानी के हाथ पर हाथ रखा। “अदालत बुला रही है,” उसने कहा। “वहीं बोलना, ठाकुर साहब। यहाँ नहीं।”
भवानी ने कुछ कहना चाहा, पर राजेंद्र ने हल्का दबाव बनाया और वो चुप हो गया। राजेंद्र हमारी तरफ़ मुड़ा।
“तुम सब अदालत चलो। हम लोग भी आ रहे हैं। साढ़े नौ बजे।”
हम चल पड़े। गली से बाहर निकले, सड़क पार की, और सड़क के किनारे पुराना बरगद का दरख़्त आया — जहाँ किसी ज़माने में हम बंसी के साथ बैठकर चाय पीते थे।
शेखर बाबू रास्ते में हमारे साथ थे। वो चुप थे — जब से रामदीन की बही खुली थी, वो एक लकीर भी नहीं बोले थे। पर जब हम बरगद के पास पहुँचे, तो उन्होंने अपना ब्रीफ़केस खोला और उसमें से एक चीज़ निकाली जो मैंने पहले नहीं देखी थी।
वो एक तस्वीर थी। पुरानी, स्याह-सफ़ेद, किनारों से मुड़ी हुई। शेखर बाबू ने उसे धीरे से मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“ये मुझे रिकॉर्ड कमरे के पीछे वाले रैक से मिली थी,” उन्होंने कहा। “जिस दिन तुम सिर फुड़वाकर आए थे — उसी दिन। मैंने उसे बैग में रख लिया था। सोचा, जब वक़्त आएगा तब दिखाऊँगा। अब वक़्त आया है।”
मैंने तस्वीर पलटी।
उसमें हवेली का सामने का हिस्सा दिख रहा था — वो हवेली जिसका आज सिर्फ़ आधा हिस्सा बचा है। सामने तीन आदमी खड़े थे। बायें तरफ़ एक लंबा आदमी था, सूट पहने हुए, हाथ में कुछ काग़ज़ — मैंने उसे भवानी के पुराने काग़ज़ों में देखा था, पर यहाँ वो जवान था। दाहिने तरफ़ एक और आदमी था, जिसका चेहरा धुँधला था — सिर्फ़ कंधे और हाथ दिख रहे थे। और बीच में — बीच में एक हाथ था, जो मेज़ पर काग़ज़ रख रहा था। हाथ की उँगली पर पीतल की एक मोटी अँगूठी थी।
मैंने तस्वीर गौर से देखी। बायें वाला आदमी — मैंने उसकी आँखें पहचानीं। वो भवानी का बाप था। हरि सिंह। पर वो इतना जवान था कि मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ।
“पीछे देखो,” शेखर बाबू ने कहा।
मैंने तस्वीर पलटी। पीछे पेंसिल से मोटी लिखाई में लिखा था — “रामदीन ने हिसाब लिखा, पर भवानी ने उसे अपने नाम पर चढ़ाया — गवाह: सुखदेव माली।”
मेरे हाथ से तस्वीर फिसल गई। बंसी ने उसे हवा में ही पकड़ लिया। उसने एक नज़र देखा और फिर मेरी तरफ़ देखा।
“गवाह,” बंसी ने धीरे से कहा, “तेरा दादा।”
रामदीन ने तस्वीर बंसी के हाथ से ली। उसने उसे देखा और उसका चेहरा एक पल के लिए बदल गया — फिर वापस सपाट हो गया।
“मुझे याद है,” रामदीन ने कहा। “ये तस्वीर उस दिन की है जब भवानी ने पहली बार हवेली का हिसाब अपने नाम लिखवाया था। मेरा बाप वहाँ था। सुखदेव माली वहाँ था। और वो धुँधला आदमी — जो आज तक किसी काग़ज़ पर पूरा नहीं आया।”
“कौन?” मैंने पूछा।
“मैंने उसे बहुत बार पूछा,” रामदीन ने कहा। “मेरा बाप कभी नहीं बोला। बस इतना कहता था — ‘जो बीच में खड़ा है, वो कोई नहीं है। वो हरि सिंह की सूरत है।’”
मैंने तस्वीर फिर देखी। बीच वाला आदमी — अगर वो कोई नहीं था, तो उसका हाथ तस्वीर में क्यों था? और अगर उसका हाथ था, तो उसकी अँगूठी क्यों पहचानी जा सकती थी?
“ये तस्वीर अदालत में जाएगी,” मैंने कहा।
“जाएगी,” शेखर बाबू ने कहा। उन्होंने तस्वीर वापस अपने बैग में रखी और बैग बंद किया। “पर एक बात सुन लो।”
हम सब रुके।
“रामदीन ने हिसाब लिखा,” शेखर बाबू ने कहा, “पर भवानी ने अपने नाम चढ़ाया। यानी हिसाब का लिखने वाला और हिसाब का मालिक अलग-अलग थे। आज अदालत में अगर ये साबित हो गया, तो भवानी का पूरा हिसाब हिल जाएगा। और अगर नहीं हुआ — तो सिर्फ़ कुँवर का नाम बचेगा, बाक़ी सब भवानी के नाम।”
“तो क्या करना होगा?” रीना ने पूछा। वो अब तक चुप थी।
“रामदीन को गवाही देनी होगी,” शेखर बाबू ने कहा। “और कुँवर को ये बताना होगा कि उसके नाम पर ज़मीन है — इतना तो कबूल करना ही होगा।”
“मैं कबूल करूँगा,” कुँवर ने कहा। “पर कबूल नहीं करूँगा कि वो ज़मीन मेरी है। वो ज़मीन नहीं, हिसाब है। और हिसाब मेरा नहीं।”
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। वो चुप खड़ा था। फिर उसने धीरे से कहा, “कुँवर।”
कुँवर ने उसकी तरफ़ देखा। पहली बार उसकी नज़र में कुछ था जो ग़ुस्सा नहीं था।
“तेरी माँ की क़सम,” रामदीन ने कहा, “जब अदालत में बोले, तो सच बोल। चाहे वो सच मेरे ख़िलाफ़ हो, तेरे ख़िलाफ़ हो, या भवानी के ख़िलाफ़।”
कुँवर ने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया।
हम आगे बढ़े। अदालत की सड़क पर ट्रैफ़िक बढ़ रहा था, और दूर से अदालत की लाल इमारत दिख रही थी — जैसे कोई पुराना जानवर मुँह खोले बैठा हो।
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। मैंने हाथ जेब में डाला। मेरी उँगली टोकन पर रखी। लकीरें — तीन, चार, पाँच — फिर मैंने गिनना बंद कर दिया। पर शब्द नहीं था। सिर्फ़ गरमाहट।
फिर मैंने देखा — टोकन पर एक नई लकीर उभर रही थी, और उस लकीर के नीचे एक अक्षर। बस एक अक्षर। “र।”
मैंने टोकन जेब में रखा और चलता रहा। रामदीन के चेहरे पर जो बात अधूरी थी, वो मुझे अब समझ आ रही थी।
अगर रामदीन ने हिसाब लिखा था, तो हिसाब में नाम किसका लिखा जाएगा? लिखने वाले का या चढ़ाने वाले का?
हम अदालत के गेट पर पहुँचे। सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
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