The Token System – Chapter 793
“ये मेरी माँ का था,” उसने कहा। “इस पर कोई अंक नहीं। सिर्फ़ एक लकीर है।”
मैंने टुकड़ा लिया और अपने टोकन की तरफ़ देखा। दोनों के किनारों पर वो कोना-चिह्न था — एक जैसा।
“ये मेरे काम का नहीं,” कुँवर ने कहा। “पर ये मेरी माँ की निशानी है। मैं इसे तेरे टोकन के साथ रखूँगा — जब तक हिसाब पूरा नहीं होता।”
मैंने टुकड़ा उसे वापस कर दिया।
“रख,” मैंने कहा। “पर हिसाब की बात सबके सामने होगी।”
कुँवर ने सिर हिलाया।
“अब क्या होगा?” बंसी ने पूछा, जो अब तक चुप खड़ा था।
“अब अदालत,” हरीश चंद्र ने कहा। “सुबह दस बजे। और अब वहाँ सिर्फ़ तीन काग़ज़ नहीं जाएंगे — बही जाएगी, रसीद जाएगी, ये दो जन्म काग़ज़ जाएंगे, और ये लड़का भी जाएगा।”
उसने कुँवर की तरफ़ देखा।
“तू आएगा?” उसने पूछा।
“मैं तो पहले से आया हूँ,” कुँवर ने कहा। “अब सिर्फ़ गवाही बाकी है।”
भवानी ने एक आवाज़ निकाली, जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर राजेंद्र ने उसे रोक दिया। “तू अब चुप कर,” उसने कहा। “अदालत में बोलना।”
सिपाही भवानी को बाहर ले गए। उसकी गाड़ी का दरवाज़ा खुला और फिर बंद हुआ। इंजन की आवाज़ आई, और गाड़ी गली से निकल गई।
आँगन में अब सिर्फ़ हम लोग थे — माँ, रीना, बंसी, रामदीन, कुँवर, हरीश चंद्र, रघुवीर और मैं। सूरज पूरी तरह निकल आया था, और मोमबत्ती की लौ अब दिखती नहीं थी।
कुँवर ने एक गहरी साँस ली और आँगन के बीच खड़ा हुआ।
“अब सुनो,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब थकी हुई नहीं थी, बस सीधी थी। “मैं भवानी का बेटा नहीं हूँ। मैं रामदीन का बेटा हूँ। पर आज से मैं अपने बाप की गवाही में खड़ा नहीं होऊँगा, क्योंकि मेरे बाप ने भी मेरा नाम काग़ज़ पर ऐसे रखा जैसे कोई हिसाब की लाइन रखता है। मैं अदालत में सिर्फ़ अपनी माँ के नाम की गवाही दूँगा — बीरा देवी — और अपने नाम की।”
“और हिसाब?” रामदीन ने धीरे से पूछा।
“हिसाब,” कुँवर ने कहा, “मैं ख़ुद चुकाऊँगा।”
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
“तेरे साथ?” उसने पूछा।
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन गरम था, और उस पर एक नई लकीर उभर रही थी। मैंने उसे जेब में ही रहने दिया।
“मेरे साथ,” मैंने कहा।
कुँवर ने हाथ बढ़ाया। मैंने हाथ मिलाया। उसका हाथ ठंडा था, सूखा, जैसे उसने बहुत दिनों से किसी का हाथ न पकड़ा हो।
माँ ने आँगन की मोमबत्ती बुझाई और बोली, “अब चलो, अदालत के लिए देर हो रही है।”
रीना पहले ही दरवाज़े की तरफ़ बढ़ चुकी थी। बंसी अपने टूटे हाथ को सहलाते हुए बोला, “मेरा हाथ टूटा है, फिर भी मैं तेरे साथ चलूँगा।”
“तू तो हर हिसाब में मेरे साथ है,” मैंने कहा।
बंसी हँसा। “हिसाब का तो पता नहीं,” वो बोला, “पर बंदा अच्छा है।”
हम आँगन से बाहर निकले। हवेली का पिछला दरवाज़ा खुला रह गया, और उसमें से सुबह की रोशनी आँगन के पत्थरों पर पड़ रही थी — वही पत्थर जिनके नीचे से आज रात काग़ज़ निकले थे, और जिनके नीचे अभी भी कुछ नहीं निकला था।
गली के मोड़ पर सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। राजेंद्र उसके पास खड़ा था और उसने हमें देखा।
“अदालत,” उसने कहा, “साढ़े नौ बजे। मैं पहले पहुँचूँगा।”
“हम भी आ रहे हैं,” मैंने कहा।
वो गाड़ी में बैठा और चला गया।
रामदीन ने मेरा कंधा पकड़ा। “एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“तेरे टोकन पर जो नाम उभरा था — कुँवर — वो अब भी है?”
मैंने टोकन निकाला। नाम मिट गया था, और उसकी जगह नई लकीर के नीचे कोई शब्द नहीं था — सिर्फ़ खाली। पर लकीर अब गहरी थी।
“नहीं,” मैंने कहा। “अब कोई नाम नहीं।”
रामदीन ने टोकन को देखा, और उसका चेहरा कुछ कहने से पहले ही बुझ गया, जैसे उसे कोई ऐसी बात याद आ गई जो वो कहना नहीं चाहता था।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं,” रामदीन ने कहा। “चल।”
हम चले। पीछे कुँवर, माँ, रीना और बंसी। आगे मैं और रामदीन।
गली के मोड़ पर हवेली का पीछे का हिस्सा दिख रहा था, जहाँ उत्तर दीवार खड़ी थी, और उसका पत्थर अब भी नहीं हिला था — जैसे उसे पता हो कि अभी बहुत कुछ बाकी है।
मैंने टोकन जेब में रखा। वो गरम था, और मुझे लगा कि वो कुछ कहना चाहता है — पर कोई शब्द नहीं उभरा। सिर्फ़ लकीरें, और लकीरों के नीचे ख़ाली जगह, और उस जगह में कुछ ऐसा जो अभी नहीं खुला था।
॥
गली के मोड़ से जैसे ही हम आगे बढ़े, मैंने देखा कि कुँवर का रास्ता रोककर रामदीन खड़ा था — और उसके हाथ में बही थी। कुँवर बही को घूर रहा था, जैसे कोई जानवर पिंजरे में बंद चीज़ को घूरता है।
“मुझे दे,” कुँवर ने कहा।
रामदीन ने बही आगे बढ़ा दी। कुँवर ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और गली के किनारे पड़ी पुरानी चबूतरी पर धर दिया। फिर उसने पन्ने उलटने शुरू किए। हवा चल रही थी, पन्ने फड़फड़ा रहे थे, और कुँवर की उँगली एक-एक करके नामों पर रुक रही थी।
तभी उसकी उँगली रुकी।
मैंने गर्दन आगे की। पन्ने पर मोटी स्याही में लिखा था — “नाम: राघव उर्फ़ कुँवर। ज़मीन: तीन सौ बीस बीघा। हिसाब: चालू।”
कुँवर ने उस लाइन को दो बार पढ़ा। फिर तीसरी बार। फिर उसने सिर उठाया और देखा, जैसे उसे यक़ीन नहीं हो रहा कि काग़ज़ पर लिखा वो उसका ही नाम है।
“तीन सौ बीस बीघा?” उसने रामदीन की तरफ़ देखकर कहा। आवाज़ सपाट थी, जैसे वो किसी हिसाब की गिनती कर रहा हो। “मैंने ज़िंदगी में तीन सौ बीस बीघा ज़मीन देखी कहाँ है? मैंने इस शहर में एक फुट ज़मीन नहीं देखी जो मेरे नाम पर हो। मैं तो बस होम की रसोई में पानी भरता रहा और रात में रस्सी के सहारे बाहर निकलता रहा।”
“इसीलिए ये लाइन तेरे नाम पर है,” रामदीन ने कहा। उसकी आवाज़ में वो खुरदुरापन था जो बहुत पुरानी थकान से आता है। “काम किसी ने किया, नाम तेरे पर चढ़ा। काग़ज़ पर ज़मीन तेरी, पर ज़मीन पर कब्ज़ा उसका। जब पूछा जाए — तो जवाब तैयार है, ‘मेरे बेटे के नाम है, मैं तो कुछ नहीं जानता।’ यही तो भवानी का हिसाब है — हिसाब का बोझ बेटे के नाम, और फ़ायदा बाप की जेब।”
कुँवर ने बही बंद कर दी। उसके हाथ काँप रहे थे — पर ग़ुस्से से नहीं। कुँवर के हाथ जब काँपते हैं, तो वो ग़ुस्सा नहीं होता। वो कुछ सोच रहा होता है। मैंने उसे पहले भी देखा था — होम के आँगन में, जब वो पहली बार भागकर आया था।
“तीन सौ बीस बीघा,” कुँवर ने फिर कहा, धीरे से। “और मेरे पास मेरी माँ की एक पर्ची है, एक टूटा पीतल का टुकड़ा है, और एक जन्म काग़ज़ है जिस पर मेरा नाम है। बस। इतना ही।”
“अब इतना ही नहीं है,” मैंने कहा।
कुँवर ने मेरी तरफ़ देखा।
“अब बहुत कुछ है,” मैंने कहा। “अभी तो सब शुरू हुआ है।”
तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई। फिर वो आवाज़ आई जो मुझे रोज़ सुननी पड़ती थी — भवानी की आवाज़।
“रुको!”
वो राजेंद्र के दो सिपाहियों के साथ आ रहा था। हथकड़ी नहीं लगी थी, पर सिपाही उसके दोनों तरफ़ चल रहे थे, जैसे वो ख़ुद भी जानता हो कि भागने का कोई फ़ायदा नहीं। उसके बाल बिखरे थे, कुर्ते की कॉलर फटी थी। चेहरे पर वो रोब नहीं था जो महीनों से गली-गली में फैला था। अब वहाँ सिर्फ़ थकान थी — और कुछ और भी, जो मैंने पहले कभी उसके चेहरे पर नहीं देखा था।
वो आकर रुका। कुँवर से दूर, पर इतना दूर नहीं कि बात न सुनाई दे।
“तूने मेरा नाम काग़ज़ पर क्यों चढ़ाया?” कुँवर ने बिना देर किए पूछा। “मेरे नाम पर तीन सौ बीस बीघा। मैंने कभी उस ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं देखा। मैं तो तेरे होम के रसोई में बर्तन माँजता रहा।”
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