The Token System – Chapter 789
“ये क्या बकवास है?” भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार फटी। “मेरा बेटा कुँवर है। राघव कौन है?”
“तू खुद बता,” रामदीन ने बही को सीने से लगाए हुए कहा। “तेरे काग़ज़ों में तेरे बेटे का नाम राघव कबसे हो गया?”
“मेरे काग़ज़ों में मेरे बेटे का नाम वही है जो मैंने रखा था।”
तभी आँगन के कोने से बूढ़े की आवाज़ आई — वो बूढ़ा जो खुद को रामदीन का बाप कह रहा था, और अब तक चुप्पी साधे बैठा था। “नाम तूने रखा था, भवानी। पर बदला तूने। अपने ही हाथ से।”
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। “तू कौन है, जो मेरे बेटे के नाम पर बोल रहा है?”
बूढ़ा उठा। उसकी कमर झुकी हुई थी, और चलने में उसे लाठी का सहारा चाहिए था, पर उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी। “मैं वही हूँ जिसने तेरे बाप के लिए हिसाब लिखा था। और मैंने देखा है — जब तूने कुँवर को राघव से बदला था।”
“क्या मतलब?” रीना ने कहा।
बूढ़ा हँसा। हँसी सूखी थी। “तेरे भाई ने अपने बेटे का नाम हवेली की बही से मिटाने के लिए बदल दिया था। काग़ज़ों में जो बच्चा राघव था, वो घर में कुँवर हो गया। ताकि जिस दिन हिसाब खुले, उसका नाम अपने बेटे तक न पहुँचे।”
“बेकार की बातें,” भवानी ने कहा। पर उसका चेहरा सफ़ेद पड़ रहा था।
मन्नू ने एक कदम आगे बढ़ाया। “कुँवर ने खुद मुझे बताया था कि वो राघव का बेटा है। अस्पताल के बाहर। उसने कहा था कि उसका बाप राघव है, और वो भवानी के होम में बंद है।”
“कुँवर?” भवानी ने कहा। “वो बच्चा?”
“अब तुझे याद आ रहा?” बंसी ने कहा। उसका टूटा हाथ उसने अपने सीने से सटाया हुआ था। “जिसे तूने होम में छिपाकर रखा था, वो तेरा बेटा है। और उसका नाम काग़ज़ों में राघव लिखा है।”
“मेरा बेटा मेरे कामों से अलग है,” भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ अब भी बड़ी थी, पर कुछ अंदर से टूट रहा था। “मैंने उसे कभी अपने काम में नहीं घसीटा।”
“तो नाम बही में क्यों लिखा है?” रीना ने पूछा। “अगर वो अलग है, तो उसका नाम तेरे हिसाब की किताब में क्यों आया?”
भवानी ने कोई जवाब नहीं दिया।
रामदीन ने बही पर हाथ रखा। “हिसाब का काम बेटे से पूछना नहीं होता। हिसाब सिर्फ़ नाम देखता है। जो नाम उस पर लिखा है, उसे उसी आदमी से चुकाना पड़ेगा — चाहे वो कुँवर हो या राघव।”
“ये तेरा हिसाब है,” मन्नू ने कहा। “तेरे लिखे हुए नाम। तो इसे तूने ही बदला होगा।”
रामदीन ने सिर नहीं हिलाया। “नहीं। ये नाम मेरे हाथ का नहीं है।”
“तो किसका है?”
रामदीन ने बही के उस पन्ने को उँगली से दबाया। “इस पन्ने की स्याही दूसरी है। बाकी पन्नों से मोटी। और मेरी लिखाई नहीं।”
“तो किसकी है?” हरीश चंद्र ने अपनी लाठी आगे टेकी।
रामदीन ने बही को हरीश चंद्र की तरफ़ उठाया। “आप वकील हैं। पहचानिए।”
हरीश चंद्र ने बही को अपने हाथ में लिया, उस पन्ने को आँगन की मोमबत्ती के पास किया, और आँखें सिकोड़कर देखा। फिर उसने एक लंबी साँस ली।
“ये लिखाई डाक्टर जोशी की है,” उसने कहा।
“कौन?” मन्नू ने कहा।
“खेत्री अस्पताल का पुराना मुखिया,” शेखर बाबू ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ काँपा। “जिसके हस्ताक्षर तबादलों के काग़ज़ों पर थे।”
“ये लिखाई उसकी है?” माँ ने कहा।
“हाँ,” हरीश चंद्र ने कहा। “मैंने उसके हाथ के काग़ज़ बहुत देखे हैं। उसकी लिखाई में धार हमेशा बाईं तरफ़ झुकी रहती थी। यहाँ भी झुकी है।”
भवानी ने एक कदम पीछे हटाया। किसी ने नहीं देखा था, पर मन्नू ने देखा — भवानी का हाथ काँप रहा था।
“तो डाक्टर जोशी ने मेरे बेटे का नाम यहाँ क्यों लिखा?” भवानी ने पूछा।
“क्योंकि तेरे बाप ने लिखवाया था,” बूढ़े ने कहा। “उस रात जब हरि सिंह ने हिसाब बंद करने की कोशिश की थी।”
“चुप हो जा,” भवानी ने कहा।
बूढ़ा नहीं रुका। “तेरे बाप ने सोचा था — अगर बेटे का नाम बही से मिटा दिया, तो हिसाब उस तक नहीं पहुँचेगा। उन्होंने डाक्टर जोशी से कहकर नाम बदलवाया। पर डाक्टर जोशी ने सिर्फ़ आधा काम किया। ऊपर का नाम बदल दिया, नीचे अपनी असली लिखाई में छोड़ दिया। शायद उन्हें भी उस वक़्त पता था कि हिसाब से बचना नहीं होता।”
“मेरा बेटा इस हिसाब से नहीं जुड़ा,” भवानी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ टूटी।
“जुड़ा है,” रामदीन ने कहा। “बही में जो नाम आया है, वो जुड़ गया है। अब इसे मिटाने का सिर्फ़ एक तरीका है।”
“क्या?” विक्रम ने पूछा।
“कि उसका हिसाब खुले,” रामदीन ने कहा। “और वो चुके। जो छिपाकर रखा है, वो सब सामने आए।”
विक्रम ने बही को हरीश चंद्र से वापस लिया और उसे अपनी छाती से लगाया। “मेरे बाप का हिसाब भी इसी बही से जुड़ा है,” उसने कहा। “और विक्रम के नाम पर जो कुछ भी लिखा है, वो अब छिपेगा नहीं। मेरे बाप का भी नाम आएगा, और मेरा भी।”
“तो अब तिजोरी खुलेगी,” मन्नू ने कहा।
शेखर बाबू ने ज़ंग लगी चाबी को ताले में डाला। चाबी ऊपर छेद में गई, नीचे दबाई, और अंदर से एक कड़क की आवाज़ आई।
“खुल गई,” शेखर बाबू ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी।
“तो खोल,” भवानी ने कहा। “खोल और खुद देख — कि तेरे बाप का हिसाब भी वहीं था।”
शेखर बाबू ने दरवाज़ा खींचा। दीवार के पीछे बनी लोहे की तिजोरी से आवाज़ आई, और दरवाज़ा धीरे से खुला। अंदर कुछ नहीं था, सिर्फ़ एक मोटा काला लिफ़ाफ़ा। नीचे कुछ पुराने काग़ज़ थे, जो पहले से गठरी बने हुए थे।
विक्रम ने पहले उस काले लिफ़ाफ़े को उठाया। उसके ऊपर ताज़ी स्याही से एक लाइन लिखी थी।
“पढ़,” रामदीन ने कहा।
विक्रम ने पढ़ा — “इस लिफ़ाफ़े को खोलने वाला हवेली का मालिक नहीं, हवेली का कर्ज़दार बनेगा।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
“क्या बकवास है ये?” बंसी ने कहा। वो बोलने वाला था कि रुक गया। उसने मन्नू की तरफ़ देखा।
मन्नू ने लिफ़ाफ़ा विक्रम से लिया। वो हल्का था। उसने उसे उँगलियों में घुमाया, फिर पलटकर देखा। पीछे कुछ नहीं लिखा था, बस एक छोटा कोना-चिह्न।
“ये चिह्न तो हमारे टोकन जैसा है,” मन्नू ने कहा।
“हाँ,” रामदीन ने कहा। “यही तो वो लिफ़ाफ़ा है जो भवानी ने मुझे दिया था, जब उसने मुझसे कहा था कि उसका बेटा अब इस हवेली का नहीं रहा।”
“मैंने तुझे कब दिया?” भवानी ने कहा। “मैंने तो तुझे कुछ नहीं दिया।”
“तूने दिया,” रामदीन ने कहा। “उस रात, जब तूने मुझे कहा था कि कौशल्या का नाम किसी काग़ज़ पर नहीं आना चाहिए। और तूने ये लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में दिया था। बोला था — ‘इसे संभालकर रख, जिस दिन मेरा हिसाब खुले, इसे उस दिन खोलना।’”
“तो इसे न खोल,” भवानी ने कहा। “वरना तेरी बहन का भी हिसाब खुलेगा।”
“मेरी बहन?” रामदीन ने कहा। “मेरी बहन का हिसाब तो पहले ही खुल गया है। वो इसी हवेली में है।”
भवानी चुप हो गया।
“तो अब क्या करें?” रीना ने कहा।
मन्नू ने लिफ़ाफ़े को हवा में उठाया। “हम इसे खोलेंगे। और जो होगा, देखा जाएगा।”
“रुक,” बूढ़े ने कहा। वो आँगन के कोने से उठकर आया। उसने अपनी लाठी मन्नू की तरफ़ बढ़ाई। “लिफ़ाफ़ा खोलने से पहले, मैं एक बात कहना चाहता हूँ।”
“कह,” मन्नू ने कहा।
“मैंने तेरे दादा के साथ उस रात देखा था,” बूढ़े ने कहा। “जब हरि सिंह ने तेरे पापा को हवेली से भगाया था। और मैंने ये भी देखा था — जब हरि सिंह ने अपने ही बेटे का नाम बदला, ताकि हिसाब उस तक न पहुँचे।”
“तूने देखा था?” माँ ने कहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno