The Token System – Chapter 788
रामदीन ने पन्ने उलटकर देखे। “यहाँ कहीं और भी लिखा है। चार पन्ने पहले — ‘राघव के हाथ से हस्ताक्षर।’ मगर हस्ताक्षर में कोई अँगूठा नहीं, कोई पूरा नाम नहीं। सिर्फ़ एक छोटा-सा निशान, जैसे किसी ने कलम उठाई हो और फिर रख दी हो।”
“यानी वो बच्चा था,” सुमन ने कहा।
“या फिर,” रामदीन ने कहा, “जिसने ये काग़ज़ बनवाया, वो किसी का हस्ताक्षर करा नहीं पाया। इसलिए पीछे एक जगह, अलग से लिख दिया — ‘हिसाब बाकी।’ मतलब, ये काम आधा छूटा हुआ है।”
मन्नू ने आगे कदम बढ़ाया। “रुको। इसका मतलब ये है कि भवानी ने अपने ही बेटे के नाम पर ज़मीन करवाई, पर उसका कोई सबूत पूरा नहीं हुआ। तो वो बेटा कहाँ है? और वो कमला देवी की ज़मीन क्यों ले रहा था, जो उसकी खुद की मौसी थी?”
ये सुनकर माँ के हाथ से मोमबत्ती छूटने ही वाली थी। राखी ने झटपट उसे सहारा दिया।
“मन्नू,” माँ ने कहा, आवाज़ में कंपन था, “तेरी मौसी जो थी, वो इस घर के लोगों को जानती थी। जब वो बीमार हो गई, तब वो मुझसे मिलने आई थी। उसने मुझसे कहा था — ‘बेटी, मेरे काग़ज़ात किसी को न देना। भवानी का आदमी रोज़ आता है।’ मैंने उसकी बात हल्के में ली। फिर कुछ महीने बाद… वो चल बसी।”
“और उसके बाद,” रामदीन ने कहा, “उसके काग़ज़ात किसी ने नहीं देखे। कमला देवी के कमरे की तिजोरी खुली नहीं।”
“वो तिजोरी आज भी बंद है,” शेखर बाबू की आवाज़ गली के दरवाज़े से आई। वो लौट आए थे, छड़ी के सहारे, मगर इस बार उनका चेहरा बदला हुआ था। “मुझे याद आया। कमला देवी के हिस्से का एक काग़ज़ मेरी देखरेख में रखा गया था। जब भवानी ने उसका नाम बदलवाया, तो उसमें मेरा हस्ताक्षर था।”
“तुमने हस्ताक्षर किए?” रीना ने कहा, आवाज़ तेज़ थी।
“मैंने किया,” शेखर बाबू ने कहा, “क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा मैं घर का वफ़ादार हूँ। अब समझ आया — वफ़ादार नहीं, मोहरा था मैं। और ये सोच-विचार आज आया, जब बही खुली। पच्चीस साल में जो दिमाग़ सोया था, वो जागा है।”
“अब जगा है, तो बताओ,” मन्नू ने कहा। “वो तिजोरी कमला देवी के कमरे में है?”
“हाँ। मगर उसकी चाबी मेरे पास है।”
“तो चलिए,” रीना ने कहा।
“रुको,” रघुवीर ने कहा। उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। “मैं एक बात कहूँ? राघव। ये नाम।” उसने अपनी कमीज़ की जेब से एक छोटा-सा काग़ज़ निकाला और मन्नू के हाथ में दिया।
मन्नू ने खोला। उस पर टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई थी। “ये क्या है?”
“जब मैं छोटा था,” रघुवीर ने कहा, “मुझे अक्सर एक सपना आता था। एक आदमी जो मुझे गोद में उठाता था और कहता था, ‘राघव, बेटा, तू बड़ा होकर सब संभालेगा।’ और वो आदमी भवानी जैसा नहीं दिखता था। मैंने ये पर्ची सात साल की उम्र में खुद लिखी थी, डर के मारे।”
“तो तुम सोचते हो,” सुमन ने धीरे कहा, “कि वो बेटा तुम हो?”
“मैं कुछ नहीं सोचता,” रघुवीर ने कहा। “मैं बस इतना जानता हूँ — मेरा जन्म-प्रमाणपत्र मेरे पास नहीं है। आज तक मैंने उसे नहीं देखा।”
बंसी हक्का-बक्का रह गया। “अबे, रघुवीर, ये बात तूने पहले क्यों नहीं बताई?”
“क्योंकि मैं खुद उस पर भरोसा नहीं करता था। मुझे लगता था, बचपन का सपना है, भूल जाओ।” रघुवीर ने मन्नू की तरफ़ देखा। “पर आज रामदीन बाबू ने ये नाम पढ़ा। और सपना फिर से ताज़ा हो गया।”
माँ ने आँगन के बीच में आकर रघुवीर का हाथ पकड़ा। “तू छोटा था, जब भवानी तुझे इस घर में लाया था। कहता था — ‘अनाथ है, दूर के रिश्तेदार का बच्चा है।’ मैंने उस वक़्त पूछा नहीं। मुझे पूछना चाहिए था।”
“तो क्या मैं…” रघुवीर ने कहा, और फिर रुक गया।
“तू अभी भी वही रघुवीर है,” माँ ने कहा। “कोई बदला नहीं। बस अब एक सवाल खड़ा है — कि तेरा नाम अगर राघव है, तो तेरे पिता कौन थे, और तेरी माँ कहाँ है।”
“और सबसे बड़ा सवाल,” रामदीन ने कहा। उसने बही को फिर खोला और उसकी तरफ़ सबका ध्यान खींचा। “इसमें कमला देवी की ज़मीन का ज़िक्र है। उसके नाम पर जो टुकड़ा भवानी के बेटे को दिया गया, वो तीन बीघा का था। और कमला देवी का घर उसी चारदीवारी के बीच था।”
“कौन-सी चारदीवारी?” बंसी ने पूछा।
रामदीन ने उँगली उत्तर की तरफ़ उठाई। “हवेली की उत्तर दीवार के उस पार जो कमरा है — शेखर बाबू ने जिसकी चौथी कुंडी की चाबी दिखाई थी। वो कमरा कमला देवी का था।”
अब आँगन में खड़ी हर आवाज़ थम गई। सबकी नज़र उत्तर दीवार पर जम गई।
“तो ये मतलब,” मन्नू ने धीरे से कहा, “कि हम जिस कमरे को भवानी का रहस्य मान रहे थे, वो कमरा तेरी मौसी का था।”
“और भवानी ने उसे बंद करवा दिया,” माँ ने कहा। “ईंट से, पत्थर से। ताकि कोई अंदर न आ सके।”
“पर क्यों?” राखी ने पूछा। “कुछ तो उस कमरे में है जो उसे छिपाना था।”
शेखर बाबू ने छड़ी की टेक बदली। “शायद वो कुछ चीज़ नहीं। शायद वो एक आदमी था।”
“कौन?” रीना ने पूछा।
“यही तो मैं नहीं जानता,” शेखर बाबू ने कहा। “मगर जिस दिन कमला देवी के काग़ज़ गायब हुए, उसी हफ़्ते भवानी ने कमरे की मरम्मत करवाई थी। राजमिस्त्री बाद में मरे। दोनों मरे।”
“तो अब रुकने का सवाल नहीं है,” मन्नू ने कहा। “आज रात उत्तर दीवार का कमरा खुलेगा।”
“कल सुबह अदालत है,” हरीश चंद्र ने कहा।
“अदालत से पहले, हमें ये जानना है कि अंदर क्या है,” मन्नू ने कहा। “वरना कल जज के सामने बही खुलेगी, और हम… हम खाली हाथ रहेंगे।”
“पर राघव,” रीना ने कहा, रघुवीर की तरफ़ देखकर। “अगर ये सच है, तो भवानी का हर जुर्म अब राघव के नाम भी जुड़ेगा। तू तैयार है?”
रघुवीर ने एक गहरी सांस ली। “मैं तैयार हूँ इस बात के लिए कि मेरा असली नाम कुछ और हो सकता है। बाकी जो होगा, देखा जाएगा।”
“तो फिर चलो,” बंसी ने कहा। “पर पहले एक काम करो।”
उसने आँगन के बाहर दरवाज़े के पास खड़े छोटू को बुलाया। छोटू दौड़कर आया।
“जाकर गाँव के चौक पर खड़े पुलिस वाले को बता,” बंसी ने कहा, “कि हवेली में कुछ काग़ज़ात मिले हैं, और हम उन्हें सरकारी हिरासत में देना चाहते हैं। उसे बोल, अभी आए।”
छोटू भागा। रामदीन ने बही को सीने से लगाया और बोला, “तो अब उत्तर दीवार की तरफ़।”
सब उत्तर की तरफ़ बढ़े। मन्नू सबसे पीछे था। उसने जेब में हाथ डाला। टोकन अब भी वैसा ही था — हल्की-सी झुरझुरी, जैसे बहुत दूर कोई बोल रहा हो।
आँगन के कोने में खड़ी राखी ने मोमबत्ती उठाई। लौ अब सीधी जल रही थी, बिना काँपे। “बाबूजी,” उसने कहा, “ये लौ अचानक शांत क्यों हो गई?”
रामदीन ने पीछे मुड़कर देखा। “क्योंकि हवा रुक गई है,” उसने कहा। “और जहाँ हवा रुकती है, वहाँ कुछ बोलता है।”
वो सब उत्तर दीवार की तरफ़ बढ़े। दीवार के पास पहुँचकर शेखर बाबू ने वो ज़ंग लगी चाबी जेब से निकाली और उसे दीवार में छिपे ताले की तरफ़ बढ़ाया। तभी रामदीन ने बही के आख़िरी पन्ने को फिर से पलटा, जैसे कुछ याद आया हो।
“एक बात,” उसने कहा। सब रुक गए।
रामदीन ने पन्ने को आँगन की रोशनी में ऊँचा रखा और उँगली उसी नाम पर रखी।
“हिसाब बाकी: भवानी सिंह, बेटा — राघव।”
उसने पन्ने को और करीब लाकर देखा, और फिर धीरे से बोला, “और इसके नीचे एक और लाइन है। बहुत छोटी। जो पहले किसी की नज़र में नहीं आई।”
“क्या लिखा है?” माँ ने पूछा।
रामदीन ने आँखें सिकोड़कर पढ़ा — “बेटा नहीं। बेटी।”
॥
“बेटा नहीं। बेटी।”
रामदीन की उँगली उस छोटी लाइन पर अटकी रही। आँगन में खड़े सब लोगों ने साँस रोक ली। मोमबत्ती की लौ सीधी जल रही थी, पर हवा नहीं थी।
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