The Token System – Chapter 787
“तूने भवानी से चुराई,” बंसी ने कहा, “और फिर आठ साल उसके लिए काम भी करता रहा?”
“काम नहीं, क़र्ज़,” रामदीन ने कहा। “उसके पास मेरे बाप की दवा थी।”
“तो तूने अपने बाप के बदले बही चुराई,” हरीश चंद्र ने कहा। “और बहन के नाम… बहन कमला तो तेरी नहीं थी।”
“कमला भवानी की बहन थी,” रामदीन ने कहा। “मैंने उसका नाम कभी अपने मुँह से नहीं लिया। माँ कौशल्या के मुँह से सुना था।”
तभी भवानी ने दो क़दम में बही तक पहुँचकर हरीश चंद्र के हाथ से खींच लिया। बही के पन्ने फटने की आवाज़ आई।
“तेरे बाप का हिसाब,” भवानी चिल्लाया, “मेरी हवेली में नहीं पढ़ा जाएगा!”
बंसी टूटे हाथ को सहारा देते हुए भवानी की छाती पर आ गिरा। दोनों चौकी के पास जाकर रुके। राखी की कुर्सी पलट गई। रघुवीर ने भवानी के कंधे पर हाथ रखकर उसे पीछे धकेला और बही उसके हाथ से निकाल ली।
“तू इस आँगन में लड़ेगा,” रघुवीर ने कहा, “तो यही आँगन तेरा आख़िरी पन्ना बनेगा।”
माँ ने बही उठाई। उन्होंने एक-एक पन्ना सीधा किया और फिर बही को अपने सीने से लगाया।
“ये बही अब मेरी है,” उन्होंने कहा। “अदालत में जाएगी।” उन्होंने भवानी की तरफ़ देखा। “तेरा पहला और आख़िरी पन्ना भी।”
भवानी ने कुछ कहना चाहा, पर रीना आगे आ गई — उसके हाथ भरी थी एक पुरानी मोमबत्ती और एक पीली पर्ची। “रुको,” रीना ने कहा। “सब बही की बात कर रहे हैं। पर माँ ने सुबह इस हवेली के पीछे वाले कमरे में एक अलमारी खोली थी। उसमें ये मिली।”
उसने पीली पर्ची रामदीन को दी।
रामदीन ने पढ़ा और उसका चेहरा बदला। “यहाँ लिखा है — ‘जब हवेली का हिसाब खुले, तो ये मोमबत्ती खिड़की पर रखना।’”
“किसकी लिखाई?” मन्नू ने पूछा।
“तेरे पापा की,” रामदीन ने कहा। “पर पापा तो गए… ये पर्ची आठ साल पुरानी नहीं लगती। स्याही ताज़ी है।”
“मतलब कोई है जो पापा की तरह लिखता है,” विक्रम ने कहा।
माँ ने मोमबत्ती अपने हाथ में ली और उसे पलट कर देखा। “ये मोमबत्ती है,” उन्होंने कहा। “पर इसके नीचे कोई निशान नहीं। लिखाई अंदर है।” उन्होंने उसे रामदीन की तरफ़ बढ़ा दिया। “अब बता, इसका क्या करें?”
रामदीन ने मोमबत्ती ली और उसे आँगन के पास वाली खिड़की पर रख दिया। “ये तेरे बेटे का इशारा है,” उसने कहा। “ये खिड़की उत्तर की तरफ़ खुलती है। और उत्तर वाली दीवार…”
“वो बंद है,” बंसी ने कहा। “उसके पीछे ईंटें हैं, पत्थर है।”
“पत्थर हटा है,” रामदीन ने कहा। “शेखर बाबू ने उसकी चाबी आज निकाली।”
शेखर बाबू ने ज़ंग लगी चाबी जेब से निकालकर हवा में दिखाई। “पर ये चौथी कुंडी की है। उत्तर दीवार का ताला इससे नहीं खुलेगा।”
“फिर ये?” रीना ने पूछा।
“ये उस कुंडी की है,” शेखर बाबू ने कहा, “जो उत्तर दीवार के पीछे वाले कमरे में है।”
“यानी उत्तर दीवार खुलेगी, और उसके पीछे एक और कमरा है,” मन्नू ने कहा।
“और उस कमरे में,” शेखर बाबू ने कहा, “जो है, उसे मैंने कभी नहीं देखा। मुझे सिर्फ़ ये चाबी मिली थी, इस हिदायत के साथ — ‘जिस दिन हवेली का हिसाब खुले, उस दिन खोलना।’”
आँगन में एक नई हलचल आई। कुछ लोग पीछे हट गए। सुमन ने रघुवीर को देखा। “ये काग़ज़ात बंद करो,” उसने कहा। “यहाँ आज कितने हिसाब खुले… पर बंद कमरों में जो है, वो इस आँगन से बाहर निकलना चाहिए, चार दीवारों के भीतर नहीं।”
“सही कह रही है,” रामदीन ने कहा। “उत्तर दीवार आज नहीं खुलेगी। पहले अदालत।”
भवानी ने एक आख़िरी बार बही की तरफ़ देखा और फिर मुड़कर अपने आदमियों से कहा, “गाड़ी।”
“रुक,” हरीश चंद्र ने हरीश चंद्र की तरफ़ हाथ बढ़ाया। “ज़मानत की अर्ज़ी तो ले जा। पर ये याद रख — कल सुबह दस बजे जब बही अदालत के कब्ज़े में जाएगी, तो उसके पन्ने पढ़ने वाले जज सिर्फ़ हिसाब नहीं, हर नाम भी पढ़ेंगे।”
भवानी ने उसे जवाब नहीं दिया। वो गली के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर राजेंद्र खड़ा था।
“तू जहाँ जाएगा,” राजेंद्र ने कहा, “मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। बही कल अदालत में जाएगी। तब तक कोई कुछ नहीं छुएगा।”
भवानी ने उसे देखा और फिर आँगन से बाहर निकल गया।
आँगन में रुके लोग धीरे-धीरे हिलने लगे। हरीश चंद्र ने अपना बैग उठाया और शेखर बाबू के पास गया। “ये तीन कॉपियाँ जो तूने बताई थीं, वो कहाँ हैं?”
“मेरे पास नहीं,” शेखर बाबू ने कहा। “जब बही अदालत में जाएगी, तब मैं उनका पता बताऊँगा।”
“खेल मत खेल,” हरीश चंद्र ने कहा।
“खेल नहीं, डर है,” शेखर बाबू ने कहा और अपनी छड़ी के सहारे बाहर चल दिए।
रीना ने मन्नू को कोहनी से छुआ। “तू क्या सोच रहा है?”
“ये सोच रहा हूँ,” मन्नू ने धीरे से कहा, “कि जिसने रामदीन को बुलाया था, वो कौन था।” उसने आँगन की खिड़की पर रखी मोमबत्ती देखी। “पापा की लिखाई में पर्ची लिखने वाला कोई है, और वो इस घर में जानता है कि उत्तर दीवार कहाँ है।”
“या फिर,” बंसी ने कहा, “वो खुद उस दीवार के पीछे से आया है।”
माँ ने मोमबत्ती उठाई और उसे राखी के हाथ में दिया। “ये जला।”
“क्यों?” राखी ने पूछा।
“क्योंकि जिसने लिखा है, वो चाहता है कि ये जले,” माँ ने कहा। “और जो जलाना चाहता है, वो दूर नहीं है।”
राखी ने मोमबत्ती जलाई। लौ छोटी थी, काँप रही थी। मोम पिघलकर नीचे टपकने लगा।
मन्नू ने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, पर उसकी उँगली जैसे ही उस पर पड़ी, उसमें एक झुरझुरी सी हुई — न गरम, न ठंडी। जैसे कोई बहुत दूर से शब्द बोल रहा हो और अभी आवाज़ ऊपर नहीं आई हो।
रामदीन ने बही को एक साफ़ कपड़े में लपेट दिया और वह हरीश चंद्र के हाथ में दी। “कल सुबह दस बजे,” उसने कहा। “अब इसे छूने वाला कोई नहीं।”
“एक बात,” मन्नू ने रामदीन को रोका। “तूने इस बही में भवानी के हर काम का हिसाब पढ़ा। तो बता — इसका आख़िरी पन्ना किसका है?”
रामदीन ने बही खोली, आख़िरी पन्ना पलटा और उसे आँगन की रोशनी में ऊँचा रखा। उसकी उँगली एक नाम पर रुकी।
उसने पढ़ा — “हिसाब बाकी: भवानी सिंह, बेटा — राघव।”
आँगन में जो लोग खड़े थे, वो एक-दूसरे को देखने लगे। राघव। ये नाम किसी ने पहले नहीं सुना था। भवानी की कोई औलाद नहीं थी — यही तो सब जानते थे। बंसी ने माथा खुजाया और रामदीन के पास गया।
“रुक, रुक। ये राघव कौन है? भवानी भैया के तो कोई बच्चा ही नहीं।”
“यही तो मैं भी पूछ रहा हूँ,” रामदीन ने बही को करीब लाकर कहा। “इसके ऊपर वाले पन्ने पर लिखा है — तारीख तीन मार्च, साल उन्नीस सौ छियासी। हवेली की ज़मीन का एक टुकड़ा, जो कमला देवी के नाम से निकला था, चुपचाप भवानी सिंह के बेटे के नाम दर्ज हो गया।”
“ये बेटा कहाँ से आया?” रीना ने कहा।
रघुवीर जो अब तक चुप खड़ा था, आगे आया। उसका चेहरा पहले से ज़्यादा सफ़ेद लग रहा था। “राघव,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “ये नाम मुझे याद है।”
सबकी नज़र रघुवीर पर चली गई।
“मुझे क्यों याद है,” रघुवीर ने कहा, “ये मैं नहीं जानता। पर ये नाम बहुत पुराना है। मेरे कानों में गूँजता है, जैसे बचपन में किसी ने फुसफुसाया हो।”
“ये बात तो बड़ी गड़बड़ है,” बंसी ने कहा। “भवानी भैया के बेटा होता, और हम सब को पता न हो? इस हवेली में ऐसा कैसे छिपा रहा?”
राखी ने मोमबत्ती एक ओर रखी और रामदीन की तरफ़ देखा। “बाबूजी, इस बही में राघव का नाम सिर्फ़ एक जगह है या और भी?”
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