The Token System – Chapter 786
आँगन में फिर सन्नाटा छा गया। पर ये सन्नाटा पहले वाला नहीं था। इस बार लोगों के चेहरों पर कुछ और था — कुछ ऐसा जो रामदीन की तरफ़ झुक रहा था।
तभी हरीश चंद्र ने बैग से एक मोटा लिफ़ाफ़ा निकाला। “ये मैंने आज सुबह बनवाया था,” उसने कहा। “अदालत में ज़मानत की अर्ज़ी। पर अब ज़रूरत नहीं पड़ेगी।” उसने लिफ़ाफ़ा भवानी की तरफ़ बढ़ाया। “क्योंकि तू खुद आ गया।”
भवानी ने लिफ़ाफ़ा नहीं लिया। “मैं खुद नहीं आया। मुझे कोई यहाँ खींच लाया।” उसने मुंडेर की तरफ़ देखा। “उस दरवाज़े की तरफ़ जो आज रात अपने आप खुला था।”
सबकी नज़रें मुंडेर पर गईं। दरवाज़ा अब भी खुला था, पर उसके पीछे सिर्फ़ अंधेरा था, और उसी अंधेरे में कहीं हवा चल रही थी।
“दरवाज़ा अपने आप खुला था या किसी ने खोला?” विक्रम ने पूछा।
“मैंने खोला था,” माँ ने कहा। सब उनकी तरफ़ देखने लगे। “तुम सब बही की बातें कर रहे थे, तो मैंने सोचा — जब हवेली में हिसाब खुल रहा है, तो उसका दरवाज़ा क्यों बंद रहे?”
रामदीन ने माँ को देखा। नज़र में हैरानी थी। “तूने खोला?”
“मैंने खोला,” माँ ने कहा। “और रामदीन, बही में एक पन्ना ऐसा है जो तूने मुझे नहीं दिखाया।”
रामदीन की मुट्ठी बही के किनारे पर कस गई। “कौन सा?”
“पन्ना नौ।” माँ आगे बढ़ीं और बही अपने हाथ में ले ली। उन्होंने पन्ने पलटे, और फिर एक पन्ना खोला जिस पर रामदीन ने नज़र नहीं डाली थी। “यहाँ लिखा है — ‘हीरा देवी को हवेली से निकालने का हुक्म।’ मेरा नाम है इसमें।” उनकी आवाज़ नहीं काँपी। “मुझे पता था कि मैं क्यों निकाली गई थी। पर ये बही बता रही है कि हुक्म किसने दिया।”
“किसने?” विक्रम ने पूछा।
माँ ने सीधे भवानी को देखा। “तेरे बाप ने नहीं,” उन्होंने कहा। “तेरे बाप उस वक़्त बीमार था। हुक्म तेरे हाथ का लिखा है, भवानी। तेरी स्याही, तेरा निशान। मैं अठारह साल से यही सोचती रही कि मुझे किसने निकाला। आज पता चला।”
भवानी ने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने हाथ उठा दिया। “नहीं। अब तू बोलेगा तो सिर्फ़ एक सवाल का जवाब देगा। मेरा बेटा — मेरा असली बेटा — वो कहाँ है?”
आँगन में खड़े सब लोग जम गए।
रामदीन ने बही माँ के हाथ से ली और उसे आँगन की चौकी पर रख दी। फिर वो सीधा भवानी के सामने खड़ा हो गया। “अब बता, भवानी। इस बही का पहला पन्ना तेरे नाम से शुरू होता है। और आख़िरी पन्ना भी तेरे नाम पर ख़त्म होता है। बीच के पन्नों में जो लिखा है, वो तेरे बाप ने लिखा। पर पहला और आख़िरी — वो तेरा अपना लिखा है।”
भवानी ने बही की तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
“आख़िरी पन्ने पर तूने खुद लिखा था,” रामदीन ने कहा, “‘और जो बचा, वो तेरा है।’ तूने ये लिखकर सोचा था कि हवेली तेरी रहेगी। पर वो लाइन तेरे बाप की नहीं थी, भवानी। वो उस आदमी की थी जिसने आख़िरी साँस में ये बही मेरे हवाले की। और उसने तुझे अंदर बुलाया, ये कहने के लिए कि जो बचा, वो तेरा नहीं — वो उसका है जो सच बोले।”
॥
रामदीन ने बही को उलटा करके आँगन की चौकी पर रखा और उसके पहले पन्ने पर हाथ फेरा।
“ये बही मैंने किसी को दिखाने के लिए नहीं रखी थी,” उसने कहा। “ये मैंने इसलिए रखी थी कि जिस दिन हवेली का दरवाज़ा खुले, उस दिन सिर्फ़ काग़ज़ नहीं, आदमी भी खुलें।” उसने पहला पन्ना पलटा। “सुनो, पहला हिसाब।”
माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया।
“पहला काम,” रामदीन ने पढ़ा, “एक बूढ़ी औरत की ज़मीन। काग़ज़ बदला गया। असली काग़ज़ तहसील से निकाला गया, नकली वापस रखा गया। औरत को कहा गया — तेरे हाथ का काग़ज़ पुराना हो गया है।”
“कौन सी औरत?” विक्रम ने पूछा।
रामदीन ने गला साफ़ किया। “नाम यहाँ नहीं है। बस इतना लिखा है — कमला देवी।” उसने आँखें उठाईं। “पर रकम की जगह जो लिखा है, वो कोई किसान का हिसाब नहीं है। यहाँ लिखा है — ‘छह महीने, दो हजार, बहन के नाम पर’।”
माँ ने अपनी जगह छोड़ी। एक कदम आगे, फिर दो। उनका चेहरा बदल गया।
“कमला देवी?” उन्होंने रामदीन की कलाई पकड़ ली। “रुक। ये बात दोहरा।”
“कमला देवी,” रामदीन ने कहा।
माँ की साँस फूल गई। “मेरी मौसी का नाम कमला देवी था।” उन्होंने सबकी तरफ़ देखा। “मेरी मौसी। रामगंज की उस गली में रहती थी जहाँ से हमारी माँ का घर दिखता है। उसकी ज़मीन थी — छोटी सी, दो बीघा। कहती रहती थी, ये ज़मीन मेरे बेटे के लिए है।”
“उसका बेटा था?” मन्नू ने पूछा।
“होना चाहिए था,” माँ ने कहा। “पर उसका बेटा…” उन्होंने रुककर आँगन की ईंटों को देखा। “इसी हवेली में मेरा असली बेटा कहाँ गया, वो भी मुझे नहीं पता। और मेरी मौसी का बेटा पच्चीस साल पहले गुम हो गया।”
बंसी ने राखी की चाय की दुकान की ओर मुँह किया। “अब समझ आया। ये बही किसी हिसाब की नहीं, माफ़ीनामे की है। जिसमें हर काग़ज़ के पीछे एक घर जला है।”
“ये बही मैंने रखी थी,” रामदीन ने दोहराया, “पर अब मुझे समझ नहीं आता — ये किसने लिखी।” उसने अपना नाखून बही के किनारे पर रखा। “क्योंकि पन्ने पचास के बाद के हिसाब मेरे हाथ के नहीं हैं। ये हाथ किसी और के हैं।”
“किसके?” हरीश चंद्र ने अपना चश्मा सरका दिया।
“इसी आँगन में खड़े किसी के,” रामदीन ने कहा।
भवानी ने एक क़दम बढ़ाया। उसकी आवाज़ पहले से भारी थी, पर अब उसमें वो खिंचाव आ गया था जो पहले सिर्फ़ होम में सुनाई देता था। “बही दे।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं इस बही को इस गली में खड़े आदमी के सामने नहीं खोलूँगा।” उसने ठुड्डी उठाई। “ये हवेली है। मेरे बाप की। मेरा हिसाब मैं खुद देखूँगा।”
“तेरे बाप का,” रामदीन ने कहा, “या तेरा?”
भवानी ने जवाब नहीं दिया। उसकी नज़र बही पर गई और फिर माँ पर।
“मौसी कमला के नाम पर रुका दो,” माँ ने कहा। “पहले ये बता कि उसका बेटा कहाँ गया।”
“बही कुछ नहीं कहती,” रामदीन ने पन्नों को उँगली से थपथपाया। “यहाँ बस एक लकीर है — ‘लड़का — भेजा गया।’”
“किसने भेजा?”
रामदीन ने पन्ना पलटा। “लिखने वाले का नाम पन्ने के कोने पर है।”
उसने पन्ना उठाकर हरीश चंद्र की तरफ़ कर दिया। हरीश चंद्र ने चश्मा पहना, पास किया, और फिर पीछे हटकर माँ को देखा।
“कौशल्या,” उसने कहा।
माँ का हाथ बही के ऊपर आया और वहीं ठहर गया।
“कौशल्या का मतलब तू नहीं,” रामदीन ने कहा। “इस हवेली में पचास साल में तीन-चार कौशल्या रही हैं। पहली का नाम बही के पहले पन्ने पर है। दूसरी…” उसने मुँह बदला। “दूसरी की तरफ़ आज तक किसी ने नहीं देखा। ये पन्ना उसी कौशल्या का है जिसे भवानी ने पन्ना नौ पर निकाला था।”
विक्रम ने बही अपने हाथ में ले ली। उसका चेहरा तेज़ हो गया। “यानी मेरी दादी ने कमला देवी का नाम मिटाया था? और तूने कभी नहीं बताया?”
“मैं खुद उस वक़्त के हिसाब को अभी पूरा नहीं पढ़ पाया,” रामदीन ने कहा। “और तूने मुझे पूछा भी नहीं।”
“अब पूछ रहा हूँ,” विक्रम ने कहा। “ये बही तेरे पास कैसे आई? तू तो भवानी की तरफ़ था।”
रामदीन ने सीना फैलाया। “मैं भवानी की तरफ़ था क्योंकि मेरा बाप बीमार था और भवानी के पास दवा थी। मैंने उसके लिए काग़ज़ उठाए, हिसाब ढोए। पर ये बही उसने मुझे नहीं दी थी। ये मैंने उसके दफ़्तार की दराज़ से चुराई थी — उसी रात, जिस रात उसने मुझे ये कहकर डराया था कि कौशल्या का नाम किसी काग़ज़ पर नहीं आना चाहिए।” उसने आँगन के चारों तरफ़ देखा। “मैंने सोचा — अगर मैं इस बही को नहीं बचाऊँगा, तो एक दिन सब ख़त्म हो जाएगा। मैंने सोचा, हिसाब ज़िंदा रखना है तो बही किसी ऐसे के पास रखनी है जो खुद हिसाब से डरता हो।”
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