The Token System – Chapter 785
“ये झूठ है,” भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मैंने ये बही कभी नहीं देखी।”
“देखी है,” रामदीन ने कहा। “तूने इसे तीन साल पहले मेरी मेज़ से उठाया था और वापस रख दिया था — क्योंकि तू उस वक़्त भी इसे पढ़ने की हिम्मत नहीं कर सका।”
“मैं झूठ नहीं बोल रहा!” भवानी आगे आया। “मैंने इसे नहीं देखा।”
“तो पढ़,” रामदीन ने बही उसकी तरफ़ धकेली। “पहला पन्ना पढ़ — तेरे नाम से शुरू होता है। और आख़िरी पन्ना भी तेरे नाम पर ख़त्म होता है।”
भवानी ने बही उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने पहला पन्ना खोला और पढ़ा — “हिसाब शुरू। पहला नाम — भवानी सिंह। माँ — हीरा देवी। बाप — हरि सिंह।”
उसने आख़िरी पन्ना खोला। उसकी आँखें भर आईं। उसने बही बंद की और ज़मीन पर रख दी।
“अब बोल,” रामदीन ने कहा। “किसका हिसाब है ये?”
भवानी ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस आँगन की मुंडेर की तरफ़ देखता रहा, जहाँ से अब भी हवा आ रही थी, और जहाँ से दस मिनट पहले वो खुद भागा था।
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था। उस पर कोई नया शब्द नहीं था — सिर्फ़ लकीरें, और उनके नीचे एक धुँधला सा निशान जो अब भी साफ़ नहीं हो रहा था।
“तिजोरी खुलेगी?” विक्रम ने पूछा।
“खुलेगी,” हरीश चंद्र ने कहा और अपना बैग बंद किया। “पर पहले ये बही अदालत के कब्ज़े में जाएगी। कल सुबह दस बजे।”
“कल सुबह तक भवानी ये बही जला देगा,” मैंने कहा।
“भवानी अब कुछ नहीं जला सकता,” शेखर बाबू ने कहा। “क्योंकि मैंने इस बही की तीन कॉपियाँ पहले ही बनवा ली हैं।”
रामदीन ने हैरानी से शेखर बाबू को देखा। “तूने?”
“मैंने,” शेखर बाबू ने कहा। “मैं बीस साल भवानी का आदमी रहा। पर उससे भी ज़्यादा बीस साल इस हवेली का हिसाब देखता रहा। जिस दिन पता चला कि मेरी अपनी बेटी की शादी उसने तुड़वाई, उस दिन मैंने कुछ काग़ज़ अपने पास रखने शुरू कर दिए।”
“तो तेरे पास भी है?” भवानी ने पूछा।
“मेरे पास भी है।” शेखर बाबू ने कहा। “और मेरे पास वो चौथी चाबी भी है जो तू ढूँढ रहा था।”
भवानी की आँखें फैल गईं। “तू झूठ बोल रहा है।”
“नहीं।” शेखर बाबू ने जेब से एक छोटी पीतल की चाबी निकाली, जिस पर ज़ंग लगा हुआ था। “ये चौथी कुंडी की चाबी है — वो जो तूने बीस साल पहले अपने आदमी से लगवाई थी। ये चाबी उसी ने मुझे दी थी, मरने से पहले।”
“किसने?”
“तेरे बाप ने।” शेखर बाबू ने कहा। “जिसने ये चाबी मुझे दी, वो तेरा बाप था — रामदीन नहीं, हरि सिंह।”
भवानी पीछे हटकर फाटक से टिक गया। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
“मुझे क्या पता था,” वो धीरे से बोला, “कि जिस हवेली को मैं अपनी समझ रहा था, उसका हर पन्ना मेरे ही ख़िलाफ़ लिखा हुआ है।”
रामदीन ने बही उठाई और अपने सीने से लगा ली। “अब ये बही तेरी नहीं, भवानी। ये उन सब की है जिनका हिसाब इसमें दर्ज है।”
आँगन में खड़े सब लोग एक-दूसरे को देखने लगे। और भवानी, जो अब तक मुंडेर पर बैठकर सब देख रहा था, धीरे से उठकर आँगन के बीच आया और रामदीन के आगे घुटनों के बल बैठ गया।
भवानी के घुटनों के बल बैठते ही आँगन में जैसे साँस लेना भी बंद हो गया। कौशल्या ने मुँह पर हाथ रख लिया। माँ ने आँखें फेर लीं। रामदीन ने बही अपने सीने से नहीं हटाई, बस नीचे देखता रहा।
“जो किया, सो किया,” भवानी ने कहा। आवाज़ गले में फँसी थी, जैसे किसी दबे कुएँ से निकल रही हो। “अब बता, हिसाब कैसे चुकता है।”
“मुझे हिसाब नहीं चाहिए,” रामदीन ने कहा।
“तो क्या चाहिए?”
“सच।” रामदीन ने बही नीचे रखी और उसके ऊपर हाथ टिका दिया। “कटे नाम से शुरू कर। जो पन्ने पर स्याही से काट दिया गया है — किसका नाम था?”
भवानी ने नज़र उठाई। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो अब तक नहीं दिखा था — डर नहीं, शर्म नहीं। कुछ और। “तू जानता है किसका नाम था। तभी तो इतनी रातों से उस बही को ढूँढ रहा है।”
“मैं जानता हूँ,” रामदीन ने कहा। “पर माँ सुनें, कौशल्या सुनें, शेखर बाबू सुनें — तेरे मुँह से सुनें।”
भवानी ने आँगन में खड़े लोगों को एक-एक करके देखा। शेखर बाबू पर नज़र पड़ी तो रुक गई। “उस पन्ने पर मेरी बहन का नाम था,” उसने कहा। “कमला।”
कौशल्या आगे आई। “कमला?” उसकी आवाज़ में यकीन नहीं था। “जो तेरे साथ… जो इसी हवेली में रहती थी?”
“हाँ।” भवानी ने सिर झुकाया। “हमारी माँ की मौत के बाद बाप ने उसे हिसाब की किताब से हटा दिया। कहा कि लड़की का नाम बही में नहीं चढ़ता। पर असली वजह और थी।”
“क्या?” माँ ने पूछा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने ज़ख़्म की सिलाई खुल गई हो।
भवानी ने जवाब देने से पहले ज़मीन की तरफ़ देखा। “कमला ने हवेली की कुछ ज़मीन अपने नाम दर्ज कराने की बात उठाई थी। बाप को लगा कि लड़की विद्रोह कर रही है। उसने बही से उसका नाम काट दिया और उसे चुप करा दिया।”
“चुप करा दिया?” विक्रम ने पूछा। “मतलब?”
“मतलब जो तू समझ रहा है, वो नहीं,” भवानी ने तेज़ी से कहा। “उसे दूर शहर में एक कमरे में रख दिया गया। पैसा भेजते रहे। कुछ साल बाद वो बीमार पड़ी और चली गई। नाम कभी बही में वापस नहीं चढ़ा।”
रामदीन ने धीरे से कहा, “और तू उस वक़्त हवेली का मालिक बन चुका था, भवानी। तेरे पास मौक़ा था नाम वापस चढ़ाने का। तूने नहीं चढ़ाया। क्यों?”
भवानी ने कोई जवाब नहीं दिया।
मन्नू, जो अब तक पीछे खड़ा था, आगे आया। उसने टोकन मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, “इसे देखो।”
मैंने टोकन लिया। ठंडा था। पर लकीरें अब और गहरी हो चुकी थीं, और नीचे का धुँधला निशान साफ़ होने लगा था। मैंने उसे रोशनी में घुमाया। मन्नू ने भी झुककर देखा। “ये तो…” वो रुक गया।
“क्या?” रामदीन ने पूछा।
“कुछ नहीं,” मन्नू ने कहा और टोकन वापस जेब में रख लिया। पर उसका चेहरा बता रहा था कि उसने कुछ देखा है। “बही आगे पढ़ो।”
रामदीन ने बही के पन्ने उलटने शुरू किए। “ये बही तीन हिस्सों में है। पहला — हवेली की ज़मीन का हिसाब। दूसरा — उन लोगों की मज़दूरी का, जो यहाँ सालों से काम करते आए हैं। और तीसरा…” उसने आख़िरी हिस्सा खोला। “तीसरा उनका, जो चुप रह गए।”
शेखर बाबू आगे बढ़े। “मेरा नाम भी उसमें है?”
रामदीन ने पन्ना पलटा, ऊँगली चलाई, और फिर हाँ में सिर हिलाया। “पन्ना उनतालीस। शेखर बाबू। बेटी की शादी तोड़ने का हुक्म भवानी सिंह ने दिया, और हुक्म का हर्ज़ाना तीन लाख रुपये… वसूल नहीं हुआ।”
शेखर बाबू हँसे। हँसी सूखी थी। “बीस साल बाद भी मेरा हिसाब बाकी है।”
“मेरा भी,” कौशल्या ने कहा। “मेरे सास-ससुर की ज़मीन का हिसाब पूछो इससे।”
भवानी ने सबकी बातें सुनीं, फिर धीरे से उठा। उसकी घुटनों पर मिट्टी लगी थी। “तुम सब एक ही बात कर रहे हो — हिसाब। पर कोई ये नहीं पूछ रहा कि बही मेरे बाप ने लिखी थी, तो मैं क्यों हिसाब दूँ?”
“क्योंकि तूने उस हिसाब को जारी रखा,” रामदीन ने कहा। “तेरे बाप ने बही खोली थी। तूने उसे बंद नहीं किया। तूने उसमें और नाम जोड़े। पन्ना बावन — मेरा नाम। क्या मेरा हिसाब भी बाप ने लिखा था?”
भवानी चुप रहा।
“बोल,” रामदीन ने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर कड़ी थी।
“नहीं,” भवानी ने कहा। “तूने उस दिन हिसाब माँगा था जब मैंने तेरे बाप को हवेली से बाहर निकाला था। मैंने सोचा — इसका नाम भी बही में चढ़ा दूँ, ताकि याद रहे कि हवेली में सवाल पूछने की कीमत होती है।”
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