The Token System – Chapter 774
माँ की आँखें भर आईं। "वो रात… जब वो गए थे… वो टोकन नहीं छोड़ना चाहते थे, और भवानी चाहता था।" उनकी आवाज़ फिर टूटी। "पापा ने कहा था — जिस दिन ये चीज़ मेरी बहन की शादी से जुड़ेगी, उस दिन मैं तुझे कुछ नहीं बताऊँगा।"
"बहन की शादी?" मैंने कहा। "मेरी बहन?"
माँ ने सिर हिलाया। "रीना।"
रीना सन्न थी। "मेरी शादी?"
"पापा ने ये कहा था," माँ ने आँखें मूँद लीं। "मैंने आज तक किसी को नहीं बताया। मुझे लगा पागलपन है। रोज़ कहती थी — नहीं, मेरा बेटा ऐसा नहीं करेगा। पर जिस दिन तेरे हाथ में पैसा आने लगा, मन्नू, मुझे वही डर लगने लगा। और आज…" वो रो पड़ीं। "आज उन्होंने मुझे उसी गाड़ी में खींचा, और मुझे वही आवाज़ सुनाई — जो पापा की थी।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी छाती धक-धक कर रही थी।
"क्या कहा तूने?" मेरी आवाज़ निकली। "पापा की आवाज़?"
"एक ने कहा — 'बहन, दरवाज़ा खोल।' आवाज़ पापा की तरह थी। जैसे रेडियो पर चलती थी।" माँ ने माथा पकड़ा। "मुझे लगा मैं पागल हो रही हूँ। पर मैंने बाहर झाँका नहीं — मैंने गलती की। मुझे नहीं झाँकना चाहिए था।"
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "मन्नू, सुन। ऐसी आवाज़ रिकॉर्ड होती है। टेप। मशीन। पुराने रिकॉर्डर पर। ये कोई नया काम नहीं है।"
"शेखर बाबू के पास रिकॉर्डर है," मैंने कहा। "कल तक हम उसे चला रहे थे।"
"तो उसकी नकल की जा सकती है," बंसी ने कहा। "और उस रिकॉर्डर की एक और तरह की नकल है — बिना तार के। सस्ती चीज़। बाज़ार में मिलती है। पचास – सौ रुपये की।"
माँ ने मेरा हाथ खींचा। "मन्नू, तू मुझे क़सम देता है, तू इस चीज़ को अब और नहीं छुएगा।"
"माँ—"
"तेरे पापा ने इस चीज़ को हाथ नहीं लगाया। उन्होंने इसे दीवार में रख दिया। तभी तो…" वो फुसफुसाई। "उन्होंने इसे हमसे दूर रखा। औऱ भवानी ने उन्हें मरवा दिया।"
मैंने टोकन अपनी जेब में वापस डाला। जेब ठंडी थी। बर्फ़ जैसी। मेरी उँगली फिर जल गई।
सुमन दरवाज़े से आईं। "मन्नू, बाहर आ जाओ। एक बात है।"
मैं बाहर आया। सुमन ने दरवाज़ा बंद किया।
"उस मैडम का नाम मैंने अभी नहीं बताया," उन्होंने कहा। "क्योंकि वो यहाँ हो नहीं रहीं।"
"मतलब?"
"मैं उनसे पूछने गई थी। स्कूल वालों ने कहा — उन्होंने आज सुबह छुट्टी ले ली। दो दिन की। पता नहीं कहाँ गईं।" सुमन ने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "और जिस वक़्त वो माँ को बचा रही थीं, उसी वक़्त उनके हाथ से कुछ गिरा था। मंडी के पास वाली दुकानदार ने मुझे दिया।"
उन्होंने अपनी जेब से एक छोटी चीज़ निकाली। मेरी हथेली पर रखी।
पीतल का एक पतला टुकड़ा। एक कोना। छोटा, घिसा, झुका हुआ। मैंने उसे पलटा।
मेरे हाथ काँप गए।
"ये किसी रस्सी या हार का नहीं है," सुमन ने कहा। "ये किसी चीज़ का कोना है। पीतल की किसी चीज़ का।"
मेरी जेब में टोकन फिर ठंडा हुआ। फिर गरम। फिर ठंडा। जैसे साँस ले रहा हो।
मैंने वह टुकड़ा जेब में डाला। सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मन्नू, मैंने कई सालों में ऐसा टुकड़ा नहीं देखा। पर मुझे ये पहचाना-सा लग रहा है।" उन्होंने धीमे से कहा। "तेरे टोकन से।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं जानती हूँ कि तू कुछ छिपा रहा है," सुमन ने कहा। "मैं बार-बार पूछूँगी नहीं। पर एक बात सुन ले — अगर तेरे पास कोई चीज़ है जो लोगों को मरवा रही है, तो उसे जल्दी से जल्दी किसी ऐसे हाथ में देना जो उसे रोक सके। वरना अगला नंबर तेरा होगा।"
मैं वार्ड में लौटा।
माँ बैठ गई थीं। रीना उनका सिर सहला रही थी। बंसी खिड़की के पास खड़ा था, बाहर देख रहा था।
"बंसी।" मैंने उसे पास बुलाया। वह टुकड़ा दिखाया।
बंसी ने उसे हथेली पर रखा। फिर उसका चेहरा कठोर हो गया।
"मन्नू," उसने कहा। "ये सिर्फ़ कोना नहीं है। ये किसी टोकन का टूटा कोना है।"
"मैं जानता हूँ।"
"नहीं जानता।" उसने टुकड़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मेरे पापा के संदूक में एक काग़ज़ था — जो उन्होंने उस रात हवेली से उठाया था। उस पर सिर्फ़ यही कोना बना था। मैंने उसे बचपन में देखा था, और उस पर लिखा था — 'टोकन का टूटा हिस्सा, तीसरे के पास।'"
"तीसरे के पास?"
"हाँ।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "यानी उस औरत के पास, जो कल रास्ते पर काग़ज़ फेंककर भागी थी। या उस औरत के पास जिसने तेरी माँ को बचाया।"
वार्ड के बाहर सीढ़ियों पर भीड़ की आवाज़ आई। सुमन ने दरवाज़ा खोला और अंदर आईं।
"मन्नू, नीचे दो आदमी हैं। पुलिस के कपड़ों में। कह रहे हैं — बूढ़ी औरत के बारे में पूछताछ करनी है।"
मैं खिड़की के पास गया। नीचे दो आदमी खड़े थे। एक पतला, सफ़ेद कुर्ता। एक मोटा, काले कपड़ों में। मोटे का गाल पर निशान था।
मेरा हाथ जेब पर गया। टोकन गरम था। बहुत गरम।
"वो हैं," माँ ने धीरे से कहा। "दोनों। एक बूढ़ा, एक जवान।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "इन्हें अंदर मत आने देना।"
"तू क्या करेगा?"
मैं दरवाज़े से बाहर निकला। सीढ़ियों की रेलिंग पर हाथ रखा। बंसी पीछे आया।
मैंने नीचे से आवाज़ दी। "ऊपर क्यों आ रहे हो?"
पतला आदमी रुका। उसने सिर उठाया। "मरीज़ से पूछताछ करनी है।"
"कौन हो तुम?"
"थाने से आए हैं। काग़ज़ दिखाऊँ?"
"दिखाओ।"
उसने जेब में हाथ डाला। निकाला — बस एक सफ़ेद काग़ज़। मुहर नहीं, सिर्फ़ कुछ टेढ़ी लाइनें।
"ये काग़ज़ नहीं है," मैंने कहा।
"तेरी औकात क्या है?" मोटे ने कहा। "हम ऊपर आ रहे हैं — या नीचे से पूछें?"
मैंने जेब से टोकन निकाला। रेलिंग पर रख दिया। पीतल ने धूप में चमक मारी।
मोटे का मुँह खुला रह गया। पतले ने उसका हाथ पकड़ा।
"पीछे हट," पतले ने कहा।
"वो… वही है न?" मोटे ने फुसफुसाया। "जो ठाकुर साहब ने बोला था—"
"चुप।"
मैंने टोकन उठाया। जेब में रखा।
"मैं तुम्हारी तरफ़ से किसी काग़ज़-वाग़ज़ की बात नहीं कर रहा," मैंने कहा। "बस एक बात सुन लो। जिस चीज़ की तुम तलाश कर रहे हो — वो तुम्हारे हाथ नहीं आएगी। और जो कुछ हो रहा है — उसका हिसाब भी तुम्हारे ऊपर आएगा।"
पतले ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — बस पल भर के लिए, फिर वो वापस सख़्त हो गया।
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक बात याद रखना — तेरे पास जो है, वो तेरा नहीं है। और जो नहीं है, वो तेरे पास है।"
वो पलट गए। मोटे ने एक बार पीछे मुड़कर देखा, फिर चले गए।
मैं सीढ़ियों पर बैठ गया। बंसी मेरे पास बैठा।
"क्या बोल गए वो?" उसने पूछा।
"पता नहीं।" मैंने टोकन जेब से निकाला। "पर टोकन ख़ाली नहीं है।"
टोकन पर अब एक लकीर और थी। बीच वाली लकीर के नीचे दूसरी लकीर, पतली, धुँधली, जैसे कोई लिखता रहा हो और मिटा दे।
मैंने उसे उँगली से रगड़ा। मिटी नहीं।
बंसी ने देखा। "ये कब बनी?"
"पता नहीं।" मैंने टोकन जेब में रखा। "पर एक बात पक्की है — अब माँ को यहाँ नहीं रख सकते।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगली बार वो अकेले नहीं आएंगे।"
माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखें बंद थीं, हाथ जोड़े हुए। रीना उनके पास सिर झुकाए बैठी थी।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "एक बात है। क्या तुम माँ को दो-तीन दिन यहाँ अपनी निगरानी में रख सकती हो? ऐसा नहीं दिखे कि ये कोई काम है।"
सुमन ने सोचा। "मैं उन्हें पीछे वाले वार्ड में डाल दूँगी। रजिस्टर पर नाम नहीं। कोई पूछेगा तो कहूँगी — मरीज़ ज़्यादा, जगह कम।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पर मन्नू — तू मुझे सब नहीं बता रहा। और मैं इस से ज़्यादा नहीं पूछूँगी। बस एक बात। तेरे टोकन और उस टुकड़े का एक ही धातु है?"
मैंने उनकी आँखों में देखा। "मुझे नहीं पता।"
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