The Token System – Chapter 773
अलमारी खोली — माँ की दो साड़ियाँ, एक शॉल, ऊपर की तरफ़ पुराना स्टील का डिब्बा। रसोई में गैस बंद थी, चाय का प्याला धुला पड़ा था, चूल्हे पर रोटी का तवा सूखा। छत पर गई ओढ़नी नहीं थी, बबूल के पेड़ के नीचे सिर्फ़ उसकी सूखी फली पड़ी थी। मैंने पीछे वाला कमरा, पापा का बंद कमरा, उसके नीचे की सीढ़ियाँ — सब देखा। माँ कहीं नहीं।
रीना दहलीज़ पर बैठ गई। उसने घुटनों में मुँह छिपा लिया।
"मैंने ही उसे अकेला छोड़ा," वो बोली, आवाज़ दबी हुई। "सुबह मैं स्कूल के लिए निकली, वो दरवाज़े पर खड़ी थी। मैंने कहा — माँ, तुम अंदर जाओ। मैंने कहा था।"
"रीना—"
"मैंने कहा था, और मैं चली गई।"
बंसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "अब रोने का वक़्त नहीं है। रोने से वो वापस नहीं आएगी।"
रीना ने हाथ झटक दिया। "तू क्या जाने?"
बंसी चुप नहीं हुआ। वो मेरी तरफ़ मुड़ा। "मन्नू, सुन। भवानी ने ये नहीं किया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"सोच। अगर भवानी ने माँ को उठाया होता, तो उसके पहले उसके आदमी तेरे पास आते, काग़ज़ माँगते, धमकाते — सीधा बात करते। भवानी डराता है, चुपके से उठाता नहीं। और सबसे बड़ी बात — अगर माँ को कुछ हो जाता, तो तेरे पास जो फाइलें हैं वो सीधा थाने जातीं। भवानी इतना बेवकूफ़ नहीं है। वो खुद फँसा हुआ है, वो इस वक़्त अपने ऊपर और केस नहीं लेगा।"
रीना ने सिर उठाया। "तो किसने उठाई?"
"यही तो सवाल है," बंसी ने कहा। "जो सोचता है कि माँ की चीज़ें फेंककर हमें रास्ते पर बुला सकता है।"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन फिर ठंडा था — लेकिन इस बार ठंड इतनी तेज़ कि उँगली जलने की तरह हट गई। मैंने दाँत भींचे और हाथ बाहर निकाला।
तभी कान में आवाज़ आई। साफ़, छोटी, बिना जल्दी के।
"अस्पताल। बूढ़ी औरत। दो घंटे।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। गली ख़ाली थी। बंसी मुझे ही देख रहा था।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"अस्पताल," मैंने कहा। "अभी।"
रीना उठ खड़ी हुई। "माँ?"
"पता नहीं। पर टोकन ने कहा है।"
बंसी ने मेरी स्कूटी की चाबी मेरे हाथ से ले ली। "तू पीछे बैठ। मैं चलाता हूँ। तेरे हाथ काँप रहे हैं।"
मैंने कुछ नहीं कहा। पीछे बैठ गया। रीना ने बंसी के आगे खुद को दबाया और हम तीनों उसी स्कूटी पर अस्पताल की तरफ़ निकले। रास्ते में एक बार बंसी ने कहा — "अगर माँ वहाँ नहीं मिली, तो मैं सीधा भवानी के बूढ़े आदमी को पकड़कर लाता हूँ। उसने दोनों चप्पलें लाकर दी थीं। वो कुछ जानता है।"
"पहले अस्पताल," मैंने कहा।
अस्पताल का फाटक आज भीड़ से भरा था। स्ट्रेचर, सीढ़ियों पर बैठे मरीज़, दीवार से टिकी साइकिलें। मैं सीधा इमरजेंसी में घुसा। पर्दे के पीछे एक नर्स खून वाला कपड़ा बदल रही थी।
"बूढ़ी औरत?" मैंने पूछा। "सुबह लाई गई थी। कुछ नहीं बोल रही, सिर्फ़ एक नाम ले रही है।"
नर्स ने सिर उठाया। "तुम वही हो? जिसका नाम वो ले रही है?"
"हाँ। मैं मन्नू हूँ।"
नर्स ने मुझे ऊपर की तरफ़ इशारा किया। "डॉक्टर सुमन के पास जाओ। वही लाई थीं उन्हें।"
मैं सीढ़ियाँ चढ़ा। बंसी और रीना पीछे। डॉक्टर सुमन वार्ड के बाहर स्टैंड पर एक फ़ाइल रख रही थीं। मुझे देखकर उन्होंने फ़ाइल बंद कर दी।
"मन्नू।" उनकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो आम तौर पर होती है। "सुबह छह बजे के करीब। सड़क पर पड़ी थीं — चौक से आगे, सब्ज़ी मंडी वाली सड़क। एक रिक्शे वाले ने देखा और यहाँ ले आया।"
"कौन था?" रीना ने पूछा।
"एक स्कूल की मैडम ने शोर मचाया था।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "उन्होंने देखा कि दो आदमी एक बूढ़ी औरत को गाड़ी में खींच रहे थे। मैडम चिल्लाईं, भीड़ जुटी, और वो दोनों औरत को सड़क पर धकेलकर भाग गए।"
मेरा हाथ दीवार पर था। नाखून प्लास्टर में गड़ गए।
"वो कहाँ हैं?" मैंने पूछा।
"तीस नंबर वार्ड। पर मन्नू—" सुमन ने मेरा रास्ता रोका। "चोट ज़्यादा नहीं है। सिर पर धक्का लगा है, सिलाई लगी है। पर वो डर के मारे बोल नहीं रही। दो घंटे से जो भी पूछा, सिर्फ़ तुम्हारा नाम लिया। बस।"
मैं दौड़ा। तीस नंबर वार्ड के दरवाज़े पर एक नर्स खड़ी थी। मैं सीधा अंदर।
दीवार के साथ वाला बिस्तर। सिर में पट्टी। आँखें बंद। हाथ पेट पर रखे हुए। उस हाथ की उँगलियाँ पतली हो गई थीं, नाखूनों में आज भी सिंदूर का अधूरा निशान।
"माँ।"
आँखें नहीं खुलीं। मैं बिस्तर के पास बैठ गया। मेरा हाथ उसके हाथ पर।
तभी हथेली के नीचे उसकी उँगली हिली।
आँखें खुलीं। पहले धुँधली, फिर वो मुझे पहचान गईं। और उस वक़्त हुआ जो मैंने कभी नहीं देखा था — वो फूट-फूटकर रोई। बिल्कुल बच्चों की तरह। कोई आवाज़ नहीं, सिर्फ़ आँसू और काँपते होंठ।
रीना पीछे से आई और माँ के पैरों में बैठ गई। "माँ…"
माँ ने पहली बार बोला। आवाज़ टूटी हुई, रूखी। "दो आदमी थे। दरवाज़े पर। मैंने सोचा — कोई काम का आदमी होगा। एक ने कहा, बहन, दरवाज़ा खोल।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, आवाज़ मेरी थी। मेरी जैसी।"
रामबाई ने यही कहा था। मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
"फिर?"
"फिर मैंने दरवाज़ा खोला। दोनों ने मुँह दबा लिया। मैं चिल्लाने लगी तो एक ने मेरा हाथ पीछे मोड़ दिया।" माँ ने अपनी कलाई दिखाई — नीला पड़ा हुआ। "गली में गाड़ी खड़ी थी। वो मुझे खींच रहे थे। मैंने एक चप्पल उतारकर फेंक दी। सोचा — कोई देखेगा तो समझ जाएगा।"
"दूसरी?" रीना ने पूछा।
"दूसरी मेरे पैर में थी। जब वो मुझे गाड़ी में डाल रहे थे, तब मंडी की तरफ़ से एक मैडम आईं। स्कूल की कोई मैडम। उन्होंने चिल्लाकर शोर मचाया। भीड़ आ गई।" माँ ने आँखें बंद कर लीं। "तब उन्होंने मुझे सड़क पर धकेल दिया। गिरी। सिर टकराया। बस इतना याद है।"
बंसी ने हाथ जोड़े। "कैसे आदमी थे, माँ? कपड़े? उमर?"
"एक बूढ़ा था। साठ के ऊपर। सफ़ेद कुर्ता।" माँ ने आँखें खोलीं। "और एक जवान। मोटा। गाल पर निशान।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में फ़ाइल। उन्होंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर चुप हो गईं।
"बोलिए," मैंने कहा।
"मैडम का पता चल गया है," सुमन ने कहा। "वो हमारे ही स्कूल की टीचर हैं। रीना, वो तुम्हारी स्कूल की ही हैं।"
रीना की आँखें फैल गईं।
"उन्होंने बताया," सुमन ने फ़ाइल खोली, "कि जब वो उन दोनों को देखकर चिल्लाईं, तो बूढ़े ने भागते वक़्त उन्हें एक बात कही।"
"क्या?"
"बूढ़े ने कहा — 'मेरी बहन है, घर ले जा रहे हैं। कोई तमाशा नहीं।'" सुमन ने फ़ाइल बंद की। "पर माँ का हाथ पीछे मुड़ा था, और वो रो रही थीं। इसलिए मैडम ने शोर मचाया।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका हाथ मेरे हाथ में था। अचानक उन्होंने अपनी दूसरी उँगली मेरी जेब की तरफ़ बढ़ाई।
"टोकन निकाल," उन्होंने फुसफुसाया।
मैंने निकाला। वो ठंडा हो चुका था। बीच की लकीर अब कुछ गहरी थी, जैसे किसी ने पीतल पर नाखून चला दिया हो।
माँ ने उसे देखा। उसका चेहरा बदल गया। "ये पहले ऐसा नहीं था।"
"नहीं," मैंने कहा।
माँ ने अपना बचा हुआ हाथ मेरी जेब पर रखा। उँगलियाँ काँप रही थीं। फिर उन्होंने टोकन की तरफ़ देखा, और बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "मन्नू। एक बात सुन।"
"बोल।"
"ये चीज़ मत इस्तेमाल कर।" उनकी उँगली टोकन पर थी। "तेरे पापा ने इसी के डर से जान दी थी।"
वार्ड में सन्नाटा। रीना के हाथ से पानी का गिलास छूटकर फ़र्श पर गिरा।
"क्या कहा तुमने?" बंसी ने आगे आकर पूछा।
माँ ने टोकन नहीं छोड़ा। "मैंने कहा — पापा इसी के डर से मरे।"
"और कुछ?" मैंने कहा। "माँ, तू इस वक़्त कुछ छिपा मत।"
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