The Token System – Chapter 772
रीना मेरे सामने बैठ गई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। "चुप। तूने भवानी को थाने भेजा, ये कम था? अब सोच। माँ को उठाने वाले को पता होना चाहिए कि वो खतरे में है।"
"पता था," मैंने कहा। "उसने भवानी से पहले ही कह दिया था।"
बंसी ने बीच में आकर कहा, "बहस बाद में। पहले ये बता — क्या चीज़ ली गई है?"
मैं उठा। माँ के कमरे में गया। तकिये के नीचे हाथ डाला। खाली। मैंने अलमारी का दरवाज़ा खोला — कपड़ों के नीचे रखा पुराना टिफ़िन बॉक्स नहीं था।
"फाइलें," मैंने बाहर आकर कहा। "जो दो फाइलें माँ के पास थीं — वो नहीं हैं।"
बंसी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "वो तो मैंने कल रात ही उसी टिफ़िन में उनकी अलमारी में रखी थीं।"
"तो कोई जानता था कि कहाँ हैं।"
चुप्पी।
रीना ने कहा, "माँ ने किसी को बताया होगा?"
"माँ किसी को नहीं बताती," मैंने कहा। "पर उस दिन भवानी के आदमी ने माँ को उठाया था। उसने घर में आँखें फेरी होंगी।"
बंसी ने सिर खुजाया। "फिर तो वो फाइलें किसी और के पास हैं।"
"और माँ भी।"
मैंने फिर से टोकन जेब से निकाला। अब ठंडा था। मैंने उसे हथेली पर रखा, उलटा-पलटा। पीतल पर कोई निशान नहीं। फिर मैंने कान के पास लाया — बस ख़ामोशी।
"कुछ बोलता है?" रीना ने पूछा।
"नहीं।"
बंसी ने कहा, "गरम तो हुआ था?"
"हुआ था।"
"तो करीब है कोई चीज़। जो भी है — ये टोकन उसके पास गरम होता है। जब माँ की चप्पल लाई गई, तब भी गरम हुआ। मतलब — गाड़ी, चप्पल और ये — तीनों एक ही दिशा से आए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "चौक से आई थी चप्पल।"
"तो चौक से आगे — बस स्टैंड वाली सड़क।"
रीना उठी। "माँ की सहेली रामबाई चौक पर ही रहती है। घर बस स्टैंड वाली सड़क पर।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "मेरी स्कूटी?"
"गाड़ी ले," बंसी ने कहा। "मैं राजेंद्र को ख़बर करता हूँ — कहीं और तो नहीं भेजा गया। फौरन आ रहा हूँ।"
रीना स्कूटी पर बैठी, मैंने गाड़ी स्टार्ट की। गली से बाहर निकलते ही सामने वो बूढ़ा दिखा — भवानी का आदमी। गाड़ी में हमारी तरफ़ देख रहा था। हाथ में कुछ था।
मैंने गाड़ी धीमी की। रीना ने फुसफुसाया, "रुक मत।"
"रुकूँ तो क्या वो खुद आएगा?" मैंने गाड़ी उसके पास ले जाकर रोकी। "क्या चाहिए?"
"ठाकुर साहब का संदेश है," बूढ़े ने कहा। "एक — तुम्हारी माँ ठीक है। दो — वो कुछ नहीं बोलेगी। तीन —" उसने मेरी तरफ़ देखा, "तीन — जो टिफ़िन थाने पहुँचेगा, वो तुम्हारी माँ के साथ वापस नहीं आएगा।"
राजस्थानी लहज़े में भी मैंने पहली बार ऐसी सफ़ाई सुनी।
"भवानी तो थाने में है," मैंने कहा।
"ठाकुर साहब की ख़बर थाने की चारदीवारी में नहीं फँसती।"
वो पलटा और गली के मोड़ पर गायब हो गया।
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ गरम हो रहे थे — टोकन।
मैंने गाड़ी चालू की। "बस स्टैंड।"
सड़क पर मोड़ लिया। आगे स्कूटी और गाड़ी में दूरी बढ़ती गई। पीछे सफ़ेद गाड़ी दिखी — वही नंबर प्लेट। मैंने गाड़ी तेज़ की। रीना ने मेरी कमर पकड़ ली।
सामने रामबाई का घर आया — छोटा, हरा दरवाज़ा। मैंने ब्रेक मारे। सफ़ेद गाड़ी दूर ही रुकी।
दरवाज़ा खटखटाया। रामबाई ने खोला। उसका चेहरा उतरा हुआ था।
"माँ को देखा?" मैंने पूछा।
रामबाई ने पीछे देखा। फिर मेरी तरफ़। "वो तो… तेरे घर गई थी। रात को किसी ने आवाज़ दी — 'बहन, दरवाज़ा खोल' — वो उठी और चली गई। तब से नहीं लौटी।"
रीना ने रामबाई का हाथ पकड़ा। "किसकी आवाज़ थी?"
रामबाई ने सिर झुकाया। "आवाज़ तो… तेरी माँ की लगी थी।"
रीना और मैंने एक-दूसरे को देखा।
"माँ घर पर नहीं थी," मैंने धीरे से कहा। "तो आवाज़ किसकी थी?"
पीछे सफ़ेद गाड़ी का दरवाज़ा खुला। बूढ़ा उतरा। उसके हाथ में माँ की दूसरी चप्पल थी — वो जो रीना ने दी थी।
"लो," उसने कहा। "ये भी धरती पर मिली थी। अब तुम्हारे पास दोनों हैं। मिलाकर रख लो — जब तक माँ का पता लगे।"
उसने चप्पल पैरों के पास गिरा दी और पलट गया।
रीना ने उसे उठाया। मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे सहलाया और जेब में डाले टोकन की तरफ़ देखा।
जेब गरम थी।
बहुत गरम।
मैंने जेब से हाथ निकाला तो हथेली लाल।
रीना की आवाज़ आई, "मन्नू — तू कहाँ खोया है?"
"कोई भी चीज़ जो माँ की हो, वो करीब आने पर टोकन गरम करती है," मैंने कहा। "पहले भी।" मैंने टोकन जमीन पर नहीं छोड़ा। "जो भी माँ को उठा ले गया — वो उसकी चीज़ें इधर-उधर फेंक रहा है। रास्ते पर रख रहा है। ऐसे — जैसे निशान छोड़ रहा हो। जान-बूझकर।"
रामबाई ने धीरे से कहा, "या फिर — ऐसे जैसे कोई बुला रहा हो।"
रीना ने टोकन की तरफ़ देखा। "माँ की चीज़ें ले जा रहा है — ताकि हम उनके पीछे-पीछे आएं।"
बंसी का फोन आया। मैंने स्पीकर पर डाला। "मन्नू, भवानी थाने से नहीं निकला। ये देखकर मुझे ही शक हुआ।"
"तो कौन?"
"ठाकुर की बिरादरी बड़ी है। बहनोई, मामा, चचेरे भाई। भवानी से बाहर किसी ने खेल खेला है।"
मैंने फोन बंद किया। सड़क पर नज़र दौड़ाई। सफ़ेद गाड़ी गायब थी।
मैंने दामाद-जैसे मन में कहा — काश, मैं माँ को अकेला न छोड़ता। मैंने रामबाई से बस एक बात पूछी, "रात में माँ ने कुछ पहना था? चूड़ी, चादर — कुछ?"
"ओढ़नी," रामबाई ने कहा। "नीली ओढ़नी।"
मैंने स्कूटी स्टार्ट की। गली-गली घूमा — ओढ़नी एक जगह नहीं मिली।
सूरज पूरा निकल आया। हम घर लौटे। दहलीज़ पर जो चप्पल पहले थी — वो भी नहीं थी।
रीना की आवाज़ आई, "वो… तीसरी नहीं है?"
मैं उठा, दरवाज़े के पास गया। जहाँ दहलीज़ पर एक चप्पल पड़ी मिली थी — वहाँ अब कुछ नहीं था। ज़मीन पर हलकी धूल के अलावा।
मेरे हाथ में चप्पल थी। दोनों। और जेब में टोकन — ठंडा।
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, दहलीज़ वाली चप्पल?"
"गई," मैंने कहा। "किसी ने उठा ली।"
रीना ने मेरे हाथ में पकड़ी चप्पलों की तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "अब तीन नहीं दो हैं।"
मैंने चप्पल दरवाज़े के पास एक तरफ़ रख दीं। फिर टोकन जेब से निकाला। उसे हथेली पर रखा। पीतल पर अब एक लकीर दिख रही थी — धुंधली, दाग जैसी। ठीक बीच में। मैंने उसे रगड़ा तो मिटी नहीं।
रीना ने उसे देखा। "ये पहले नहीं था।"
"नहीं," मैंने कहा।
टोकन मेरे हाथ में धीरे से फिर गरम होने लगा — पहले ठंडा, फिर हल्का गवा, फिर हाथ जलने सा लगा। मैंने टोकन ज़मीन पर नहीं रखा। उंगलियों में कसकर दबाया।
बंसी गली से दौड़ता हुआ आया। हाँफते हुए। "मन्नू, तेरे घर के पिछले हिस्से से… पैरों के निशान मिले हैं। हल्के दबे — दो जोड़ी। एक बड़ी उम्र की। एक पहलवान जैसे आदमी की।"
"कितनी दूर तक?"
"नाले तक। फिर मिट गए।"
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "माँ को बुलाकर ले जाने वाला कोई जान-पहचान वाला था। वरना माँ इतनी रात को बिना आवाज़ दिए दरवाज़ा न खोलती।"
"और आवाज़ माँ की थी," रामबाई ने कहा जो हमारे पीछे-पीछे आ गई थी। "ये जानने वाले ने आवाज़ नकली की। ये काम पहले भी हुआ है।"
मैंने टोकन बंसी की तरफ़ बढ़ाया। "देख — इस पर लकीर बन गई
॥
मैंने टोकन बंसी की तरफ़ बढ़ाया ही था कि वो मेरे हाथ से छूटकर गली की धूल में गिरा। मैंने उसे उठाया तो उँगलियाँ सुन्न हो गईं — इतना ठंडा कि लगा बर्फ़ का टुकड़ा हाथ में रख लिया है।
"दिखा तो," बंसी ने कहा।
"अभी नहीं।" मैंने टोकन जेब में डाला और घर की तरफ़ भागा।
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