The Token System770 / 1154

The Token System – Chapter 770

7 min read November 6, 2026

लाइन कट गई।

मैंने फोन जेब में रखा। रघुवीर मेरी तरफ़ देख रहा था।

"मन्नू?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। आवाज़ अब भी काँप रही थी।

"वो मेरी बहन की बात करता है," मैंने कहा।

रघुवीर का चेहरा बदल गया।

"मन्नू, वो झूठ है। वो डराने का तरीका है।"

"तो बंसी को क्यों फोन गया? जो मेरे पास है वो कोई है जो मेरी और रीना की पहचान जानता है। कोई भीतर का है। जो हमारे पीछे लगा है, पर भवानी की तरह सामने नहीं आता।"

रघुवीर चुप हो गया।

मैंने मोबाइल दोबारा निकाला। इसबार उसका स्क्रीन फिर चमका।

रीना का नाम।

मैंने उठाया।

"हाँ?"

दूसरी तरफ़ रीना की आवाज़ आई। सच में रीना की। फूट-फूटकर रो रही थी। पहले कभी नहीं रोई थी।

"मन्नू—" उसकी आवाज़ टूट रही थी। "माँ— माँ को ले गए।"

मेरा हाथ जम गया।

"कौन?"

"वो लोग। दो आदमी। बोले — भवानी ने बुलाया है। और मैं कुछ कर नहीं पाई।" वो रोई। "मन्नू, वो माँ को हवेली ले गए।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

भवानी ने सीधा खेल खेला था। मुझे लगता रहा कि वो रघुवीर के पीछे है। वो मेरी माँ के पीछे था।

रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा।

"मन्नू—"

"रघुवीर," मैंने कहा, आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। "तू मुंशी के पास जा। काग़ज़ लेकर सीधे राजेंद्र के पास। जो भी हो — फाइलें उसके हाथ में पहुँचनी चाहिए।"

"और तू?"

मैंने वो लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला। खाली था। पर भवानी को अभी यही चाहिए था।

"मैं हवेली जा रहा हूँ," मैंने कहा।

रघुवीर ने मेरा कंधा पकड़ा। "मन्नू, ये आत्महत्या है।"

"तो जाकर राजेंद्र को बता। कि अगर सुबह तक मेरी खबर न आए, तो होम पर धावा बोले।"

मैंने उसका हाथ खुद से हटाया और गली में निकल पड़ा।

पीछे रघुवीर कुछ कह रहा था, पर मैं सुन नहीं रहा था। सोच रहा था — भवानी एक चीज़ भूल रहा था। मैं काग़ज़ लेकर नहीं आ रहा था। मैं सिर्फ़ खुद को लेकर आ रहा था। और जब कोई आदमी अपना सब कुछ छोड़कर आता है, तो वो सबसे ख़तरनाक होता है।

मैंने टोकन जेब में पकड़ा।

गरम था।

॥

मैंने टोकन जेब में दबाया और गली के मोड़ की तरफ़ बढ़ा ही था कि सामने से साइकिल की घंटी बजी। बंसी था — बाँया हाथ कपड़े में लिपटा, दाहिने से हैंडल पकड़े, चेहरे पर पसीना।

"तू यहाँ?" मैंने कहा।

"बात मत कर।" उसने साइकिल मेरे आगे रोकी। "तेरी बहन को फोन आया, वो रो रही थी। मैंने उसका फोन छीनकर स्पीकर पर डाल दिया। उस तरफ़ से कोई बोल रहा था — तेरी बहन मेरे पास है, काग़ज़ लेकर आ।"

"मैंने भी वही सुना।"

"तो सुन आगे क्या बोला।" बंसी ने जेब से मोबाइल निकाला, कुछ दबाया। रीना की आवाज़ आई — फूट-फूटकर रो रही थी — फिर वो आवाज़, ठंडी, खींची हुई।

"स्कूल की छुट्टी के बाद मेरे आदमियों के साथ है वो। हवेली का रजिस्टर और चौथे ताले की चाबी लेकर आ। वरना कल के अख़बार में छपेगा — ठाकुर के यहाँ से भागी लड़की, दूसरी शादी तय।"

बंसी ने फोन बंद किया। मैंने आसपास देखा।

"रीना कहाँ है?"

"तेरे पीछे।"

मैं मुड़ा। रीना साइकिल के पीछे खड़ी थी। आँखें सूजी हुईं, पर रो नहीं रही थी। स्कूल का थैला कंधे पर, स्कूटी पीछे खड़ी।

"मैं स्कूल से निकली तो एक सफ़ेद गाड़ी मेरे पीछे लगी," उसने कहा। "मैंने बाज़ार के फेरे लगाए, फिर पीछे की गली से निकलकर बंसी भाई की दुकान पर आ गई। दो आदमी थे। एक भी मेरे पास नहीं आया।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो हँसा, दाँत निकाले।

"अब फोन लगा।" उसने मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने भवानी का नंबर मिलाया। दूसरी घंटी पर उठा।

"खबर मिल गई?"

"रीना यहाँ है," मैंने कहा। "मेरे सामने खड़ी है। तेरे आदमी उसके पीछे पीछे घूमते रह गए।"

कुछ सेकंड चुप्पी। फिर वो हँसा — छोटी, खुरदरी हँसी।

"अच्छा। तो अब मैं सीधा बोलता हूँ। तेरी माँ अभी अपने घर में है?"

मेरा हाथ जम गया।

"क्यों?"

"क्योंकि अगर तूने मेरा रजिस्टर और चाबी नहीं पहुँचाई, तो सुबह तेरी माँ को उठवा लूँगा। और जब उठेगी, तो उसके हाथ में वो काग़ज़ होगा जो उसने कभी नहीं लिखा। मेरा हवेली का हिस्सा। समझा?"

खून सिर चढ़ गया। मैंने दाँत भींचे।

"सुन भवानी।" आवाज़ मेरी निकली, पर जैसे किसी और की। "तू मेरी माँ को हाथ लगाएगा, तो मैं तेरी सारी फाइलें पुलिस और अख़बार, दोनों को दे दूँगा। तीन साल का हिसाब। तीस मरीज़। तेरे होम के काग़ज़। और बता — तेरा बेटा कुंवर भी उसी फाइल में बैठा है।"

"मेरा बेटा—"

"हाँ, तेरा बेटा। जिसे तूने बसवा में पटक दिया था। जो अब तेरे ख़िलाफ़ गवाही दे रहा है। वो भी उसी फाइल में।"

लाइन पर सिर्फ़ साँस सुनाई दी। फिर कट गई।

मैंने फोन बंसी को लौटाया। हाथ काँप रहे थे।

"अब वो डरा हुआ है," बंसी ने कहा। "डरा हुआ आदमी सोचता नहीं, फूँक मारता है। तेरी माँ को अभी उठवा सकता है।"

"तो क्या करें?"

"फाइलें पढ़।" बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "रात ख़त्म होने से पहले जो काग़ज़ तेरे पास हैं, वो पढ़ ले। और माँ को यहाँ से हटा।"

मैंने रीना की तरफ़ देखा।

"तू घर जा। माँ को लेकर सीधे मामा के यहाँ—"

"मामा तो गए," रीना ने कहा। "दो महीने पहले।"

"तो पुरानी बस्ती। बंसी के ससुर का मकान। वहाँ कोई नहीं ढूँढेगा।"

रीना ने स्कूटी की चाबी निकाली। "तू आ रहा है?"

"मैं हवेली जाऊँगा।"

रोकने की कोशिश नहीं की उसने। बस एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर मुड़ गई।

"दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेना," बंसी ने पीछे से कहा। "और खिड़की भी।"

वो चली गई।

बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे दुकान के पीछे वाले कमरे में खींच लाया। खटिया पर बैठकर उसने अपनी कपड़े में लिपटी कलाई सीधी की, चेहरे पर दर्द उभरा, फिर दबा गया।

"सुन," उसने कहा। "तेरे पास जो रजिस्टर-थैला है, वो पुरानी बस्ती में रखवा आया हूँ। मेरे ससुर के मकान में, पीछे की ईंट के नीचे।"

"तूने हवेली में क्या किया?"

"जो कर सका।" उसने पानी का गिलास उठाया, एक साँस में पीया। "भवानी के आदमी मुझे पकड़कर हवेली ले गए थे। बोले — बता, मन्नू कहाँ है? मैंने कहा, मुझे क्या पता, वो तो तेरा ही आदमी ढूँढ रहा है। फिर उन्होंने मुझे बैठक के पास वाली कोठरी में बंद कर दिया।"

"फिर?"

"फिर मैंने दीवार की तरफ़ कान लगाया। भवानी किसी से बात कर रहा था। और वो किसी को बोल रहा था — जितनी जल्दी हो, माँ को उठाकर लाओ। मैंने सुना, पर बाहर नहीं आ सका। फिर कोई औरत आई, चाय का कप देकर गई। मैंने कुंडी खोली, बाहर निकला, पिछले दरवाज़े से भागा।"

"और अब?"

"अब मैं तेरे साथ हूँ।" उसने खटिया से उठते हुए कहा। "हाथ टूटा है, तो क्या हुआ। हवेली के पिछले दरवाज़े का रास्ता मुझे पता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं था।

"तेरी बहन ने कहा था — तू माँ से कुछ छिपा रहा है?"

"हाँ।"

"क्या?"

"टोकन।"

बंसी ने गिलास मेज़ पर रखा। उसकी आँखें सिकुड़ीं।

"क्या मतलब?"

"ये सब — जो भी आज तक हुआ। देख, मैंने कभी तुझे पूरी बात नहीं बताई। पर अब रात है, हवेली में सब खेल खुलेगा। और अगर मैं सुबह तक न आऊँ—"

"वो तेरे हिसाब का काम है।" बंसी ने मेरी बात काटी। "मुझे नाम नहीं चाहिए। मुझे ये चाहिए कि जब मैं हवेली के पिछले दरवाज़े से घुसूँ, तो तू अंदर हो। बस।"

मैंने सिर हिलाया।

हम गली में निकले। रात बढ़ रही थी।

हवेली के पिछवाड़े की गली सूनी थी।

पीपल का पेड़ पहले से ज़्यादा बड़ा लग रहा था। उसके नीचे एक दीपक जल रहा था, मिट्टी का, छोटा, पीली लौ। मैंने बंसी की तरफ़ देखा।

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