The Token System – Chapter 769
"तू है ना यहाँ?"
"हूँ।" उसकी आवाज़ काँपी। "पर मेरा फोन मेरी जेब में है।" उसने जेब टटोली। "मेरा फोन… मेरा फोन नहीं है।"
फोन में आवाज़ फिर आई।
"देखा? मैंने कहा था ना। अब सुन। तेरी बहन की आवाज़ मेरे पास रिकॉर्ड है। तेरे पास जो काग़ज़ है, वो हवेली के गेट पर रख दे। अकेले। और मैं तेरी बहन को छोड़ दूँगा।"
"मेरी बहन मेरे पास बैठी है," मैंने कहा।
"हाँ।" वो हँसा। "पर सवाल ये है — वो कौन सी बहन है?"
लाइन कट गई।
लाइन कट गई। मैंने मोबाइल देखा। स्क्रीन काली हो चुकी थी। मैंने दोबारा उसी नंबर पर लगाया तो घंटी जाने के बाद भी कुछ नहीं आया। बस बंद।
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। उसका हाथ स्टेयरिंग से हट चुका था।
"उसने क्या कहा?" उसकी आवाज़ सूखी थी।
"कुछ नहीं।"
"मन्नू।"
"कहा कि तेरी बहन उसके पास है।"
रीना की पकड़ ढीली पड़ गई। "मेरी बहन? मेरी कोई बहन नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "दो बहनें हैं तेरे पास? कोई छोटी?"
"बस एक हूँ मैं, माँ की।"
"तो फिर ये कौन—" मैं खुद को रोक लिया। सोचने लगा की ऐसा क्या चल रहा है आखिर। फोन स्क्रीन पर उसका नाम आया। रीना सामने बैठी है। और उसका फोन जेब में ही है।
"तेरा फोन दिखा," मैंने कहा।
रीना ने जेब से मोबाइल निकाला। स्क्रीन चालू थी। मैंने देखा — उसके फोन में कोई भी कॉल लॉग नहीं था। कोई पिछली कॉल नहीं। जैसे अभी बजा ही न हो।
"मेरे पास कोई कॉल नहीं आया," उसने कहा।
"मेरे पास आया।" मैंने अपनी स्क्रीन दिखाई। कॉल लॉग खाली था।
रीना ने फोन जेब में रखा। "मन्नू, मुझे घर जाना है।"
"नहीं।"
"तू मेरी बाप नहीं है।"
"माँ के पास दो आदमी हैं—"
"और मैं अगर नहीं गई तो?" उसकी आवाज़ बढ़ गई। "तो क्या भवानी उन्हें बुला लेगा? क्या वो माँ को कुछ करेगा?"
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला।
"जा।"
वो रुकी।
"जा," मैंने दोहराया। "मगर याद रख — घर के पीछे से जाना। सामने के दरवाज़े से मत चढ़ना। और माँ को लेकर सीधे पुरानी बस्ती, बंसी के ससुर के मकान। पता है ना?"
"तुझे कहाँ पता मेरी माँ कहाँ जाएगी?"
"मुझे पता है।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "क्योंकि अगर वो उस घर में रहेगी, तो अगली रात तक भवानी के आदमी उसे उठा लेंगे। और तुझे पता है मैं सही बोल रहा हूँ।"
रीना की आँखें भरीं, पर उसने सिर हिलाया। वो गाड़ी से उतरी। दो कदम चली, फिर रुकी।
"तू होम जा रहा है?"
"हाँ।"
"अकेला?"
"रघुवीर वहाँ है।"
"वो भी फँसा है, और तू भी फँसेगा।"
"तो कोई और जाएगा?" मैंने सिर झुकाया। "मेरे पिता का दोस्त है। मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकता।"
रीना कुछ कहने ही वाली थी कि दूर से एक गाड़ी की रोशनी आती दिखी। हम दोनों एक ही पल में गली के किनारे सरक गए।
गाड़ी धीरे-धीरे गुज़री। काली रंग की। शीशे चढ़े हुए। अंदर तीन-चार सिर दिखे।
वो गुज़र गई। पर मेरी साँस तब तक रुकी थी।
रीना ने मेरा कुर्ता खींचा। "ये हमें ढूँढ रहे हैं।"
"नहीं।" मैंने रास्ते की तरफ़ देखा। "ये उस गाड़ी को ढूँढ रहे हैं जो हम चला रहे थे। उन्हें लगता है हम निकल गए।"
"तो?"
"तो अब वो होम की तरफ़ जाएँगे। ये अच्छा है।"
रीना ने मुझे घूरा। "अच्छा है?"
"हाँ।" मैंने गाड़ी की चाबी उसकी तरफ़ बढ़ाई। "गाड़ी तू ले। मैं पैदल जाऊँगा। कोई मुझे गाड़ी में नहीं ढूँढेगा।"
"मन्नू—"
"जा। और हाँ — भवानी को अगर कोई फोन करे तो कह देना मन्नू ने तुझे छोड़ दिया। कह देना तू नाराज़ है।"
"और अगर वो खुद आए?"
"तो तू भवानी की बात मानने की अभिनय करना। कहना कि मुझे भी नहीं पता वो कहाँ गया।"
रीना ने सिर हिलाया। मुझे कुछ कहना था पर वो मुड़कर गाड़ी की तरफ़ बढ़ गई। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। मैंने देखा जब तक गाड़ी गली के मोड़ पर नहीं पहुँची।
फिर मैं पैदल चल पड़ा।
पुरानी बस्ती से होम की दूरी ज़्यादा नहीं थी — बीस-पच्चीस मिनट पैदल। पर ये बीस मिनट मुझे ज़िंदगी के सबसे लंबे मिनट लगे। सोचता जा रहा था — वो फोन कौन था? भवानी था? नहीं। भवानी ने खुद कहा — "भवानी नहीं।" तो कोई और है। कोई जो भवानी के लिए काम करता है, पर खुद को अलग रखता है।
और उसका ये कहना — "तेरी बहन मेरे पास है।" कौन सी बहन?
मेरे पैर रुक गए।
मुझे अपनी बहन याद आई। सात साल की थी जब आख़िरी बार देखा था। बारिश के दिन उसका हाथ छूट गया था मेला में। उसके बाद कभी नहीं मिली। पुलिस ने खोजा। बाबा ने खोजा। कोई कुछ नहीं जान सका। माँ आज तक उसकी फोटो जेब में रखती है।
ये फोन उसी की बात कर रहा हो? या ये मुझे डराने का तरीका है?
मैंने खुद को झटका। सोचने का वक़्त नहीं था।
होम का पिछली तरफ़ का दरवाज़ा बंसी ने याद दिलाया था। मैं उसी रास्ते गया। एक पुरानी दीवार, ऊपर काँटेदार तार। पर एक जगह से तार टूटा था। शायद बंसी का ही काम। मैं चढ़ गया।
अंदर उतरा तो सन्नाटा था। रोशनी एक-एक ही बल्ब की। दूर कमरे में किसी के हिलने की आहट आई। मैं दबे पाँव बढ़ा।
दरवाज़ा खुला था। अंदर रघुवीर चौकी पर बैठा था। हाथ पीछे बँधे थे। चेहरे पर खून सूखा हुआ था।
मैंने उसके मुँह पर उँगली रखी। वो उठा। मेरी आँखें छलछला आईं, पर कुछ नहीं बोला।
मैंने उसके हाथ खोले। वो खड़ा हुआ। घुटने काँप रहे थे।
"काग़ज़?" उसने फुसफुसाया।
"मेरे पास नहीं," मैंने कहा। "बंसी के पास हैं।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा।
"तू आ गया," उसने कहा। "पागल।"
"चल।"
हम बाहर निकले। रास्ते में रघुवीर ने धीरे से कहा — "वो फाइलें बेकार हैं।"
मैं रुका।
"क्या?"
"फाइलें। जो मैंने निकाली थीं। असली काग़ज़ मेरे पास नहीं हैं। वो मैंने मुड़वा दिए थे।"
मुझे लगा ज़मीन खिसक गई।
"तो फिर भवानी—"
"भवानी को लगता है फाइलें मेरे पास हैं," रघुवीर ने कहा। "यही मेरी ढाल थी। अगर उसे पता चल जाए कि असली काग़ज़ किसी और के पास हैं—"
"कहाँ हैं असली काग़ज़?"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा। "एक आदमी है। मुंशी। दुकान के नीचे उसका पुराना तहखाना है।"
मैंने वहीं खड़े-खड़े बंसी को फोन लगाया। घंटी गई। कोई जवाब नहीं।
दोबारा। फिर।
तीसरी बार पर फोन उठा। पर आवाज़ बंसी की नहीं थी।
"हाँ?"
मैं चुप हो गया।
"मन्नू?" वो आवाज़ मेरी जान-पहचान की लगी। पर नाम याद नहीं आ रहा था।
"कौन?"
"बंसी का ससुर।" बूढ़ी आवाज़। "वो आया था। थैला रखकर चला गया। कह गया — अगर उसका फोन आए तो बता देना कि फाइलें सुरक्षित हैं। और ये भी कह गया कि तू हवेली मत जाना।"
"तो क्या करेगा?"
"वो खुद जा रहा है।"
मेरा दिल धक से रह गया। बंसी हवेली गया है? टूटे हाथ के साथ?
मैंने फोन काटा। रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या हुआ?"
"बंसी हवेली गया है।"
रघुवीर की आँखों में डर आया।
"तो फिर तेरा यहाँ रहना बेकार है," उसने कहा। "अब जो होगा, सब वहीं होगा।"
मैंने सोचा। बंसी हवेली में है। भवानी वहीं है। असली काग़ज़ मुंशी के तहखाने में हैं। और वो फोन—
मेरी जेब में मोबाइल फिर बजा।
स्क्रीन पर नाम — रीना।
मैंने सामने देखा। पर इसबार रीना सामने नहीं थी। वो तो गाड़ी लेकर चली गई थी। मैंने सोचा। फिर ये फोन?
मैंने उठाया।
दूसरी तरफ़ भवानी की आवाज़ थी। ठंडी, बुझी हुई, जैसे किसी ने लंबा नशा किया हो।
"तेरी बहन मेरे पास है।"
मैं खड़ा रह गया। मेरे हाथ से फोन फिसलता लगा।
"कौन सी बहन?" मैंने पूछा। आवाज़ काँप रही थी। "मेरी कोई बहन नहीं—"
"अभी नहीं है," भवानी ने कहा। "पर हो सकती है। तू काग़ज़ लेकर हवेली आ जा। फिर देखना — तेरे सामने कौन बैठा है।"
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