The Token System768 / 1154

The Token System – Chapter 768

6 min read November 6, 2026

"दी। पर उसमें नमक डाल दिया। दोनों ने एक घूँट लिया और थूक दिया।" वो खाँसा। "फिर मोटे ने मुझे धक्का दिया, और पतले ने मेरा हाथ पकड़कर मरोड़ा। लाठी से बर्तन तोड़ दिए।"

मैंने उसके हाथ को छुआ। वो कराहा।

"बंसी, अस्पताल चल।"

"पहले बात सुन।" उसने मेरी कलाई पकड़ी। "जाते-जाते पतले ने कहा — 'ठाकुर का संदेश है। मन्नू को बोल देना, अगला नंबर रीना का है।'" बंसी ने रीना की तरफ़ देखा, जो पीछे आ खड़ी थी। "बोल दिया। अब तू जो करना है कर।"

रीना की आँखें बड़ी हो गईं। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। पहली बार। इस तरह नहीं पकड़ा था उसने कभी।

"मन्नू," उसकी आवाज़ धीमी थी। "मैं डर गई।"

मैंने उसका हाथ थामा।

"डरना तेरा हक़ है। पर अब कुछ नहीं होगा।"

"कैसे?"

"क्योंकि अब मैं मिल जाऊँगा।" मैंने थैले की तरफ़ देखा। "और भवानी को जो चाहिए, वो मेरे पास है — पर उसके पास नहीं।"

मैंने गाड़ी से थैला उठाया और बंसी के सामने रख दिया।

"ये क्या है?" बंसी ने पूछा।

"पाँच साल का हिसाब। भवानी के दफ़्तार की तिजोरी से। रघुवीर ने हमें निकाला, खुद पीछे रुक गया।"

"रघुवीर पकड़ा गया?"

"हाँ।"

बंसी ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने अपना दाहिना हाथ थैले पर रखा।

"तो पहले ये खोल।"

"बंसी, तेरा हाथ—"

"मेरा हाथ टूटा है, आँख नहीं।" उसने थैला खींचा। "खोल।"

रीना ने पीछे से एक टूटी कुर्सी उठाकर रख दी। मैं बैठ गया। थैले से पहला रजिस्टर निकाला।

कवर पर नाम लिखा था — "ज़ारी — अठारह सौ निन्यानवे से दो हज़ार चार।" मोटा, भूरे कवर वाला।

पहला पन्ना खोला। चार कॉलम — नाम, तारीख़, रकम, "भेजा गया"।

बंसी ने उँगली रखी।

"ये देख। ये नाम। शकुंतला देवी। तारीख़ — पहली।"

"और ये?"

"तीसरी तारीख़। दो दिन का फ़र्क़। मरीज़ भर्ती पहली को हुई और भेजी तीसरी को — यानी बीच के दो दिन में उसका क्या हुआ, कहीं दर्ज नहीं।"

मैंने पन्ना पलटा। दूसरा नाम।

"गेंदा देवी," रीना ने पढ़ा। "रात ग्यारह बजे भर्ती। स्टेबल लिखा है। और अगले दिन सुबह होम भेजी गई।"

"स्टेबल लिखकर भेज दिया," बंसी ने कहा। "यानी जानती थी कि ज़िंदा नहीं बचेगी।"

"कौन जानती थी?" रीना ने पूछा।

मैंने पन्ना पलटते हुए कहा, "जो भेजने का हुक्म लिखता था।"

तीसरा नाम। चौथा। पाँचवाँ।

मेरी उँगली रुक गई।

"ये," मैंने कहा।

उस पन्ने पर नाम लिखा था — "मनोहर। उम्र — अट्ठाईस। तारीख़ — सात। जगह — खेत्री।"

"ये मैं हूँ," मैंने कहा। "ये मेरा नाम है।"

रीना ने रजिस्टर खींचा। "क्या बकवास है — तू तो कभी—"

"देख आगे।"

अगले कॉलम में लिखा था — "हिस्सा: बहन की शादी।" और उसके नीचे — "रकम: तीन लाख। भेजा गया: नहीं।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।

"तीन लाख," वो बोला। "तेरी बहन की शादी के लिए। और तूने किसी से कहा भी नहीं?"

"मैंने किसी को नहीं कहा।"

"तो फिर ये भवानी को कैसे पता?"

हम तीनों चुप हो गए।

क्योंकि जवाब सिर्फ़ एक था। और उसे बोलने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि उस वक़्त दुकान के पीछे की गली से पैरों की आहट आई।

बंसी ने फौरन रजिस्टर अपनी जाँघ के नीचे दबा दिया और कराहने लगा — ज़ोर से।

"आह! हाय! हाथ! ओय, कोई है? मदद करो!"

आहट रुकी। फिर तेज़ हुई — दूर जाती हुई।

मैंने साँस रोकी। रीना दीवार से चिपक गई। बंसी कराहता रहा, फिर धीरे से फुसफुसाया, "चले गए।"

"तूने किया कैसे?"

"बीस साल से इस गली में बैठा हूँ।" उसने रजिस्टर वापस निकाला। "मुझे पता है कौन सी आवाज़ किसको बुलाती है।"

मैंने चौथा रजिस्टर खोला।

"ये अलग है," रीना ने कहा। "इसका कवर लाल है।"

"ये मरीज़ों का नहीं है," मैंने पहला पन्ना पढ़ा। "ये रिश्तों का है।"

पहला पन्ना था — "रिश्ता तोड़ा गया। लड़की: शेखर बाबू की बेटी। कारण: काग़ज़। रकम: —"

दूसरा पन्ना — "रिश्ता रोका गया। लड़का: अनूप। कारण: ज़मीन। रकम: —"

तीसरा पन्ना — "रीना। उम्र: पच्चीस। तारीख़: बारह। हिस्सा: शादी। शर्त: रकम वापस।"

रीना का हाथ काँपा। उसने रजिस्टर मेरे हाथ से लिया और उसे दोनों हाथों से पकड़कर देखने लगी।

"मेरा नाम," वो बोली। "मेरे नाम के आगे — 'शर्त: रकम वापस'।"

"रीना—"

"मतलब मेरी शादी भी उसके हिसाब में है।" उसने रजिस्टर बंद कर दिया। "मेरी शादी भी।"

उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं था। कुछ और था। जो मैंने पहले कभी नहीं सुना उसके मुँह से।

बंसी ने कुर्सी पर हाथ रखकर खुद को उठाया। हाथ में दर्द से उसका चेहरा टेढ़ा हो गया, पर वो खड़ा हो गया।

"सुनो," उसने कहा। "अब मैं कुछ कहूँगा, और दोनों ध्यान से सुनना।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये फाइलें यहाँ नहीं रह सकतीं। भवानी के आदमी चारों तरफ़ घूम रहे हैं।"

"तो कहाँ?"

"मेरे पास एक जगह है। पुरानी बस्ती में, मेरे ससुर का मकान। वहाँ कोई नहीं आता।"

"और रघुवीर?" मैंने कहा। "वो होम में बंद है। भवानी ने उसे पकड़ा है।"

"रघुवीर को मैं निकाल लाऊँगा," बंसी ने कहा। "पर पहले — तेरी बहन।" उसने रीना की तरफ़ देखा। "तू अब घर नहीं जाएगी।"

रीना ने सिर उठाया।

"मैं घर जाऊँगी," उसने कहा। "माँ अकेली है।"

"माँ के पास दो आदमी हैं," बंसी बोला। "राजेंद्र ने भेजे हैं। मुझे पता है।"

"तू कैसे जानता है?"

"क्योंकि राजेंद्र ने मुझे ही बताया था।" बंसी ने अपना टूटा हाथ सहलाया। "उसने कहा था — होम पर नज़र रखो, मन्नू के घर पर भी।"

रीना ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।

"अभी सिर्फ़ एक काम है," मैंने कहा। "भवानी को लगे कि काग़ज़ मेरे पास है।"

मैंने वो लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला — जो दुकान से खरीदे गए छोटे लिफ़ाफ़े में बंद था।

"इसका क्या करेगा?" रीना ने पूछा।

"आधी रात को हवेली में मिलेगा। तब तक हम होम से काग़ज़ निकाल लेंगे।"

"और अगर वो पहले ही समझ जाए कि लिफ़ाफ़े में कुछ नहीं?"

मैंने टोकन को जेब में पकड़ा। गरम था।

"तब वो मुझे रोकेगा नहीं। वो सोचेगा — लड़का खुद आ रहा है।"

बंसी ने थैला उठाया। "मैं इसे लेकर पुरानी बस्ती जाता हूँ।"

"हाथ टूटा है तेरा—"

"हाथ टूटा है, टाँग नहीं।" उसने थैला कंधे पर लटकाया। "और सुन, मन्नू। एक बात याद रख।" वो रुका। "जब भी भवानी के होम जाए, पीछे का दरवाज़ा याद रख। वहीं से निकलना। सामने का फाटक अब हमेशा बंद मिलेगा।"

मैंने हामी भरी।

वो गली के अंधेरे में गायब हो गया।

रीना ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू अब भी होम जाएगा?"

"रघुवीर वहाँ है।"

"और काग़ज़?"

"वही तो।" मैंने गाड़ी की तरफ़ चलते हुए कहा। "दोनों एक ही जगह हैं।"

हम गाड़ी में बैठे। रीना ने इंजन चालू किया। अभी गियर डाला ही था कि मेरी जेब में मोबाइल बजा।

मैंने निकाला। स्क्रीन पर नाम चमका।

रीना।

मैंने सामने देखा। रीना गाड़ी में बैठी थी। मेरे बगल में। दोनों हाथ स्टेयरिंग पर।

उसकी जेब से कोई मोबाइल नहीं बज रहा था।

मैंने फोन उठाया।

"हाँ?"

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई। धीमी, ठंडी, जैसे कोई चाय का कप रखकर बोल रहा हो।

"तेरी बहन मेरे पास है।"

मेरा हाथ जम गया।

रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "कौन है?"

मैंने फोन नहीं काटा।

"भवानी?" मेरी आवाज़ फटी।

"भवानी नहीं।" हल्की हँसी। "भवानी तो तेरा इंतज़ार कर रहा है, हवेली में। पर मैं सोचता हूँ — तू वहाँ नहीं जाएगा। तू पहले उसे ढूँढने जाएगा जिसे मैंने भेजा है।"

"किसे?"

"जिसे तू अभी अपने बगल में बैठा देख रहा है।"

मैंने फोन कान से हटाया। स्क्रीन पर नाम अब भी "रीना" था।

और बगल में बैठी रीना ने धीरे से कहा — "मन्नू, फोन काट।"

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