The Token System767 / 1154

The Token System – Chapter 767

6 min read November 6, 2026

रीना ने धीरे से कहा, "माँ को पता है?"

"नहीं।" मैंने फाइल बंद कर दी। "और अभी नहीं पता चलेगा।"

मैंने जेब से वो पीला लिफ़ाफ़ा निकाला जो शेखर बाबू ने दिया था। खोला। अंदर एक काग़ज़ और एक पर्ची।

पर्ची पर शेखर बाबू की लिखाई — "भवानी ने अपने आदमियों से कहा है — रात में सब कुछ जलाना है। मैं नहीं मानता। ये फाइल तेरे हवाले। तेरा — शेखर।"

काग़ज़ पर — सिर्फ़ एक लाइन, "जो काग़ज़ है, वो अभी होम के तीसरे कमरे की दीवार में है। रात तक उसको निकलना होगा।"

रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या है?"

"कुछ नहीं।"

"मन्नू।"

मैंने गाड़ी चालू की।

बंसी ने पीछे से कहा, "रघुवीर।"

"मुझे पता है।" मेरी मुट्ठी में काँच का दर्द फैल गया। "पहले वो काग़ज़। फिर रघुवीर।"

रीना चुप रही। फिर बोली, "मैं चलूँगी।"

"नहीं—"

"मन्नू, तू अकेला है। बंसी के हाथ में पट्टी है। रघुवीर पकड़ा गया है। मैं जानती हूँ — मैं कुछ नहीं करूँगी, बस गाड़ी चलाऊँगी। तेरे हाथ काँप रहे हैं।"

मैंने उसका चेहरा देखा। वो सही कह रही थी।

"एक शर्त," मैंने कहा। "गाड़ी में बैठी रहेगी।"

"हाँ।"

"अगर मैंने कहा — पीछे, तो सवाल नहीं।"

"हाँ।"

"वादा?"

"वादा।"

मैंने उसे गाड़ी में आगे बैठने दिया।

टोकन मेरी जेब में हल्का-सा हिला। मैंने हाथ जेब में डाला। गरम था।

और जब मैंने उँगलियाँ खोलीं, तो हथेली पर एक शब्द उभरा — "पीछे।"

मैंने रीना को देखा। वो सड़क देख रही थी।

"और एक बात," मैंने कहा। "अगर मैं कहूँ — पीछे… तो तू बिना पूछे पीछे जाएगी। बंसी के साथ।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। थोड़ी देर।

"मन्नू, तू क्या कर रहा है?"

"वादा।"

"तेरी आँखें ऐसी नहीं देखी मैंने," उसने धीरे से कहा।

"वादा, रीना।"

वो सामने देखने लगी। "वादा।"

मैंने गाड़ी अस्पताल के आगे वाले फाटक से दूर मोड़ी। अस्पताल के पीछे एक गली थी — जिसमें एक खाली मकान का पिछवाड़ा खुलता था। मैंने वहीं गाड़ी रोकी।

"दो मिनट में आता हूँ।" गाड़ी से उतरकर मैंने पीछे मुड़कर देखा। "प्रकाश।"

बंसी ने पूछा, "कौन?"

"भवानी का भांजा। जो सुबह दिखा था — काले कुर्ते वाला पतला। अगर वो रघुवीर को बाद में किसी से मिलवाए, तो मुझे इशारा चाहिए। तू यहीं रह। गाड़ी में। कुछ गड़बड़ हो तो हॉर्न मार।"

बंसी ने गाड़ी की चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई।

"ड्राइवर कौन?"

"तू।" मैंने मुस्कुराकर कहा। "पर अभी गाड़ी में।"

वो चुप बैठ गया।

मैं गली से बाहर निकला। अस्पताल का पिछला हिस्सा — वहीं जहाँ खिड़की से गिरा था। दीवार टूटी थी, नीचे घास। मैंने झाँका। कोई नहीं। शायद रघुवीर को भवानी के होम ले गए।

मैंने जेब में टोकन को हाथ लगाया। "क्या करूँ?"

टोकन पर शब्द आया — "दीवार।"

"कौन सी दीवार?"

शब्द गायब। टोकन ठंडा।

मैं वापस गाड़ी की तरफ़ चला। रीना खिड़की से झाँक रही थी।

"कुछ?"

"अभी नहीं।"

तभी — अस्पताल की तरफ़ से एक लड़का भागता आया। पंद्रह-सोलह साल का। फटी शर्ट, चप्पल। हाँफ रहा था। सीधे मेरी तरफ़।

"तू… तू मन्नू है ना?"

"कौन है तू?"

"मैं… मैं वहाँ काम करता हूँ। चौकीदार का बेटा।" उसने घुटनों पर हाथ रखकर साँस ली। "तेरा दोस्त पकड़ा गया है। उसे भवानी के होम में ले गए। और—" उसने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। "ये फेंकने को कहा गया है तेरे पास। कह रहे थे — इसको ये मिले तो वो खुद आएगा।"

मैंने काग़ज़ खोला।

"आधी रात, हवेली। तू। और तेरे बाप का काग़ज़। बाकी सब बाहर। — भवानी।"

नीचे तारीख़ नहीं थी। बस "आज"।

"भवानी आया था?" मैंने लड़के से पूछा।

"हाँ, अभी। तेरे दोस्त को गाड़ी में बिठाकर। पहले मुझे धमकाया — बोलो सच, वरना तेरे बाप की नौकरी।"

"तूने क्या कहा?"

"मैंने कहा — मुझे कुछ नहीं पता।" लड़के की आँखें भरी थीं। "मेरे बाप बीमार हैं। मैं ये नौकरी खो नहीं सकता।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "क्या नाम है तेरा?"

"अजय।"

"अजय, तूने सही किया। अब घर जा। किसी को मत बता।"

वो भाग गया।

रघुवीर गया। काग़ज़ अभी तक भवानी के होम के तीसरे कमरे में है। और भवानी ने मुझे आधी रात हवेली बुलाया है — सिर्फ़ उस काग़ज़ के लिए।

मैंने रीना को देखा।

"रीना, गाड़ी निकाल। वापस।"

"कहाँ?"

"होम के पीछे वाली गली। रघुवीर वहीं कहीं है। और मैं वो काग़ज़ लेकर आता हूँ।"

"उस काग़ज़ को जानता कौन है?"

मैंने टोकन को जेब में पकड़ा।

"अब सिर्फ़ मैं।"

गाड़ी गली से निकली। सामने एक छोटी सी दुकान थी — पुराने लिफ़ाफ़े, काग़ज़, टिकट। मैंने हाथ उठाकर रुकवाया। दुकानदार बूढ़ा था, चश्मा।

"भाई," मैंने कहा, "एक लिफ़ाफ़ा और खाली काग़ज़। सबसे छोटा।"

उसने लिफ़ाफ़ा दिया। मैंने जेब से एक पुराना काग़ज़ निकाला — जो शेखर बाबू ने दिया था। बिना पढ़े ही मैंने उसे दूसरे काग़ज़ में लपेटकर लिफ़ाफ़े में डाल दिया, और ऊपर लिखा — "भवानी के लिए। काग़ज़ अंदर है।"

काग़ज़ असली था, और रात होम के तीसरे कमरे से मुझे निकलना था। भवानी को सिर्फ़ यही कहना था — काग़ज़ मेरे पास है। बस।

"ये क्या है?" रीना ने पूछा।

"इससे वो चुप रहेगा। कुछ घंटे।"

"और उसके बाद?"

"उसके बाद — हम पहले निकल चुके होंगे।"

रीना ने गाड़ी चलाई।

टोकन जेब में गरम था। मैंने हाथ डाला।

हथेली पर एक शब्द उभरा — "जल्दी।"

मैंने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। आसमान पर बादल थे। और अस्पताल के पीछे होम के तीसरे कमरे की रोशनी — कुछ सेकंड के लिए जली, फिर बुझ गई।

॥

खिड़की से नीचे गिरते वक़्त मैंने थैला सीने से चिपका लिया। पाँच साल के हिसाब के चार रजिस्टर, एक पीली फाइल — और मेरी चोट खाई हथेली। घास गीली थी, पैर फिसला, घुटना टकराया। पर खड़ा हो गया।

सामने गाड़ी का दरवाज़ा खुल चुका था।

"अंदर!" रीना ने चिल्लाया।

मैं लुढ़ककर अंदर। दरवाज़ा बंद। रीना ने गाड़ी पीछे धकेली, फिर तेज़ मोड़।

ऊपर होम की दूसरी मंज़िल पर रोशनी जली। किसी ने खिड़की खोली, लाठी जैसी कोई चीज़ नीचे झाँकी।

"सीधी मत ले," मैंने कहा। "पीछे वाली गली।"

"वहाँ बंद है।"

"दीवार है। हटा देंगे।"

रीना ने गाड़ी उलटी गली में घुसाई। पीछे से हेडलाइट की रोशनी दीवार पर पड़ी — सफ़ेद जीप। हमारी गली से निकल रही थी।

रीना ने गाड़ी रोक दी।

"बंद कर दे," मैंने कहा।

"क्यों?"

"उन्हें लगे हम आगे निकल गए। बंद गाड़ी वे नहीं देखते।"

उसने इंजन बंद कर दिया। अंधेरा। दोनों साँस रोककर बैठे रहे। जीप की रोशनी हमारी गाड़ी के ऊपर से गुज़री — रुकी नहीं। दूर गई, फिर मोड़ पर गायब।

रीना ने साँस छोड़ी।

"तू ठीक है?"

"घुटना।"

"हथेली?"

"वही पुरानी चोट।"

वो कुछ नहीं बोली। गाड़ी फिर चलाई, बमुश्किल दस कदम। फिर रोक दी।

"मन्नू।"

"हूँ।"

"सामने बंसी की दुकान है। शटर टूटा पड़ा है।"

मैंने खिड़की से देखा। चाय के बर्तन बिखरे थे। बंसी की खटिया उलटी पड़ी थी। और बंसी ख़ुद — ज़मीन पर बैठा, दीवार से टिका, बायाँ हाथ सीने से लगाए।

मैं भागा। थैला छोड़ गया गाड़ी में।

"बंसी!"

"अरे, आ गया," वो हँसा। हँसी में दर्द था। "देख, मेरी दुकान की हालत।"

"हाथ?"

"टूटा है। ऐसा लग रहा है।" उसने दाहिने हाथ से इशारा किया। "पर सुन। भवानी के दो आदमी आए थे। दो। एक पतला, एक मोटा।"

"क्या पूछा?"

"पूछा — मन्नू कहाँ है। मैंने कहा — क्या पता, मेरा तो चाय का खोखा है, उसका दफ़्तर नहीं।" बंसी फिर हँसा। "फिर उन्होंने मेरी चाय माँगी।"

"तूने दी?"

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