The Token System – Chapter 764
मैंने टोकन को जेब में महसूस किया। गरम था।
"उन्होंने कोई चीज़ दी?"
सुमन ने एक नोट थमाया। "पहले पेज के नीचे वाला पता।"
नोट पढ़ा — 'पीछे वाला कमरा। तीसरी दीवार। बिजली का मीटर। नीचे दीवार ढीली है।'
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "तू कहता है कि पूरा रास्ता पता है?"
"टूटे फाटक से खड़े होने तक। अंदर का पता तुझे शेखर ने दिया।"
दायाँ मोड़ काटा। गाड़ी टूटे फाटक से बाहर है, अंदर नहीं जा सकती। रघुवीर, बंसी और मैं उतरे।
"मैं पहरेदार को देखकर आता हूँ," बंसी ने कहा। "तुम दोनों फाटक के पीछे रुको।"
वो सड़क के किनारे, गोदाम के आड़ में खड़ा हो गया।
मैंने सुमन को देखा। वो अपनी गाड़ी में बैठकर इंतज़ार कर रही थी। मैंने उसकी तरफ़ इशारा किया।
बंसी लौटा। "दो आदमी हैं। एक पीछे गेट पर, एक सीढ़ियों के नीचे। अंदर जाने का रास्ता खुला है। कूड़े के डिब्बे के पीछे वो टूटा फाटक है।"
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं पहले जाऊँगा। अंदर मेरी जान-पहचान है।"
"क्या?"
"उन दोनों में से एक को मैं जानता हूँ — बबलू। मेरे पापा के लिए काम करता था। मुझे देखकर वो नहीं रोकेगा।"
वो आगे बढ़ गया। मैं जेब में हाथ डालकर पीछे-पीछे चला।
टूटे फाटक के पास तक किसी ने नहीं रोका। कूड़े के डिब्बे की गंध से सिर भारी। बंसी का हाथ मेरे कंधे पर आया।
"रुक," उसने फुसफुसाया। "सीढ़ी के पास रोशनी है। उसके सामने साए बनते हैं। मैं पहले देखता हूँ।"
वो सरककर गया। मैंने सुमन को इशारा दिया — गाड़ी में रुको।
तभी रघुवीर मेरी तरफ़ लौटा। "अंदर आ जाओ। बबलू मिला। उसने कहा — तीन आदमी हैं अंदर। भवानी, उसका मुंशी, और एक सफ़ेद कोट वाला जो अभी गया।"
"शेखर कहाँ है?"
"भवानी ने उन्हें गाड़ी में बैठाकर भेज दिया। कह रहा है — काग़ज़ ले जा, अपनी बेटी की शादी कर।"
मेरे मन में बात आई — भवानी ने शेखर को बाहर भेजकर खुद को अकेला किया है। ये अच्छा नहीं।
मैं अंदर घुसा। पीछे का दरवाज़ा पुराना था, नीचे लोहे की छड़ें सीढ़ियों की तरफ़ जाती थीं। रोशनी नीली थी, बल्ब टिमटिमा रहा था। मैंने शेखर के नोट वाली दीवार पहचानी — बिजली का मीटर, उसके नीचे अलग रंग की एक ईंट।
मैंने उँगली से ईंट हिलाई। ढीली थी। खींची। अंदर काग़ज़ की गठरी। नहीं, फाइल नहीं — काग़ज़ के चार छोटे पन्ने, रस्सी से बँधे।
मैंने खोले। पहला पन्ना — लोहे की तिजोरी वाला कमरा, तीसरी दीवार, नीचे की दराज़।
दूसरा पन्ना — भवानी की लिखाई — "भैया को हफ़्ते में भुगतान। भैया, आठ अगस्त।"
तीसरा पन्ना — चार लाइनें मेरी पहचान! मैंने पलटकर रघुवीर से कहा, "ये मेरे पापा की लिखाई है।"
"क्या लिखा है?"
"पढ़ रहा हूँ।"
चौथा पन्ना — कोरा। बस नीचे एक लकीर और कोना-चिह्न।
मैंने चारों पन्ने रघुवीर को दिए। "फौरन सुमन के पास ले जा। उसकी गाड़ी में रख। मुझे तुम्हारा लिफ़ाफ़ा चाहिए — हवेली वाले काग़ज़ का सही नाम।"
रघुवीर ने सिर हिलाया और पीछे भागा। बंसी मेरे पास आ गया।
"अब?"
"अब तिजोरी।"
"मैं तेरे साथ।"
दोनों ऊपर की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। तीसरी मंज़िल। छोटा कमरा।
मैंने दरवाज़ा धकेला। खुला था — शेखर ने बंद नहीं किया।
अंदर लालटेन जल रही थी। भवानी मेज़ पर बैठा था। उसके सामने रजिस्टर खुला था और हाथ में काग़ज़। वो मुड़ा और बिना चौंके बोला — "आ जा, मनोहर। तेरी ही बाट देख रहा था।"
मैंने क़दम रोका।
"कैसे जाना कि मैं आऊँगा?"
"पता था। शेखर की दराज़ से तेरे पापा की लिखाई निकली थी। जब किसी के पास सच का एक टुकड़ा होता है, तो वो रात नहीं सोता। और तू तो मेरा ही खून है — तू नहीं सोएगा।"
उसने काग़ज़ उठाया। "ये मेरी बही का पन्ना है। तुम्हारे पापा ने लिखा था, पर नाम मैंने भरा। इसमें तेरी बहन की शादी, तेरी नौकरी, तेरी माँ का इलाज — सब दुबारा भरा जा सकता है। सिर्फ़ एक हस्ताक्षर चाहिए।"
"किस पर?"
"इस पर कि टोकन तुम मेरे हाथ में दोगे।"
कमरे में सन्नाटा। बंसी ने मेरा हाथ दबाया।
"टोकन तो ख़त्म हो गया," मैंने कहा।
"झूठ। टोकन ख़त्म नहीं होता। टोकन सिर्फ़ वक़्त बदलता है। तेरे पास है। मेरे पास भी था। मेरा भी वक़्त था — अब तू ऊपर है।"
उसने मेज़ पर रखा काग़ज़ आगे सरकाया। "ले।"
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैंने काग़ज़ उठाया। पढ़ा।
"ये मेरे पापा का काग़ज़ नहीं है।"
भवानी का चेहरा हिला। "क्या?"
मैंने उसे उलटा करके दिखाया। "मेरे पापा अपना नुक़्ता नीचे लगाते थे। इसमें ऊपर लगा है। ये काग़ज़ बना हुआ है। मेरे पापा ने कभी ये नहीं लिखा।"
भवानी की आँखें फैल गईं।
मैंने काग़ज़ मेज़ पर पटक दिया। "किसने बनाया? तुम्हारा मुंशी?"
वो नहीं बोला।
"और मुझे पता है," मैंने कहा, "ये काम तुम्हारा नहीं है। तुम्हारे पास तो सिर्फ़ डर है। असली काग़ज़ बनाने वाला कोई और है — वही जिसने तुम्हें काग़ज़ दिखाकर तुम्हारे हाथ कँपा दिए।"
भवानी उठा। "मेरे घर में आकर मेरी बातें…"
"तेरे घर में नहीं," मैंने कहा। "अदालत के कब्ज़े में।"
वो मेरी तरफ़ बढ़ा। बंसी बीच में आ गया।
"रुक, ठाकुर साब। एक बात सुन लो। जो काग़ज़ तुमने गाड़ी से उठाया था, उसपर बापू का नाम लिखा है। और बापू का नाम आते ही तुम्हारे हाथ काँपे। इसका मतलब — तुम बापू से डरते हो। तो तुम मेरे दोस्त को क्या डराओगे? तुम ख़ुद डरे हुए हो।"
भवानी ने बंसी को घूरा। फिर वो धीरे से हँसा और अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
"बंसी, तू सही कहता है। आज रात बापू ने मुझे लिखा। दो लाइनें। और मैं तेरी क़सम खाऊँ, मैं समझ नहीं पाया कि वो क्या कहना चाहता है।"
वो उठा, तिजोरी की तरफ़ गया। मैंने सोचा कि शायद वो कुछ और निकालेगा। उसने तिजोरी नहीं खोली। उसने मेज़ का नीचे वाला दराज़ खोला। उसमें से एक पीली पर्ची निकाली और मेरी तरफ़ फेंकी।
पर्ची मेरे पैरों के पास गिरी। मैंने उठाई।
पढ़ा — "तीसरे का हिसाब आज रात होगा। भवानी, तू बैठा रह। तेरा नंबर बाद में।"
मैंने पर्ची भवानी को दिखाई। "ये आज की है।"
"आज शाम की।"
"फिर?"
"फिर मेरे तीन आदमी होम के चारों तरफ़ घूम रहे हैं। मेरे पास हथियार है। पर मैं नहीं जानता कि बापू अंदर आएगा या बाहर से खेलेगा।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने सिर हिलाया। "मुझे पता है — वो काग़ज़ बाहर से आया था। होम के पिछले फाटक से।"
"तुमने देखा?"
"बबलू ने देखा। उसने कहा — सफ़ेद कोट वाला आदमी आया था।"
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। "तेरा आदमी?"
भवानी चुप।
"तेरा सफ़ेद कोट वाला आदमी आज रात तेरे ही होम के पिछले फाटक से आया। और तुझे नहीं पता कि उसने किसके लिए किया। सोच — तेरे होम में तेरे ही आदमी तेरे ख़िलाफ़ चल रहे हैं।"
भवानी मेज़ पर हथेली मारकर खड़ा हुआ। "तू मेरे आदमियों को…"
"मैं तुझे तेरा घर दिखा रहा हूँ।"
वो चुप हो गया।
बंसी ने मेरी तरफ़ आँख से इशारा किया। मैं समझ गया — ये हमारा मौक़ा है।
मैंने आवाज़ धीमी रखी। "भवानी, मुझे तेरी तिजोरी नहीं चाहिए। मुझे ख़ुद अपनी तिजोरी मिल गई है।"
"क्या?"
"तेरे ही घर से।"
उसका चेहरा फीका पड़ा। मैंने जेब से चाबी निकाली और उसके सामने थाम ली।
"तीसरी चाबी। तेरी दीवार से। तेरे तिजोरी के दूसरे ताले की। तेरा भैया जानता है।"
भवानी ने उस चाबी को देखा और उसकी आँखों में वो डर आया जो उस रात उसके हाथ में था।
"मेरा भैया मेरे ही…" वो कुर्सी पर गिरा।
वो कोई कहानी सुनाने वाला नहीं था। वो अब ढहता हुआ आदमी था।
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