The Token System – Chapter 765
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "आओ, यहाँ से चलें।"
बंसी ने सीढ़ियों की तरफ़ रुख किया। रघुवीर नीचे खड़ा था।
"बाहर," मैंने कहा। "गाड़ी तक।"
बाहर आए। सुमन की गाड़ी सड़क किनारे खड़ी थी। रघुवीर के हाथ में काग़ज़ थे। मैंने उसे सुमन को देने को कहा। वो बढ़ा।
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। बहुत गरम।
मैंने रघुवीर की तरफ़ देखा। "रुक!"
वो रुका। "क्या?"
मैंने उसके हाथ से काग़ज़ लिया। कम रोशनी में पढ़ा। चार पन्ने। तीसरे पन्ने पर पापा की लिखाई — "मेरा बेटा, तेरे हाथ में अब मेरा हिसाब है। बंकिम को मत ढूँढना। वो ज़िंदा है।"
मैं रुक गया।
रघुवीर ने मेरे हाथ को थामा। "क्या?"
"तू जानता है बंकिम कौन है?"
रघुवीर चुप हो गया। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"बंकिम," रघुवीर ने धीरे से कहा। "मेरे पापा का दोस्त। हवेली का माली। मेरे पापा इसे भाई बोलते थे।"
"और उसे ज़िंदा होने की बात?"
"मेरे पापा ने एक बार कहा था — बंकिम मरा नहीं है। वो समंदर के उस पार है। उसने यही हवेली की दीवार में लिखा था, उस रात।"
मैंने टोकन जेब में हाथ से दबाया। "चल, गाड़ी में चल।"
गाड़ी में बैठे। मैंने सुमन को काग़ज़ दिए।
"ये फ़ाइल की कॉपी," वो बोली। "इससे हम जान जाएँगे — भवानी की मौत का असली हिसाब किसने लिखा, किसने छिपाया।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "अब बापू।"
"अभी?"
"अभी। मस्जिद के पीछे का घर।"
बंसी ने गाड़ी रोकी। "मन्नू, सोच ले। बापू का घर है। वो जानता है हम आ रहे हैं। जो आदमी तीन दिन की मोहलत देकर काग़ज़ भेजता है, वो अपने घर में ताला नहीं लगाएगा?"
"तो?"
"तो वहाँ जाल बिछा है।"
मैंने टोकन निकाला। हथेली पर रखा। ठंडा था।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "टोकन चुप है। मतलब अभी मत जाओ।"
बंसी ने गाड़ी आगे बढ़ाई।
"तो? घर?"
"घर।"
रात करीब साढ़े ग्यारह बजे हमारी गली में घुसे। घर के दरवाज़े पर रोशनी नहीं। मैंने किवाड़ खोला। माँ चूल्हे के पास बैठी थी। हाथ में रोटी थी। उसने मेरी शक्ल देखी और इस बार कुछ नहीं पूछा। वो उठी, मेरे हाथ में रोटी रखी, और फिर झटके से बोली — "अभी नहीं। एक घंटा।"
"क्यों?"
"मैंने देखा है। तेरे जाने के बाद गली के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। भवानी की नहीं। उसपर निशान नहीं। वो हर आधे घंटे में फिरती है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "बापू का आदमी। तेरे घर के पीछे।"
मैंने रोटी खाई और दीवार से टेक लगाकर बैठ गया। बंसी मेरे पास बैठा।
"मन्नू, अगर बापू के घर जाल है, तो हमें आगे रघुवीर को भेजना होगा। उसे कोई नहीं जानता। वो बाहर से आया है। उसने कभी भवानी के आदमी के साथ काम नहीं किया।"
"मुझे किसी और के पीछे छिपने की आदत नहीं।"
"ये छिपना नहीं। ये होश है।"
माँ ने बीच में आकर कहा, "एक बात मान।"
"क्या?"
"अभी मत जा। सवेरा होने दो।"
"माँ, कल तक सब बदल जाएगा।"
"तो कल तक रुक।"
मैं उठा। "मैं जाऊँगा। पर एक बात — तू किसी को फ़ोन मत करना। रीना को भी नहीं।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और फिर चूल्हे की तरफ़ मुड़ गई।
बंसी ने कहा, "मैं रघुवीर को लेकर आता हूँ। पंद्रह मिनट।"
वो निकला। मैंने टोकन जेब में दबाया। फिर मेरी नज़र घर के पीछे वाले कमरे की तरफ़ गई। पापा का कमरा। वहाँ एक ताला था। माँ ने कभी नहीं खोला।
मैंने कमरे की तरफ़ क़दम बढ़ाया। दरवाज़ा धकेला। नहीं खुला।
"माँ, चाबी?"
"ताले में है।"
मैंने चाबी घुमाई। अंदर अँधेरा। मैंने टॉर्च जलाई।
कमरे में एक पलंग, एक मेज़, और एक पुरानी तिजोरी। तिजोरी छोटी थी। मैंने उसे खोला।
अंदर सिर्फ़ एक लिफ़ाफ़ा और एक छोटी पीतल की डिबिया। लिफ़ाफ़े पर पापा की लिखाई — "मन्नू के लिए। जब हिसाब शुरू हो।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसके नीचे एक और लिफ़ाफ़ा था, बंद। उस पर सिर्फ़ एक लाइन — "इधर मत देखना।"
मैंने पहला खोला। अंदर काग़ज़ था। पढ़ा — "बंकिम होम की दूसरी मंज़िल के दफ़्तार में है। वो वहाँ रोता है। उसे मेरी क़सम, तू बचाना।"
मैंने दूसरा लिफ़ाफ़ा उठाया। बंद था।
तभी बाहर गाड़ी की आवाज़ आई। मैंने लिफ़ाफ़े जेब में डाले और दरवाज़े पर आया। बंसी और रघुवीर आए।
"चल," बंसी ने कहा। "गाड़ी में आ।"
मैंने सुमन को भी बैठाया। गाड़ी चली। बंसी ने जगह बताई — मस्जिद के पीछे की तीसरी गली।
"वहाँ जाने से पहले," मैंने कहा, "एक बात। मेरे पापा का एक और काग़ज़ मिला है। उसमें लिखा है — बंकिम होम की दूसरी मंज़िल के दफ़्तार में है।"
"बंकिम?" रघुवीर ने कहा। "वो तो मेरे पापा का दोस्त था।"
"वो ज़िंदा है।"
रघुवीर का चेहरा बदला।
बंसी ने गाड़ी को गली के मोड़ पर रोका। "अब यहाँ से पैदल। गली में गाड़ी से जाना ख़तरनाक है।"
हम उतरे।
रास्ता पतला था। दोनों तरफ़ ऊँची दीवारें। ऊपर आसमान। मैंने पीछे देखा। कोई नहीं।
बंसी ने रघुवीर की तरफ़ देखा। "तू पहले। सिर्फ़ देखकर आ।"
वो गया। पाँच मिनट में लौटा।
"घर खुला है। झाड़ू का सामान बाहर रखा है। अंदर रोशनी नहीं।"
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। गरम हो रहा था।
"ठंडा नहीं? तो ये क्या?"
रघुवीर ने कहा, "शायद अंदर कुछ है।"
बंसी ने कहा, "या कोई है।"
हम बढ़े।
दरवाज़ा खुला था। भीतर घुसे। अंधेरा। मैंने टॉर्च जलाई। मेज़ पर कुछ रखा था — एक लकड़ी का डिब्बा।
डिब्बे पर कोना-चिह्न। बंद था।
मैंने खोला। अंदर एक पुराना टोकन। उल्टा। पीतल का। ठंडा।
उसके नीचे एक पर्ची थी — "हिसाब वापस लेने का वक़्त आ गया। जिसने खोला, उसने अपना हिसाब खोल दिया। — तीसरा।"
मैंने टोकन उठाया। उल्टा टोकन।
तभी रघुवीर ने कहा, "मन्नू, बाहर रोशनी।"
मैं भागा दरवाज़े तक।
उस सफ़ेद गाड़ी के सामने… एक औरत खड़ी थी। हाथ में कुछ लिया हुआ। वो गाड़ी की तरफ़ बढ़ रही थी।
मैंने रघुवीर को दबाया। "कौन है?"
बंसी ने धीरे से कहा, "तेरे घर की तरफ़ जा रही है।"
मैंने टोकन हाथ में लिया। गरम था।
फिर मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "गाड़ी की चाबी दे।"
वो मुझे देखने लगा। "तू पागल है।"
"दे।"
उसने दी।
मैं भागा गली से बाहर। सड़क पर। गाड़ी की तरफ़।
औरत गाड़ी के पास खड़ी थी — चेहरा ढका। उसने गाड़ी के दरवाज़े पर हाथ रखा तो मैंने पीछे से आवाज़ दी—— "रुक!"
वो मुड़ी।
मैंने गाड़ी की रोशनी डाली। सफ़ेद कुर्ता। सिर पर गमछा। हाथ में छोटा बैग। उसने बैग मेरी तरफ़ फेंका और भागी। मैंने बैग लिया। छोटा था, पीला।
अंदर एक काग़ज़। मेरी फ़ोटो। और नीचे एक लाइन — "जहाँ तेरी शर्ट बदली है, वहाँ तेरा हिसाब है।"
मैं खड़ा रहा।
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "क्या है?"
मैंने काग़ज़ उसे दिया। "कुछ नहीं। मैं जानता हूँ ये जगह।"
टोकन जेब में ठंडा हो गया।
रघुवीर ने सुमन को फोन किया। सुमन ने कहा — "मैं होम के पास हूँ। भवानी की गाड़ी से शेखर बाबू लौट आए हैं। उनके हाथ में नोटों का बंडल है।"
मैंने सुमन को कहा, "शेखर बाबू को कहना — अब नहीं, सुबह छह बजे टोकन के नीचे वाला काग़ज़ लेकर अस्पताल के पिछले फाटक पर आए।"
"क्या है?"
"पापा का पहला काग़ज़। जिसमें लिखा है — बंकिम ज़िंदा है।"
सुमन चुप हुई। फिर बोली, "और वो काली बैग?"
"काग़ज़ है। एक पीली फोटो। मैं पढ़ता हूँ।"
मैंने बंसी से कहा — "आज रात तीन जगह।" बंसी ने गिने — "एक, तेरा घर। दो, भवानी का होम। तीन, बापू का घर।"
"तीन जगह खुल गईं," मैंने कहा। "तीन दिन, तीन जगह।"
टोकन जेब में बहुत धीरे से हिला, जैसे सिर्फ़ इतना कह रहा हो — "नाम।"
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