The Token System760 / 1154

The Token System – Chapter 760

7 min read November 6, 2026

वो उठ खड़े हुए। फिर अचानक मेरे पैरों की तरफ़ झुके। मैंने झटके से उन्हें रोका, पर वो नीचे ही रहे।

"शेखर बाबू, ये क्या—"

"मन्नू, मैं गवाही दूँगा। तेरे साथ। जो रजिस्टर मैंने छिपाए, जो भवानी के लिए चार साल में लिखे, सब दूँगा। पर पहले मेरी बेटी की शादी हो जाए।"

"बाबू, उठिए—"

वो नहीं उठे।

"तू वादा कर।" उनकी आवाज़ फूट पड़ी। "वरना, मन्नू, मैं तेरे पास ये सब बातें लेकर आया हूँ इसलिए कि मुझे लगा तू कुछ कर सकता है। पर अगर तू वादा नहीं देता, तो मैं यहीं से उठकर सीधा भवानी के पास जाऊँगा। रजिस्टर समेत। सब कुछ लेकर। और उससे कहूँगा कि मुझे बचा ले, बदले में मैं मन्नू के ख़िलाफ़ गवाही दूँगा।"

मैंने उनका कंधा पकड़कर उठाया। उनका चेहरा देखा — वो डर रहे थे, पर झूठ नहीं बोल रहे थे।

"शेखर बाबू, मैं वादा करता हूँ। आपकी बेटी की शादी होगी। और उसमें कोई भवानी की परछाईं नहीं पड़ेगी। पर मुझे आपसे एक बात पूछनी है।"

"पूछ।"

"टोकन। आप जानते हैं उसके बारे में। कितना जानते हैं?"

उन्होंने चश्मा लगाया और मेरी तरफ़ देखा। पहली बार उनकी आँखों में कुछ और था — शर्म।

"जितना एक मुंशी को जानना चाहिए। न ज़्यादा, न कम।"

तभी उनकी जेब से फोन बजा। उन्होंने स्क्रीन देखी और चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"भवानी का आदमी है।"

"उठाइए।"

उन्होंने फोन कान पर रखा। उस तरफ़ से आवाज़ आई — "शेखर बाबू, बेटी की शादी की तारीख़ टल गई है। अगले महीने की नौ की जगह, जब ठाकुर साहब कहेंगे। तैयार रहिए।"

लाइन कट गई।

शेखर बाबू ने फोन मेज़ पर रखा। उनके हाथ काँप रहे थे। "देखा, मन्नू? ये लोग तारीख़ भी अपनी जेब में रखते हैं। मेरी बेटी की शादी मेरी नहीं, इनकी है।"

मैंने टोकन जेब से निकाला। उस पर दो लकीरें थीं, और दोनों के बीच एक छोटी सी नई लकीर अभी उभर रही थी — जैसे कोई धीरे से पेंसिल चला रहा हो। मैंने उसे मुट्ठी में दबाया।

"शेखर बाबू," मैंने कहा, "आपने अभी कहा कि आप गवाही देंगे। तो सुनिए — आपकी बेटी की शादी अगले महीने होगी, तारीख़ वही नौ। और उससे पहले भवानी की तारीख़ ख़त्म हो जाएगी।"

"कैसे?"

"पहले ये बताइए — भवानी के पास जो रजिस्टर है, जिसमें उसने अपने हिसाब की एंट्रियाँ लिखीं, वो कहाँ रखा है?"

शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर खिड़की की तरफ़। और फिर बहुत धीरे बोले, "मैं तुम्हें वो जगह बता दूँगा। पर एक शर्त है।"

"कहिए।"

"उस जगह पर पहुँचकर तू मुझे वहाँ से पहले निकाल देगा। मैं भवानी का सामना नहीं कर सकता, मन्नू। मैं चार साल उसके सामने झुका रहा, अब सीधा खड़ा नहीं हो सकता।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। "ठीक है। अब बताइए।"

उन्होंने मेरे कान के पास मुँह लाकर कहा — जगह का नाम, दीवार, और वो कोड जो सिर्फ़ चार आदमी जानते हैं। और फिर पीछे हटकर बोले, "और मन्नू, एक बात और। जो तीसरा आदमी है — वो तेरे पीछे पड़ा है। उसने मुझे कल रात फोन पर कहा था — 'शेखर, तू मन्नू के साथ खड़ा है, तो तेरी बेटी को मेरी याद आएगी।' उसकी आवाज़ भवानी जैसी थी, पर भवानी नहीं थी। मैं उसे पहचानता हूँ, मन्नू। और वो तेरे घर के बाहर से फोन कर रहा था।"

मैं रुका नहीं। अस्पताल के गलियारे से सीधा बाहर निकला और बाइक पे बैठ गया। शेखर बाबू पीछे बैठे, उनके हाथ मेरे कंधे पे थे और काँप रहे थे। मैंने बाइक दौड़ाई। शहर के बीच से नहीं, पीछे के रास्ते से — जहाँ रात को सिर्फ़ कुत्ते भौंकते हैं।

रास्ते में शेखर बाबू ने कुछ नहीं कहा। बस एक बार बोले, "दाएँ मुड़।" फिर "रुक।"

हम एक पुरानी कोठी के पीछे रुके। दीवार पे तीन सूखे पेड़ थे और चौथे की जगह सिर्फ़ ठूँठ। शेखर बाबू ने ठूँठ की तरफ़ उँगली दिखाई। "उसके नीचे। कोड उसी दिन का है जिस दिन भवानी ने पहली एंट्री लिखी थी। पैंतीस साल पुराना।"

"आप बाहर रुकिए। मैं अंदर जाता हूँ।"

"मन्नू—"

"आपने शर्त रखी थी। मैं निभा रहा हूँ।"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, फिर छोड़ दिया। मैं ठूँठ के पास गया। मिट्टी हटाई तो एक लोहे का ढक्कन मिला। कोड डाला। अंदर सीढ़ियाँ थीं, जो नीचे को जाती थीं। मैंने टॉर्च ऑन की और उतर गया।

नीचे एक छोटा कमरा था। दीवार पे तीन रैक। हर रैक पे रजिस्टर — मोटे, भूरे, किनारों से फटे। मैंने एक खोला। पन्नों पे तारीख़ें, नाम, रकम। किसी को ज़मीन दिलाई, किसी का रिश्ता तुड़वाया, किसी का केस बनवाया — सब हिसाब। भवानी का असली दिमाग़ यही था।

तीसरे रैक के पीछे एक अलमारी थी। उसमें एक ही फाइल थी, और उस पर लिखा था — "तीसरा।"

मैंने खोली। अंदर तस्वीरें थीं। एक आदमी की, जिसका चेहरा आधा कटा था। नीचे एक लाइन लिखी थी — "जो मेरे नाम से डराता है, उसका नाम मेरे पास है।"

तभी ऊपर से आवाज़ आई। बाइक का हॉर्न। दो बार।

मैंने फाइल जैकेट में डाली और सीढ़ियाँ चढ़ा। बाहर निकला तो देखा — शेखर बाबू ज़मीन पे बैठे थे और उनका चश्मा टूटा पड़ा था। सामने एक काली गाड़ी खड़ी थी। उसमें से कोई नहीं उतरा। बस खिड़की खुली और एक आवाज़ आई — भवानी की आवाज़। "मन्नू, रजिस्टर छोड़ दे। मैं तेरी बहन का स्कूल बंद करवा दूँगा।"

मैं हँसा। ज़ोर से। "भवानी भाई, आप आजकल बहन के पीछे पड़ गए हो? पहले रीना का स्कूल, अब बहन का स्कूल। कुछ नया सोचो।"

गाड़ी की खिड़की बंद हुई और गाड़ी चली गई। शेखर बाबू की तरफ़ देखा। "कब से बैठे हैं?"

"उसने मेरा चश्मा गिरा दिया।"

"अब कुछ नहीं होगा। उठिए।" मैंने उन्हें उठाया। "शेखर बाबू, अब आप घर जाइए। मुझे तीन दिन दीजिए।"

"तीन दिन?"

"आपकी बेटी की शादी नौ तारीख़ को होगी। उससे पहले मैं ये फाइल खोलूँगा।"

वो गए। मैं सीधा बंसी की दुकान पे पहुँचा। रात के दो बज रहे थे। बंसी दुकान के अंदर चारपाई पे लेटा था, पर आँखें खुली थीं। मुझे देखकर बैठ गया। "क्या हुआ?"

मैंने फाइल मेज़ पे रखी। "बंसी, भवानी के रजिस्टर मिल गए। तीन रैक। हिसाब-किताब का पूरा बंदोबस्त। पर एक फाइल अलग थी। 'तीसरा' लिखा था उस पर।"

बंसी ने फाइल उठाई। खोली। तस्वीर देखी। और उसका चेहरा बदल गया।

"अरे—"

"क्या?"

"ये तो…" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये तो टोकन वाला आदमी है, मन्नू। जिसने टोकन बनाए थे। मैंने इसे एक बार भवानी के साथ देखा था। पुराना बुज़ुर्ग है, पर अब भी चलता-फिरता है।"

"नाम?"

"नाम नहीं पता। बस इतना पता है कि भवानी उसे 'बापू' कहता है।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "बापू?"

"हाँ। और मन्नू—" बंसी ने पन्ना पलटा। "ये देख। यहाँ लिखा है — 'टोकन का असली मालिक। जो टोकन पकड़े, उसकी जान मेरे हाथ में।'"

मैं कुर्सी पे बैठ गया। मेरी जेब में टोकन था। गरम हो रहा था, धीरे-धीरे, जैसे कोई उसे अंदर से सुलगा रहा हो।

तभी दरवाज़े पे दस्तक हुई। बंसी ने दरवाज़ा खोला। बाहर शेखर बाबू खड़े थे। पर अब वो डरे हुए नहीं थे — टूटे हुए थे। उनकी आँखें लाल थीं और होंठ सूखे।

"शेखर बाबू? आप अभी गए थे—"

वो अंदर आए। मेज़ तक आए। और अचानक मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गए। मैंने उन्हें रोका, पर वो पैर पकड़कर बैठ गए।

"मन्नू, तेरी बहन का कुछ नहीं होगा। मैं जानता हूँ भवानी का आदमी उसके पीछे नहीं लगेगा — मैंने उससे कहलवा दिया। पर मेरी बेटी—"

"आपने क्या किया?"

वो रोने लगे। "भवानी ने मुझे फोन किया। कहा कि अगर मैं तेरे साथ हूँ, तो बेटी की शादी नहीं होगी। मैंने कह दिया कि मैं तेरे साथ नहीं हूँ। अब मैं फँस गया हूँ।"

मैंने उन्हें उठाया। "तो अब क्या चाहते हो?"

वो मेरे पैरों पे झुक गए फिर से।

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