The Token System759 / 1154

The Token System – Chapter 759

7 min read November 6, 2026

मैंने बही को माँ के हाथ से लिया और उसी पन्ने पर उँगली रखी। स्याही पीली पड़ चुकी थी, पर दो नाम साफ़ दिख रहे थे। एक था रामदीन का, दूसरा रामदीन के पिता का। और उसके नीचे जो लिखा था, वो पढ़कर मेरा कलेजा धक से रह गया।

"कौशल्या को जिसने ज़बरदस्ती चुप कराया, उसका हिस्सा नहीं।"

माँ ने अपनी माँ का नाम पढ़ा और आँख फेर ली।

तभी जेब में फोन बजा। भवानी का नाम नहीं दिख रहा था, बस आठ अंकों का कोई नंबर।

"मन्नू," आवाज़ भवानी की थी, पर पहले से धीमी, "सुन। तेरी बहन का स्कूल मेरे शहर में है। मैंने कह दिया है — आज जब वो स्कूल से निकले, कोई उसके पीछे नहीं जाएगा। बस तू एक काम कर — वो पीतल की पट्टिका उठाकर सीधे थाने ले जा। और हिसाब तो हिसाब है, मन्नू। हिसाब जीत नहीं सकता, वो बस लिखा जाता है।"

मेरे मुँह से निकला, "रीना से दूर हट भवानी—"

पर मेरी बात कट गई। दूसरी तरफ़ से रीना की आवाज़ आई, तेज़ और साफ़।

"भैया, फोन मैंने छीन लिया। मैं स्कूल के दरवाज़े पर खड़ी हूँ, ठीक हूँ। कोई आदमी नहीं है यहाँ। ये बस डरा रहा है।"

फिर भवानी की आवाज़ दूर से आई — "रीना, फोन दे—" और लाइन कट गई।

मैंने हवेली का फाटक खोला और भागा। बंसी पीछे पीछे आ रहा था। "मन्नू, रुक, गाड़ी—"

"तू आ, मैं जा रहा हूँ।"

पर बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी। "ऐसे भागेगा तो भवानी के आदमी रास्ते में पकड़ लेंगे। सुन।" उसने जेब से चाबी निकाली। "पीछे वाली गली से नीली कार खड़ी है। बीवी के मायके से आई है। तू उससे रीना को ले आ। मैं दुकान पर मिलूँगा।"

नीली कार चलाते वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे। रास्ते में सोच रहा था — भवानी ने स्कूल का नाम क्यों लिया, अगर उसे वहाँ कोई आदमी भेजना ही था? मुझे क्या, मैं बस गाड़ी दबाए जा रहा था।

स्कूल के गेट पर रीना अकेली खड़ी थी, हाथ में फोन। उसने गाड़ी देखी और दौड़ी आई। दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठी और पहला काम किया — मेरे गाल पर हल्की चपत।

"ये पहली बात। दूसरी — तू मुझे कुछ नहीं बताता।"

"अंदर बैठ, गाड़ी में बताता हूँ।"

"गाड़ी में कुछ नहीं बताना। बंसी भैया की दुकान चल। वहाँ बैठकर बात होगी।"

बंसी की दुकान का शटर आधा टूटा पड़ा था। मैंने गाड़ी रोकी तो देखा — बंसी एक खटिये पर बैठा था, बायाँ हाथ लत्ते में बँधा, और हँस रहा था। हँसते हुए दर्द से कहकर उठ रहा था।

"क्या हुआ तेरे हाथ को?" मैंने पूछा।

"सुबह तेरे जाने के बाद भवानी के दो आदमी आए। कहने लगे — मन्नू को कह देना, रीना का स्कूल छोड़ने का मन कर रहा है। मैंने कहा — भाई, ये तो स्कूल है, मेरा थोड़े है। तो एक ने शटर उठाया, मैंने हाथ बीच में डाल दिया। बस, इतनी सी बात।"

रीना ने उसकी पट्टी देखी। "बंसी भैया, आप चुप क्यों बैठे थे? फोन कर देते।"

"कर देता," बंसी ने हँसकर कहा, "पर तेरे भैया का फोन मैंने खुद बंद कर रखा था, ताकि भवानी के आदमी उसकी घंटी सुनकर न भड़कें।"

मैं खटिये के पास बैठ गया। "रीना, सुन। भवानी ने फोन पर बोला कि स्कूल में उसके आदमी हैं। पर वहाँ कोई नहीं था — सिर्फ़ आवाज़ बदलकर डराया जा रहा था। यानी उसने भी कुछ नहीं किया, बस मुझे भगाना चाहता था, ताकि मैं हवेली से उठ जाऊँ।"

रीना ने मेरे हाथ को उठाया, पट्टी पर उँगली रखी।

"ये कब की है?"

"परसों।"

"और ये?" उसने मेरी कलाई पर एक और खरोंच देखी, जो मुझे खुद याद नहीं थी कब लगी।

"कहीं लग गई होगी, रीना—"

"भैया।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैं पिछले कितने दिन से देख रही हूँ — घर में रात-रात भर लोग आते हैं, माँ चूल्हे पर बैठी रह जाती है, और तू सुबह जाता है तो कभी पैरों में चप्पल नहीं, कभी हाथ में पट्टी। मैं स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हूँ। बच्चे जब कुछ छिपाते हैं, तो उनके जूते की डोर ढीली रह जाती है। तेरे जूते की डोर आज फँसी हुई है। तू कुछ छिपा रहा है।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने आँखें नीची कर लीं।

"ज़मीन का झगड़ा है, रीना। हवेली वाली ज़मीन। वकील लगा रखा है—"

"झगड़े में हाथ क्यों फटता है?" रीना ने पूछा। "झगड़ा काग़ज़ में होता है, भैया। हाथ में तब आता है जब कोई मारने आए।"

मैं चुप हो गया।

रीना उठी और दुकान के पीछे वाले कमरे में चली गई। वहाँ से लोटा भर पानी लेकर आई, मेरे हाथ पर डाला, खुद पट्टी खोलने लगी।

"अब सुन," वो बोली, "तू मुझे शादी की बात करके टाल रहा है — कि पैसा जोड़ रहा हूँ, तेरी शादी कर दूँगा। मैंने आज तक इसका जवाब नहीं दिया। तो आज देती हूँ।"

मैंने सिर उठाया।

"मुझे शादी की जल्दी नहीं है, भैया। मुझे ये जल्दी है कि तू घर आए और बिना पट्टी के आए। माँ रोज़ चूल्हे के पास बैठी रहती है और तेरे आने की आवाज़ सुनती है। ये मुझे शादी से ज़्यादा ज़रूरी है।"

बंसी ने हँसते हुए कहा, "बहन जी, तेरे भैया को ग़लत आदमी से पाला पड़ गया है।"

"ग़लत आदमी ने ग़लत क्यों पाला?" रीना ने पूछा, और वो सवाल हवा में लटक गया।

मैंने पानी पिया। "रीना, मैं तुझे झूठ नहीं बोलूँगा। पर आज जो है, वो पूरा बताने का वक़्त नहीं है। दो दिन। दो दिन में सब तेरे सामने होगा। बस तू आज से कल स्कूल मत जा।"

"मैं स्कूल जाऊँगी," रीना ने कहा। "चुप बैठना मेरे बस का नहीं। और सुन — अगर तूने दो दिन का वक़्त माँगा है, तो मैं दे रही हूँ। पर दो दिन बाद अगर तूने फिर कुछ छिपाया, तो मैं ख़ुद उस भवानी के पास जाऊँगी और पूछूँगी कि मेरे भैया को किस बात पर मारा जा रहा है।"

"रीना—"

"बात ख़त्म।" उसने पट्टी बाँध दी और उठ गई। "मैं घर जा रही हूँ। माँ को आज मैं देख लूँगी।"

वो चली गई। बंसी ने उसके जाने के बाद कहा, "ये लड़की तेरे से ज़्यादा हिम्मत वाली है, मन्नू।"

"पता है," मैंने कहा। "इसीलिए डर लगता है।"

दो दिन बाद सुबह मैं अस्पताल में था। एक्स-रे कमरे में बैठकर फ़ाइलें खिसका रहा था, जब दरवाज़े पर खड़ी डॉक्टर सुमन ने कहा, "मन्नू, तेरे लिए कोई है। बाहर बरामदे में।"

मैंने सिर उठाया। शेखर बाबू थे। सफ़ेद कमीज़, हाथ में चश्मा, और चेहरा ऐसा जैसे तीन रात से सोए नहीं। वो बरामदे के कोने में खड़े थे, दीवार से सटे हुए।

"शेखर बाबू, आप—"

उसने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर गलियारे के दोनों तरफ़।

"मन्नू, अंदर चल। जल्दी।"

"ये तो एक्स-रे कमरा है, अंदर मरीज़—"

वो मेरा हाथ पकड़कर अंदर खींच लाए। दरवाज़ा बंद किया। कुर्सी पर बैठे ही नहीं — खड़े रहे।

"मेरी बेटी की शादी तय हो गई है।"

"बधाई, बाबू—"

"चुप।" उनकी आवाज़ काँप रही थी। "पिछले हफ़्ते लड़का देखने आया था, बात पक्की हो गई। तारीख़ भी रख ली — अगले महीने की नौ तारीख़। पर कल शाम मेरे घर कोई आया।"

"कौन?"

"पता नहीं। दरवाज़े पर लिफ़ाफ़ा रख गया।" उन्होंने जेब से कुछ निकाला — एक छोटा मुड़ा काग़ज़, जिस पर कोई नाम नहीं था, बस एक लाइन — "मन्नू से दूर रहेगा तो बेटी की शादी ठीक से होगी। वरना वो बात दोबारा याद दिलानी पड़ेगी जो तीन साल पहले भूल गई थी।"

मैंने काग़ज़ पढ़ा और उनकी तरफ़ देखा। "तीन साल पहले क्या हुआ था, शेखर बाबू?"

वो कुर्सी पर बैठ गए। चश्मा मेज़ पर रखा और उसे साफ़ करने लगे, बार-बार।

"तीन साल पहले मेरी बेटी का एक रिश्ता टूटा था। लड़का अच्छा था, पर उसके घर वालों को भवानी की तरफ़ से किसी ने कह दिया था कि शेखर बाबू का परिवार ठीक नहीं है। मेरी बेटी तीन महीने बीमार रही। उस दिन से मैंने भवानी के लिए कुछ नहीं किया, पर उसने भी नहीं छोड़ा।"

"तो अब क्या चाहते हैं?"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho