The Token System – Chapter 76
"तूने सुना?" बंसी ने कहा, अपनी ही आवाज़ पर हँसता हुआ। "वो साल — जब मैं तहसील में था। मैं तुझे कभी नहीं बताना चाहता था। मेरे पिता पर तहसील का कर्ज़ था — दो हज़ार। उस ज़माने में दो हज़ार मतलब आज के दो लाख। भवानी का बाप आया और उसने कहा कि दो काग़ज़ों पर दो नाम बदल दे, कर्ज़ माफ़। दो नाम बदले थे मैंने — पहला और आख़िरी। उसके बाद मैंने कलम उठाई नहीं। इसी दुकान पर बैठ गया।"
"कौन से दो नाम थे?" शेखर बाबू ने पूछा। उनकी आवाज़ सख़्त थी।
"मुझे नाम याद नहीं," बंसी ने कहा। "पर डर याद है। आज तक।"
"डर अब नहीं चलेगा," मैंने कहा।
"तू बेवकूफ़ है मन्नू," बंसी ने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में ठेठ झुंझलाहट थी। "तूने देखा नहीं, उसने कुर्सी खींची, बैठा, और हम सब खड़े रहे देखते?" फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और उसका चेहरा बदला। "पर तू खड़ा रहा। बैठा नहीं। यह भी कुछ है।"
"बही कहाँ रखेंगे?" शेखर बाबू ने कहा। "उसने कह दिया — अदालत। अदालत जाने से पहले काग़ज़ को ऐसी जगह रखना है जहाँ से कोई उठा न ले।"
"अस्पताल की लॉकर में," सुमन ने कहा। "शेखर बाबू की लॉकर। पर उस लॉकर की चाबी अभी शेखर बाबू के पास है, किसी और के पास नहीं।"
"मेरे पास एक और जगह है," बूढ़ी औरत ने कहा। उसकी गोद में बही थी, वह उसे छोड़ नहीं रही थी। "मैं इसे अपने पास रखूँगी। रात में। और सुबह अदालत के दरवाज़े पर। कोई मेरे हाथ से नहीं छीन सकता। मैं बूढ़ी हूँ, पर मेरी उँगलियाँ अभी टूटी नहीं हैं।"
"आप कहाँ रहेंगी रात भर?" मैंने पूछा।
"उसी हवेली में," उसने कहा। "जहाँ पैंसठ साल पहले मैं चूल्हा जलाती थी। वो हवेली अब भी मेरी पहचानती है।"
"नहीं," मैंने कहा। "हवेली में रात नहीं। आप मेरे घर चलिए। माँ है, रीना है। बही वहाँ रहेगी। कल सुबह मैं आपको अदालत ले जाऊँगा।"
बूढ़ी औरत मुझे देखने लगी। उसकी आँखों में कुछ था — जाँच, और उसके पीछे कुछ और।
"तेरा घर," उसने कहा। "वो दो कमरे का मकान, रामगंज की गली में? जहाँ तेरी माँ पानी भरती है हैंडपंप पर?"
"वही।"
"मैं आ जाऊँगी," उसने कहा। "पर एक बात माननी होगी। रात में बही को कोई छुए नहीं। न तू, न तेरी बहन, न तेरी माँ। मैं उसके सिरहाने बैठूँगी।"
"मान ली," मैंने कहा।
सुमन ने अपनी घड़ी देखी।
"मुझे अस्पताल जाना होगा," उन्होंने कहा। "आज डाक आनी है। तबादले का हुक्मनामा।"
"आ गया तो?" बंसी ने पूछा।
"आ गया तो मैं जवाब लिखूँगी," सुमन ने कहा। "और उस जवाब की कॉपी अदालत में जाएगी। बही के साथ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू — मैं अदालत में गवाही दूँगी। भवानी के होम के काग़ज़, रजिस्टर की गड़बड़, तबादले का दबाव — सब। पर मैं एक बात कह दूँ। मेरी गवाही मेरी नौकरी पर भारी पड़ेगी। अगर मेरी नौकरी जाती है, तो मुझे कोई नया काम चाहिए।"
"अस्पताल में डॉक्टर की कमी है," शेखर बाबू ने कहा। "उस रिपोर्ट में तेरा नाम पहले से है, जो मैंने मुख्य अधिकारी को भेजी।"
सुमन ने उन्हें देखा और हल्का मुस्कुराई।
"अच्छा," उसने कहा। "तो मैं अब जाती हूँ।"
वह निकल गई। शेखर बाबू भी उठे।
"मैं कॉपी बनाता हूँ," वे कहने लगे, "बही की फ़ोटो-कॉपी, चार जगह। और मैं एक और काम करूँगा — रसीद की कॉपी भी साथ लगाऊँगा। दोनों काग़ज़ों की स्याही मिलानी है अदालत में।"
"मिलेगी," बूढ़ी औरत ने कहा। "दोनों एक ही स्याही से लिखी है — मैंने अपनी आँखों से देखा है।"
वे निकल गए। दुकान में मैं, बंसी और बूढ़ी औरत बचे। बंसी ने चाय का गिलास उठाया और बिना पूछे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पी ले," उसने कहा। "तेरे हाथ ठंडे हैं।"
मैंने गिलास पकड़ा। चाय गरम थी, और उसकी भाप में मुझे अपना चेहरा धुँधला दिखा।
"बंसी," मैंने कहा, "तूने दो नाम बदले थे। उनमें से एक नाम काकी के पति का नहीं था?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें फैल गईं।
"पता नहीं," उसने कहा। "पर अब जब तूने कहा, तो — दूसरा नाम शायद किसी माली का था। कन्हैया? कन्हैया — हाँ, कन्हैया नाम था। मुझे याद आ रहा है। दूसरा काग़ज़ ज़मीन का था, और उस पर कन्हैया लिखा था।"
मेरे हाथ से चाय का गिलास काँपा। बूढ़ी औरत ने बंसी की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ गरमी आई।
"तूने कन्हैया का काग़ज़ बदला था?" उसने पूछा। "कन्हैया माली का? जिसका चौथा हिस्सा इस बही में लिखा है?"
"मुझे नाम याद नहीं रहते," बंसी ने कहा, और उसकी आवाज़ फीकी पड़ गई। "मैंने काग़ज़ के ऊपर की लाइन देखी थी, नाम नहीं। उस दिन से मैंने काग़ज़ उठाया ही नहीं।"
बूढ़ी औरत उठी। बही उसकी बाँहों में थी।
"तो वो काग़ज़," उसने कहा, "जो अदालत में तेरे दादा का हिस्सा छीनने का सबूत बना — तूने बदला था। तेरे हाथ से।"
बंसी ने अपना चेहरा दोनों हाथों से ढक लिया।
"मैं तेरे पापा का कर्ज़ उतार रहा था," वह धीरे से बोला। "मुझे नहीं पता था कि उसका मतलब यह होगा।"
"तू मेरे साथ चलेगा," मैंने कहा। "अदालत तक। और तेरे हाथ से जो बदला, वो तेरा हाथ ही खोलेगा। तेरी गवाही से मेरे दादा का हिस्सा वापस मिलेगा।"
बंसी ने हाथ हटाए। उसकी आँखें लाल थीं।
"मैं चलूँगा," उसने कहा। "पर एक बात कह दूँ, मन्नू। जब मैं अदालत में खड़ा होकर यह कहूँगा कि मैंने काग़ज़ बदला था, तो मेरा चाय का खोखा रह जाएगा। लोग कहेंगे — इसने भवानी की चाकरी की थी।"
"लोग कहेंगे," मैंने कहा, "कि तूने सच बोला।"
"तेरे मुँह में घी शक्कर," बूढ़ी औरत ने कहा, और पहली बार वह हँसी। फिर उसने बही को गले से अलग किया, मेज़ पर रखा और उसे खोलकर उस पन्ने पर उँगली रखी जहाँ कन्हैया का नाम था।
"यहाँ लिखा है," उसने कहा। "कन्हैया माली। हवेली का चौथा हिस्सा। पर अगर काग़ज़ बदल गया था, तो यह बही अपने आप में सबूत है — क्योंकि जिस काग़ज़ में यह हिस्सा छीना गया, वो काग़ज़ इस बही में दर्ज है। अदालत को दोनों चीज़ें चाहिए। बही, और बदला हुआ काग़ज़। बही हमारे पास है — बदला हुआ काग़ज़ कहाँ है?"
"तहसील के रिकॉर्ड में," बंसी ने कहा। "उस साल की ज़मीन की फाइलें तहसील के पुराने कमरे में हैं। उस पर भवानी के पिता का दस्तख़त है। वो फाइलें मैं जानता हूँ कहाँ हैं — मैंने ही उन्हें रखा था।"
"तो आज शाम," मैंने कहा, "हम वो फाइल निकालेंगे।"
उसी वक़्त दुकान के बाहर एक ऑटो रुका। उसमें से शेखर बाबू उतरे, हाँफते हुए। उनके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था, खुला हुआ।
"सुमन का तबादला," उन्होंने कहा। "कल का हुक्मनामा, आज सुबह पहुँच गया। बाड़मेर। तुरंत ज्वाइन करने का आदेश।"
बूढ़ी औरत ने बही बंद की।
"कल सुबह तक," उसने कहा, "वो बाड़मेर नहीं जाएगी। मैं जानती हूँ उनका जवाब कहाँ जाएगा।"
"कहाँ?" शेखर बाबू ने पूछा।
"जहाँ से भवानी के सारे हुक्मनामे गुज़रते हैं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वही पुरानी शांति लौट आई थी। "मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दफ़्तर में। और उस दफ़्तर में एक क्लर्क है जो बही पढ़कर बगलें झाँकने लगेगा।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि उस क्लर्क के पिता का नाम भी इस बही में है," बूढ़ी औरत ने कहा। "और वो आज तक उस ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर पाया। भवानी ने उसे रोक रखा है।"
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