The Token System – Chapter 75
“नहीं,” बूढ़ी औरत ने कहा। “भवानी को सबसे पहले। सबके सामने। क्योंकि अगर वह सबसे पहले सुन लेगा, तो वह पहले कुछ और करेगा — कुछ और बिगाड़ेगा।”
“तो आज नौ बजे,” मैंने कहा। “हवेली में।”
“हवेली में,” बूढ़ी औरत ने कहा। “जहाँ सब शुरू हुआ।”
दुकान के बाहर तेज़ आवाज़ आई — गाड़ी के ब्रेक की। सबने दरवाज़े की तरफ़ देखा। एक सफ़ेद गाड़ी रुकी थी, चमकदार, बड़ी। उसका दरवाज़ा खुला और भवानी सिंह उतरा।
वह सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहने था, पैरों में चमड़े की चप्पल। उसके पीछे दो आदमी थे। वह दुकान के दरवाज़े तक आया और एक पल बाहर खड़ा रहा — सबको देखता हुआ। फिर अंदर आया।
बंसी खड़ा हो गया। “दुकान की छत के नीचे—”
भवानी ने हाथ उठाया, जैसे कोई बच्चा चुप कराता है।
“मैं तुम्हारी छत नहीं तोड़ूँगा,” उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, शांत। “मैं चाय पीने नहीं आया।” उसने मेज़ पर पड़ी बही की तरफ़ देखा। उसकी नज़र उस पर थम गई।
बूढ़ी औरत ने उसे सीधा देखा।
“बही मेरी है,” भवानी ने कहा। “और जो मेरी है, वो मैं लेने आया हूँ।”
॥
बूढ़ी औरत ने बही अपनी छाती से लगा ली। मेज़ पर से उठाकर, दोनों हाथों से। भवानी सिंह ने यह देखा और उसके होठों पर एक हल्की मुस्कान आई, वैसी मुस्कान जो आदमी तब देता है जब बच्चा कोई खिलौना छुपा ले।
"बंसी," भवानी ने कहा, आवाज़ में अब भी वही धीमापन था, "यह बही मेरी हवेली की है। मेरी हवेली की चीज़ मेरी दुकान में रखी है। तू जानता है, मैं कितनी बार तेरी दुकान से चाय पी चुका हूँ।"
बंसी की गर्दन सीधी थी। उसने बही अपनी बाँहों में दबाई और एक कदम आगे आया।
"दुकान मेरी है," बंसी ने कहा। "और जो चीज़ मेरी दुकान में आई है, वो मेरी है। यह बही अब इस दुकान की चीज़ है। इस पर से तेरा नाम उतर चुका, भवानी। पढ़ने वाला पढ़ेगा।"
भवानी ने सिर हिलाया, धीरे-धीरे। जैसे कोई बूढ़ी बात याद कर रहा हो।
"बंसी," उसने कहा, "तेरी याददाश्त कमज़ोर हो गई है। मैं तुझे याद दिलाऊँ? वह साल — तेरी दुकान का वह साल, जब तू यहाँ चाय नहीं बेचता था, तहसील के गलियारे में काग़ज़ ढोता था?"
बंसी के हाथ सख़्त हो गए। बही उसकी बाँहों में कस गई, पर उसका चेहरा — मैंने देखा — पहली बार डरा। वह पीछे हटा, एक कदम नहीं, दो कदम। पीछे जाकर दीवार से लग गया। उसकी पीठ दीवार पर टिकी और उसके होंठ खुले रह गए।
"मैंने—" बंसी ने शुरू किया, फिर रुक गया।
"तूने मेरे लिए दो नाम बदले थे," भवानी ने कहा। "एक ज़मीन के काग़ज़ पर, एक मकान के। तुझे उसका पैसा नहीं चाहिए था, फिर भी तूने लिया। क्योंकि तेरे पिता का कर्ज़ था। हाँ?"
बंसी कुछ नहीं बोला। उसका हाथ काँप रहा था — बही के किनारे पर। उसने बही मेज़ पर वापस रख दी, धीरे से, जैसे कोई गरम तवा रख रहा हो।
"मुझे माफ़ कर दे भवानी साहब," बंसी ने कहा, और उसकी आवाज़ का ठेठ जयपुरी रंग पहली बार फीका पड़ गया। "वो बात पुरानी है।"
"पुरानी बातों का हिसाब नहीं चुकता, बंसी," भवानी ने कहा, "वो अंदर चलता रहता है। तू जानता है। तेरे पिता के नाम पर जो ज़मीन छूटी थी, वो आज भी तेरे खाते में नहीं है।"
"बही मेरे पास रहेगी," मैंने कहा और मेज़ के किनारे की तरफ़ बढ़ गया।
भवानी की नज़र मेरी तरफ़ आई। वह मुझे पहले से देख रहा था, पर अब देखा — नापते हुए, एक-एक अंग।
"मनोहर," उसने कहा, "तू अभी भी उसी जगह खड़ा है जहाँ तुझे नहीं खड़ा होना चाहिए। बीच में।"
"बही मेरे पास रहेगी," मैंने दोहराया। "कल सुबह जब तलाशी पूरी हुई थी, तब यह बही मेरे पास नहीं थी। आज यह मेरे पास है। कल मैं इसे अदालत में पेश करूँगा। जज के सामने, खुले कमरे में।"
भवानी ने कुर्सी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, बिना पूछे खींची और बैठ गया। उसके दोनों आदमी दरवाज़े के अंदर खड़े थे — एक ने हाथ जेब में डाल लिया था। भवानी ने उन्हें देखा और उसने उँगली उठाकर उन्हें बाहर जाने का इशारा किया। वे दुकान के बाहर चले गए, पर दरवाज़े के पास ही।
"अदालत," भवानी ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक एक थकान आ गई, जैसे कोई लंबा हिसाब जोड़ रहा हो। "अदालत में सबूत की कीमत होती है, मनोहर। सबूत काग़ज़ का टुकड़ा नहीं होता — सबूत वकील होता है। वकील का दाम होता है। और दाम — दाम मेरे पास है। तेरे पास क्या है?"
"मेरे पास बही है," मैंने कहा।
"बही काग़ज़ है।" भवानी ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और माथा पोंछा। "मैं तुझे साफ़ बताता हूँ। तू मुझसे लड़ रहा है, पर तू यह नहीं देख रहा कि तेरी लड़ाई किस चीज़ पर है। तेरी बहन की शादी अगले महीने है। मैंने सुना, सादी रखी है तूने। कितने आदमी बुलाए हैं? सौ? दो सौ? खाना, पंडाल, बारात — तेरे पास इन सबका हिसाब है?"
"आप हिसाब की बात मत करो," मैंने कहा।
"मैं हिसाब की ही बात कर रहा हूँ," भवानी ने कहा, "क्योंकि तू मुझसे हिसाब में हारेगा। यह बही दे दे। और मैं वादा करता हूँ — वादा नहीं, लिखकर देता हूँ — रीना की शादी का पूरा ख़र्च मेरा। पंडाल से लेकर बारात तक। और तू — तू मेरे नर्सिंग होम में आ जा। एक्स-रे टेक्नीशियन का काम है तेरे पास? तेरे पास काग़ज़ उठाने का काम होगा, महीने का तीस हज़ार, ऊपर से हर महीने का हिस्सा।"
दुकान में सन्नाटा था। बंसी दीवार से लगा खड़ा था, अपने हाथ देख रहा था। शेखर बाबू ने अपना चश्मा उतार लिया था और उसे रुमाल से पोंछ रहे थे। सुमन ने अपना फ़ोन जेब में रख लिया था — मुझे उनकी आँखों में गुस्सा दिखा, पर वे चुप थीं।
"अपने पापा को मत भूल," भवानी ने कहा। "तेरे पापा भी ऐसे ही सीधे खड़े थे, जैसे तू खड़ा है। मैंने उनसे भी बात की थी। नौकरी का वादा किया था, ज़मीन का हिस्सा दिखाया था। वो भी नहीं माने थे — पहली बार।"
मैंने बही उठाई।
"यह बही," भवानी ने कहा, "जिसे तू हवेली के नाम पर हासिल करना चाहता है — इसमें मेरे दादा की लिखाई है, मेरे पिता की लिखाई है। तू यह साबित करेगा कि मेरे दादा चोर थे। ठीक है। मान लिया। पर तेरे पास क्या साबित करने को है? कि तेरे दादा माली थे? कि तेरे पापा क्लर्क थे? यह सब जानते हैं। यह बही पढ़कर क्या बदल जाएगा? तेरे पास ज़मीन नहीं है, तेरे पास पैसा नहीं है, तेरे पास ताक़त नहीं है।" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "सिर्फ़ सच होना काफ़ी नहीं होता, मनोहर। सच को चलाने के लिए पैर चाहिए। और पैर पैसे के होते हैं।"
मैंने बही अपनी बगल में दबाई।
"मेरे पापा को आपने क्या दिया था?" मैंने पूछा। "आख़िरी बार। जब वो नहीं माने थे, तो आपने क्या किया था?"
भवानी की आँखें एक पल के लिए रुकीं। बहुत छोटा पल — पर रुकीं। फिर वह उठा, कुर्सी को धक्का दिया और दरवाज़े की तरफ़ चला। दरवाज़े पर रुककर, बिना मुड़े, उसने कहा:
"मैं तेरे पापा को कुछ नहीं दिया था। मैंने उन्हें कुछ लेने से मना किया था। बाकी बात तेरी माँ जानती है, मुझसे मत पूछ।"
और वह गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ, इंजन चला, गाड़ी पीछे हटी और तेज़ी से गली से निकल गई। उसके आदमी भी पैदल ही निकल गए।
दुकान में कुछ पल किसी ने कुछ नहीं कहा। बंसी दीवार से अलग हुआ, चाय का गिलास उठाया, फिर रख दिया। उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।
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