The Token System – Chapter 77
मैंने बूढ़ी औरत की तरफ़ देखा। वह बही को अपनी गोद में वापस ले चुकी थी, और उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं।
"तू सोच रहा है," उसने कहा, "कि यह बूढ़ी औरत सब कैसे जानती है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"क्योंकि मैं उस दफ़्तर में साफ़-सफ़ाई करने जाती थी," उसने कहा। "पैंसठ साल में चार दफ़्तर बदले। हर दफ़्तर में एक दराज़, हर दराज़ में एक काग़ज़। मैंने सब पढ़ा है। पढ़ना सीखा है मैंने — किसी ने नहीं सिखाया, मैंने खुद सीखा। और जो मैंने पढ़ा, वो आज काम आएगा।"
शेखर बाबू ने लिफ़ाफ़ा मोड़कर जेब में रखा।
"तो आज शाम तहसील," उन्होंने कहा। "और कल सुबह अदालत। और आज रात — बही मन्नू के घर पर।"
"नहीं," बूढ़ी औरत ने कहा। "बही मेरे पास। रात मैं हवेली में नहीं, मन्नू के घर पर रहूँगी — पर बही मेरी गोद में। और तू, शेखर, एक काम कर। रात में हवेली जाकर उस दीवार के नीचे से पीतल का बुरादा उठा ला। जो बुरादा कल बिखरा मिला था। वो बुरादा अदालत में जाएगा — साबित करने के लिए कि दीवार से कुछ निकाला गया, जबकि हवेली पर ताला था।"
"भवानी कहेगा — बुरादा किसी और ने फैलाया," शेखर बाबू ने कहा।
"कहेगा," बूढ़ी औरत ने कहा। "पर बुरादा उसके टोकन के कोने से मिलेगा। वो कोना मन्नू की जेब में है। और उस कोने का पीतल उसी बुरादे से मिलेगा। यह किसी और का नहीं, उसी का हाथ था।"
मैंने अपनी जेब से वह कोना निकाला। छोटा सा पीतल का टुकड़ा, ठंडा, किनारे से टूटा हुआ। मैंने उसे उँगलियों में पकड़कर देखा।
"आज रात हमें तहसील की फाइल भी चाहिए," मैंने कहा। "और रजिस्टर भी। जो रिकॉर्ड कमरे से गायब है।"
"रजिस्टर तो आज नौ बजे हवेली में आने वाला था," शेखर बाबू ने कहा। "उस आदमी ने।"
"वो आदमी," बूढ़ी औरत ने कहा, "आज नौ बजे हवेली में आया? कोई आया?"
मैंने सिर हिलाया — नहीं।
"तो वो आएगा," उसने कहा। "वो अपनी गर्दन बचाने आएगा। और जो गर्दन बचाने आता है, वो सब बता देता है। बस उसे एक भरोसा चाहिए कि उसे माफ़ी मिलेगी।"
"मिलेगी," मैंने कहा।
तभी दुकान के दरवाज़े पर एक परछाईं पड़ी। मैंने देखा — एक आदमी खड़ा था, दुबला, साठ के आसपास, कंधे झुके हुए। उसके हाथ में एक पुरानी भूरी फ़ाइल थी। उसने अंदर देखा और किसी को ढूँढ़ने लगा। फिर उसने बूढ़ी औरत को देखा और उसके चेहरे पर कुछ आया — पहचान, और उसके साथ डर।
"कम्मो," उसने कहा। "कम्मो, तू अभी ज़िंदा है?"
बूढ़ी औरत उठी। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"बद्री," उसने कहा, "तू यहाँ?"
"मैं रजिस्टर लाया हूँ," उस आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ में कंपकंपी थी। "भवानी साहब ने कहा था — नौ बजे, हवेली। मैं पहुँचा, कोई नहीं था। ताला लगा था। मैं डर गया। मैंने सोचा — काग़ज़ यहाँ ले आऊँ। कम्मो के पास।"
बूढ़ी औरत ने फ़ाइल उसके हाथ से ली। उसने उसे खोला, पन्ने पलटे, स्याही देखी — और मेरी तरफ़ मुड़ी।
"यह वो रजिस्टर है," उसने कहा। "जिसमें उस साल के सारे दस्तख़त हैं। जिसे भवानी ने रिकॉर्ड कमरे से निकलवाया था। और यह आदमी — यह बद्री है, तहसील के पुराने कमरे का चौकीदार। जिसने भवानी के आदमियों को रात में लालटेन लेकर दराज़ें खँगालते देखा था। तूने देखा था ना, बद्री? उस रात?"
बद्री ने सिर हिलाया। उसकी आँखें डबडबा गईं।
"देखा था," उसने कहा। "दो आदमी थे। उन्होंने मुझे पकड़ लिया था, मुँह पर हाथ रखा। उन्होंने मुझसे कहा — अगर बोला तो तेरा घर जल जाएगा।"
"अब बोलेगा," मैंने कहा। "अदालत में।"
बद्री ने मेरी तरफ़ देखा, फिर बूढ़ी औरत की तरफ़।
"कम्मो," उसने कहा, "यह लड़का कौन है?"
"यह कन्हैया माली का पोता है," बूढ़ी औरत ने कहा। "और यह वो आदमी है जो तेरी मरम्मत करेगा।"
बद्री ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, मेरे हाथ को पकड़ा, और उसकी पकड़ में एक अजीब सी ताक़त थी।
"मैं बोलूँगा," उसने कहा। "पर पहले मुझे उस दराज़ की चाबी दो, जो मैंने भवानी के आदमियों से छुपाकर रखी थी। उस दराज़ में एक और काग़ज़ है। जिस पर तेरे पापा के हाथ के निशान हैं।"
मैं रुक गया। दुकान में हवा भी रुक गई लगी।
"मेरे पापा?" मैंने कहा।
"वो काग़ज़ जो तेरे पापा ने खुद लिखा था," बद्री ने कहा, "और जो भवानी के आदमियों ने उनसे छीनकर उस दराज़ में बंद कर दिया था। उस दिन के बाद तेरे पापा की दुर्घटना हुई। मैंने वो काग़ज़ पढ़ा है। उसमें तेरे पापा ने लिखा है कि हवेली का हिसाब किस-किस पर बाकी है।"
मैंने धीरे से कहा, "और मेरे पापा की मौत—"
"वो दुर्घटना नहीं थी," बद्री ने कहा, और उसकी आवाज़ फूट गई। "मैं उस रात वहाँ था। मैंने गाड़ी देखी थी। पर मैंने आज तक किसी से नहीं कहा।"
बूढ़ी औरत ने अपना हाथ बद्री के सिर पर रख दिया, जैसे कोई बच्चे को शांत कर रहा हो।
"अब कहेगा," उसने कहा। "अब सब कहेगा। पहले मुझसे, फिर इनसे, फिर अदालत से।"
बद्री ने सिर हिलाया और दुकान के अंदर आकर बेंच पर बैठ गया। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा ने उस रात मुझे फ़ोन किया था," उसने कहा। "कहा था — बद्री, मैंने हवेली का हिसाब लिख दिया है। अब मैं इसे भवानी को नहीं दूँगा। अगर कुछ हो जाए तो यह काग़ज़ उस दराज़ में है। मैंने कहा था — कन्हैया भाई, आप ऐसा मत कीजिए। उसने कहा था — मैं नहीं करूँगा तो कौन करेगा? मेरा बेटा है, मन्नू। उसके लिए।"
मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया। मेरी आँखों में कुछ आ गया था, और मैं उसे दुकान में नहीं दिखाना चाहता था। बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ भारी था।
"तेरे पापा ने तेरे लिए लिखा था," बद्री ने कहा। "और भवानी ने उसे मिटाने की कोशिश की। पर काग़ज़ अभी ज़िंदा है। और उस काग़ज़ में एक नाम भी है — उस आदमी का जिसने गाड़ी चलाई थी।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"काग़ज़ पढ़कर पता चलेगा," बद्री ने कहा। "पर पहले उस दराज़ की चाबी। और वो चाबी मैंने अपने पुराने क्वार्टर की ईंट के नीचे गाड़ी थी। तहसील के पिछले हिस्से में।"
"तो चल," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ को सख़्त किया। "अभी।"
बूढ़ी औरत ने बही उठाई, और मेरी तरफ़ देखकर बोली:
"मन्नू — याद रखना। जो काग़ज़ आज मिलेगा, वो सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। वो तेरे पापा का हिसाब है। और तेरे पापा का हिसाब भी वही पन्ना बंद करेगा, जो सबसे आख़िर में खुलेगा।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और उस टूटे कोने को महसूस किया — वह अभी भी ठंडा था, बिलकुल ठंडा, जैसे उसका कोई हिसाब ही न बाकी हो।
बाहर निकलते वक़्त मैंने एक बार पीछे देखा। बंसी अपनी दुकान के बोर्ड को देख रहा था — वह पुराना लकड़ी का बोर्ड, जिस पर उसके पिता ने नाम लिखा था। उसने बोर्ड को छुआ, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"बंसी," मैंने कहा। "तू आ रहा है?"
"आ रहा हूँ," उसने कहा और चाय का बर्तन बंद करने लगा। "पर एक बात, मन्नू। अगर अदालत में मेरी गवाही से तेरे दादा का हिस्सा मिलता है, तो उस हिस्से में से एक कोना मेरे पिता के कर्ज़ के नाम कर देना। मुझे ज़मीन नहीं चाहिए। बस कर्ज़ का नाम मिट जाए।"
"कर्ज़ तो मिटेगा," बूढ़ी औरत ने कहा, और वह पहले ही दुकान से बाहर कदम रख चुकी थी। "पर उससे पहले तुझे अपना कर्ज़ मिटाना होगा — अदालत में खड़े होकर।"
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