The Token System – Chapter 751
"लड़ो" — शब्द अभी मेरी आँखों के सामने था कि रामदीन ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ सूखी लकड़ी जैसी थी, पर ताक़त उसमें थी।
"काग़ज़ दे," वो बोला। "वो काग़ज़ मेरे हाथ में दे, और मैं कल अदालत में भवानी के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाऊँगा। जो कहूँगा, सबके सामने कहूँगा।"
मैंने अपना हाथ झटक लिया। "तू वही रामदीन है न, जिसने मेरे पापा को डरा-धमकाकर मरवाया?"
रामदीन का चेहरा जम गया। पसीना उसके माथे पर सूख गया, जैसे हवा भी रुक गई हो। उसने कोई जवाब नहीं दिया। छत पर सिर्फ़ नीचे से आ रही आवाज़ें थीं — "सीढ़ी पकड़ो, ऊपर जाओ" — पर वो आवाज़ें अचानक दूर लगीं।
"मैंने किसी को नहीं मारा," रामदीन ने धीरे से कहा। "पर जो मैंने छिपाया, उससे कई मरे। उनमें तेरा पापा भी है।"
कुँवर ने लाठी उठाई, पर मैंने उसका हाथ दबा दिया।
"कैसे?" मैंने पूछा।
रामदीन ने पीछे देखा — सीढ़ी के मुँह की तरफ़ — और फिर हमारे बीच झुककर बोला, जैसे दीवारें भी सुन रही हों।
"पंद्रह साल पहले की बात है। भवानी ने मुझे बुलाया। उसके हाथ में चौथे हिस्से का काग़ज़ था। कहा — इसे छिपा दे। कहीं ऐसी जगह जहाँ कोई न पहुँचे। और बदले में… तेरा बेटा ज़िंदा रहेगा, तेरा घर चलेगा, तेरा नाम किसी काग़ज़ पर नहीं आएगा।"
"तूने छिपा दिया," बंसी ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
"छिपा दिया। पर जब मैंने वो काग़ज़ अकेले में पढ़ा, तब समझ आया कि उसमें किसका नुक़सान लिखा है। एक-एक नाम। एक-एक घर। और सबसे ऊपर एक लाइन थी — किशनचंद।"
मेरे हाथ से काग़ज़ छूटते-छूटते बचा। "मेरे पापा का नाम।"
"तेरे पापा का नाम। और उसके नीचे लिखा था — इलाज के पैसे।"
छत के कमरे में एक पल के लिए सब रुक गया। रामदीन ने नीचे आ रही आवाज़ों की तरफ़ कान उठाया, फिर फिर से हमारे बीच झुका।
"उस दिन से मैं भवानी के घर में रहने लगा। उसका हर काग़ज़ देखता, उसकी हर तिजोरी की ख़बर रखता। किसी को पता नहीं चला, क्योंकि भवानी को लगा कि मैं उसका आदमी हूँ।"
कुँवर ने लाठी नीचे की। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तो तू मेरे बाप की तरफ़ से है या मेरे ख़िलाफ़?"
रामदीन मुड़ा। उसने कुँवर को सीधे देखा, आँखें झुकाए बिना।
"मैं तेरे बाप की तरफ़ से नहीं, कुँवर। मैं तेरी तरफ़ से हूँ — तेरे असली बाप की तरफ़ से।"
"मेरा असली बाप तो राघव था," कुँवर ने कहा।
रामदीन ने सिर हिलाया। "था। पर जिस आदमी ने तुझे पाला, जिसने तेरे नाम पर काग़ज़ लिखवाए, जिसने तेरे हाथ से दस्तख़त करवाए — वो राघव नहीं था।"
कुँवर आगे बढ़ा। "तो कौन था?"
रामदीन ने सीढ़ी की तरफ़ एक नज़र डाली। फिर उसने वो नाम लिया — धीरे, दबी आवाज़ में, जैसे कोई क़ब्र से पत्थर उठा रहा हो।
"तेरे काग़ज़ों पर जिसने दस्तख़त किए, वो किशनचंद था।"
मैंने सुना और मेरे हाथ-पैर ठंडे हो गए। किशनचंद। मेरे पापा। मेरे पापा ने… कुँवर के काग़ज़ों पर?
कुँवर के हाथ से लाठी छूटी। वो लकड़ी छत के फ़र्श पर गिरी और एक ठोस आवाज़ हुई। मैं आगे झपटा और गिरती लाठी को बीच में ही थाम लिया — नहीं तो वो कुँवर के पैर पर पड़ती।
कुँवर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, ग़ुस्सा था, और कुछ ऐसा था जो अभी नाम नहीं पा रहा था।
"तेरे पापा मेरे काग़ज़ों पर दस्तख़त करते थे?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
रामदीन ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। बहुत पुराना नहीं — कुछ साल पुराना। उसने कुँवर की तरफ़ बढ़ाया।
"ये तेरे बाप की लिखाई है।"
कुँवर ने नहीं लिया। मैंने लिया। काग़ज़ खोला। ऊपर एक लाइन थी — "कुँवर का हिस्सा सुरक्षित रखना। काग़ज़ पर मेरे दस्तख़त ज़रूरी नहीं।" और नीचे हस्ताक्षर थे — किशनचंद।
मेरे हाथ काँपे। ये मेरे पापा की लिखाई थी। मैंने उसे बहुत बार देखा था — पुरानी रसीदों पर, घर के काग़ज़ों पर, दादा की बही के किनारे। ये वही थी।
"पापा… कुँवर के काग़ज़ों पर?" मैंने रामदीन से पूछा।
"वो काग़ज़ बनाते थे," रामदीन ने कहा। "भवानी के लिए नहीं — अपने डर के लिए। कुँवर को बचाने के लिए। जिस दिन उन्हें पता चला कि भवानी कुँवर को मिटाने की सोच रहा है, उस दिन उन्होंने कुँवर के हिस्से का काग़ज़ अपने नाम पर कर दिया, ताकि भवानी उस तक न पहुँचे। और इसीलिए भवानी ने उन्हें बंद कर दिया।"
नीचे से आवाज़ आई — "सीढ़ी पर कोई है! छत का दरवाज़ा तोड़ो!"
बंसी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "मन्नू, वक़्त नहीं है।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। "अगर तू सच बोल रहा है, तो कल अदालत में गवाही दे।"
"दूँगा," रामदीन ने कहा। "पर पहले मुझे वो काग़ज़ दे, जो कुँवर तेरे हाथ में दे चुका है। वो मेरे पास रहेगा, तो भवानी उसे मुझसे नहीं छीन पाएगा।"
कुँवर ने कहा, "नहीं।"
"कुँवर—"
"नहीं," कुँवर ने रामदीन की तरफ़ मुड़कर कहा। "तूने मेरे बाप को बचाया नहीं। तूने मेरे काग़ज़ छिपाए। तूने मेरे सामने बीस साल भवानी का नौकर बना रहा, और मुझे कभी नहीं बताया कि मेरा बाप कौन था। अब तू मेरे हाथ से काग़ज़ माँगता है?"
रामदीन की आँखें भर आईं। उसने कुछ कहना चाहा, पर सीढ़ी पर पैरों की आवाज़ तेज़ हो गई।
"मैं तुझे काग़ज़ नहीं दूँगा," कुँवर ने कहा। "पर मैं तुझे मौक़ा दूँगा। कल अदालत में खड़ा हो। जो सच है, बोल। अगर तूने एक भी झूठ बोला, तो ये काग़ज़ मेरे पास रहेगा — और मैं इसे जला दूँगा।"
रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।
"ठीक है।"
तभी दरवाज़े पर ज़ोर पड़ा। लकड़ी चरमराई। बंसी ने अपनी लाठी उठाई।
"और ये लोग?" बंसी ने कहा।
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "भवानी के आदमी हैं। तीन हैं। सीढ़ी पर दो, नीचे एक।"
"तू उन्हें रोक सकता है?" मैंने पूछा।
"रोक नहीं सकता। पर भटका सकता हूँ।" उसने अपनी जेब से एक पीली पर्ची निकाली और दरवाज़े की दरार से बाहर फेंक दी। "ये पर्ची उन्हें नीचे बुला लेगी — भवानी का नाम लिखा है। वो इसे लेकर नीचे जाएँगे, यही सोचकर कि भवानी ने कुछ भेजा है।"
मैंने दरवाज़े की दरार से झाँका। एक आदमी ने पर्ची उठाई, दूसरे को दिखाई, और दोनों नीचे भागे।
"जल्दी कर," रामदीन ने कहा। "कुछ मिनट ही मिलेंगे।"
मैंने मेज़ की तरफ़ देखा। पीतल की डिबिया और पुरानी किताब अभी भी वहीं पड़ी थीं। मैंने डिबिया उठाई, ढक्कन खोला। अंदर एक मुड़ा काग़ज़ था। खोला — राघव की लिखाई में एक लाइन — "जो यहाँ तक पहुँचा, वो जान गया कि हिसाब सिर्फ़ काग़ज़ का नहीं, आदमी का होता है। — राघव।" उसके नीचे एक छोटा कोना-चिह्न था, और उसके नीचे तीन नाम — सुखदेव, किशनचंद, और एक तीसरा जिसे कोई नहीं पढ़ सकता था।
मैंने किताब उठाई। भूरी जिल्द, जैसे सौ बार खोली जा चुकी हो। पहला पन्ना खोला। उस पर बस तीन लाइनें थीं — "हिसाब का कोई मालिक नहीं होता। हिसाब ख़ुद चलता है। जो इसे चलाता है, वो सिर्फ़ किरायेदार है।"
मैंने किताब बंद की और सीने से लगा ली।
"अब क्या?" बंसी ने पूछा।
"अब नीचे," मैंने कहा। "कुएँ की सुरंग से। और फिर सीधे अदालत।"
रामदीन ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "मैं नहीं जा सकता।"
"क्यों?"
"भवानी को अगर पता चला कि मैं तुम्हारे साथ हूँ, तो वो अदालत में तीनों ताले खोलकर सबका सच बदल देगा। मैं उसके घर में रहूँगा, उसके काग़ज़ों के साथ। कल सुबह दस बजे जब तुम अदालत में हो, मैं वहाँ होऊँगा।"
"और अगर तू नहीं आया?" कुँवर ने कहा।
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