The Token System738 / 1154

The Token System – Chapter 738

7 min read November 6, 2026

मंदिर का दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा, बस दीये की लौ कंपकंपा रही थी। मंडप के पीछे से सीढ़ियाँ नीचे गई थीं। मैंने पहला कदम रखा तो जेब में टोकन एकदम ठंडा हो गया, ऐसे ठंडा जैसे बर्फ़ का टुकड़ा जेब में रख दिया हो।

“क्या हुआ?” रघुवीर ने पूछा।

“टोकन कह रहा है, यहीं है।”

सीढ़ियों के नीचे लोहे का दरवाज़ा था, जिस पर कोई ताला नहीं, बस ज़ंग पकड़ी कुंडी थी। मैंने कुंडी उठाई और दरवाज़ा खिसका। अंदर पत्थर का कमरा, दीवारों से पानी टपक रहा था। बीच में लकड़ी की मेज़ रखी थी। और मेज़ के ऊपर — बस एक चीज़। मोटी लाल जिल्द की बही, भीगी हुई।

रघुवीर ने लाठी से उसे छुआ। “यहीं? इतनी आसानी से?”

“आसान कहाँ है।” मैंने बही उठाई। पहला पन्ना खोला। कोई हिसाब नहीं था, बस एक बड़े अक्षरों में एक लाइन लिखी थी।

“क्या है?” रघुवीर ने गर्दन आगे की।

मैंने पढ़ा। “जो यह बही खोलेगा, उसका नाम पहले पत्थर पर लिखा जाएगा।”

“पहले पत्थर पर?”

“हवेली की नींव का पहला पत्थर।” मैंने बही बगल में दबाई। “यह हिसाब नहीं है, रघुवीर। यह एक जाल है। भवानी चाहता है कि हम भागें, हवेली जाएँ, और पहला पत्थर उठाएँ। वहीं उसने अपने आदमी बैठा रखे हैं।”

“तो अब?”

मेरी जेब में फ़ोन काँपा। बंसी का नाम। मैंने लिया।

“मन्नू!” बंसी की आवाज़ हाँफ रही थी। “अस्पताल। अभी। सुमन का फ़ोन आया था। भवानी का भैया अस्पताल पहुँच गया है — सोहन के कमरे पर। सुमन कह रही है, पहुँच जा।”

मैंने बही रघुवीर के हाथ में दी। “मंदिर यहीं। हम बाद में आएँगे।”

“और तीन घंटे?”

“तीन घंटे जाने दो।” मैं सीढ़ियों की तरफ़ भागा। “अभी एक बच्चा पहले है।”

सुमन अस्पताल के गलियारे में खड़ी थी, हाथ में फ़ाइल, चेहरा लाल।

“कहाँ थी तू?” वो बिना रुके बोली। “भैया दो आदमियों के साथ सोहन के कमरे तक पहुँच गया था। इमरजेंसी में घुसने की कोशिश की। मैंने सिक्योरिटी बुला ली, तब हटे।”

“सोहन ठीक है?”

“ठीक है। पर सुन।” उसने मुझे गलियारे के कोने में खींचा। “भैया ने जाते वक़्त कहा — ‘डॉक्टर साहिबा, अगली बार यह बच्चा इमरजेंसी में नहीं, तुम्हारी नौकरी में मिलेगा।’ और उसके साथ जो सफ़ेद कुर्ते वाला था, वो मुझे देखकर हँसा।”

“हँसा?”

“और उसने कहा — ‘देख लेना, अब भवानी साहब नहीं, कोई और चलाएगा।’”

मैं ठिठक गया। “कोई और?”

“यही तो।” सुमन ने फ़ाइल खोली। “मेरे पास सफ़ेद कुर्ते वाले का नाम है। गाड़ी के रजिस्टर से मिलाया। वो भवानी के होम का कोई बड़ा आदमी नहीं है, मन्नू। वो बस एक चेहरा है। असली नाम काग़ज़ों में नहीं, किसी के मुँह में है।”

गलियारे के आख़िर में लिफ़्ट खुली और भैया निकला — मोटा शरीर, माथे पर पसीना। हमें देखकर रुका नहीं, सीधा हमारी तरफ़ बढ़ा।

“मनोहर बाबू,” वो मुस्कुराया। “एक बात।”

“बोलिए।”

“तीन बजे तक हिसाब खुलेगा। पर उससे पहले तेरी माँ को कुछ नहीं होगा — यह मेरा वादा है।” वो करीब आया, आवाज़ धीमी। “पर वादा तोड़ने वाला मैं नहीं होऊँगा। तेरे पास तीन घंटे हैं और मेरे पास सौ आदमी। चुन ले।”

“आप खुद क्या चुनेंगे?” मैंने पूछा।

“मैं तो चुन चुका हूँ।” वो मुड़ा। “सुन, एक और बात। तेरा दादा जब मरा था, उसके पास एक पीली पर्ची थी। वो पर्ची अब मेरे पास है। और उस पर लिखा है — ‘पाँचवाँ सबका बाप।’” वो हँसा। “तेरा दादा भी जानता था, मन्नू। तू ढूँढ रहा है, और जिसे ढूँढ रहा है वो तेरे ही घर में है।”

वो चला गया। गलियारे में उसके जूतों की आवाज़ देर तक रही।

सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। “झूठ बोल रहा है?”

“नहीं।” मैंने टोकन जेब में टटोला। “वो कुछ ऐसा जानता है जो हम नहीं जानते। और वो डरा हुआ है, सुमन। जो आदमी डरा हुआ होता है, वो अपनी सबसे बड़ी चीज़ उगल देता है।”

“कौन सी?”

“पाँचवाँ।”

बंसी अस्पताल के फाटक पर मिला, साँस फूली हुई। “तेरी माँ को छोड़कर आया हूँ। पर रास्ते में एक चीज़ मिली।” उसने जेब से कुछ निकाला। मुड़ा हुआ नीला काग़ज़। “तेरे घर के पास सफ़ेद गाड़ी से उड़ाकर गिराया गया।”

मैंने खोला। चार लाइनें थीं, साफ़ स्याही में।

“पहला पत्थर उठाने से पहले —

अपने दादा की मौत पढ़ ले।

पेज सात, तहसील की बही।

और हाँ — तेरा बाप ज़िंदा है।”

मेरे हाथ से काग़ज़ फिसला। बंसी ने झटके से पकड़ा।

“क्या लिखा है?” सुमन ने पूछा।

मैंने कुछ नहीं कहा। बस दीवार की तरफ़ देखता रहा। “मेरा बाप ज़िंदा है” — इन चार शब्दों ने मेरे अंदर कुछ ऐसा हिलाया जो आठ साल से जमा हुआ था।

“मन्नू?” बंसी ने कंधा हिलाया।

“तहसील चलो,” मैंने कहा। “सीधे। बही का पेज सात।”

“और मंदिर?”

“मंदिर बाद में।” मैंने टोकन निकाला। वो फिर से गरम था। “देख, टोकन भी यही कह रहा है।”

तहसील का पिछला कमरा खुला था। किशोरी लाल अंदर बैठा था, सामने मेज़ पर वही मोटी बही रखी थी जो मंदिर से मिली थी — नहीं, यह दूसरी थी। भूरी जिल्द, कोना फटा।

“तेरे बाप ने इस बही में लिखा था,” किशोरी लाल ने बिना सिर उठाए कहा। “आठ साल पहले। और उसने पेज सात को मोड़कर रख दिया था। मैंने उसे नहीं छुआ। अब तू खोल।”

मैंने बही खोली। पेज सात। ऊपर एक लाइन लिखी थी — “मोहन का हिसाब — भाई के नाम” — और उसके नीचे पूरा खाता। नाम, तारीख़, रकम। और सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में —

“अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरा बेटा इसे किशोरी को दे। वो मेरा भाई है, और वो जानता है कि मैंने उसके साथ क्या किया था।”

किशोरी लाल ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं।

“तेरे बाप ने मेरे हिस्से का काग़ज़ जलाया था,” वो बोला। “मैंने उससे साफ़ कहा था — तू मेरा हिस्सा नहीं छूएगा। उसने मेरी बात नहीं मानी। और जिस दिन उसने जलाया, उसी रात वो गाड़ी में बैठा।”

“आप साथ थे?” मैंने पूछा।

“मैं उस रात गाड़ी में नहीं था।” किशोरी ने बही बंद की। “मैं उस रात हवेली में था। भवानी के साथ। मैं उसका गवाह था, मन्नू। मैंने देखा — भवानी के आदमी ने तेरे बाप की गाड़ी का ब्रेक काटा। और मैं चुप रहा।”

कमरे में सन्नाटा। बंसी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा, जैसे कहीं भागना चाहता हो।

“क्यों चुप रहे?” मैंने पूछा।

“क्योंकि मैं डरा हुआ था।” किशोरी ने लाठी उठाई। “और आज भी डरा हुआ हूँ। पर आज मैं डर के साथ-साथ बूढ़ा भी हो गया हूँ। और बूढ़े आदमी की एक ही चीज़ बचती है — सच।”

“तो सच बोलिए।”

“पाँचवाँ कौन है,” किशोरी ने कहा, “यह मैं जानता हूँ। पर यह मैं अदालत में बोलूँगा, तीन बजे। अभी नहीं। क्योंकि अभी मेरे पास तेरे बाप का सच है, और अदालत में मेरे पास तेरे बाप का काग़ज़ होगा।”

“कहाँ है काग़ज़?”

“भवानी के तिजोरी में।” उसने लाठी की नोक ज़मीन पर टिकाई। “और उस तिजोरी में तेरे बाप ने अपने हाथ से एक लिफ़ाफ़ा रखा था। उस लिफ़ाफ़े पर तेरा नाम है।”

बाहर गलियारे में जल्दी-जल्दी कदमों की आवाज़ आई। राजेंद्र दरवाज़े पर आकर खड़ा हुआ, हाँफता हुआ।

“मन्नू!” वो बोला। “अस्पताल से ख़बर आई है। सुमन डॉक्टर ने भेजा है। भैया ने अपने आदमियों से अस्पताल के बाहर पोस्टर लगवा दिए हैं — छपी पर्चियाँ। उन पर तेरी फोटो है।”

“क्या लिखा है?”

राजेंद्र ने जेब से मुड़ा काग़ज़ निकाला। मैंने खोला।

मेरी फोटो। उसके नीचे मोटे अक्षरों में —

“यह आदमी मरीज़ों के काग़ज़ चुराता है।

अस्पताल के बाहर दिखे तो पकड़कर पुलिस को दें।”

मैंने काग़ज़ किशोरी लाल की तरफ़ बढ़ाया। उसने पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा।

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