The Token System – Chapter 739
“अब समझा?” वो बोला। “भवानी तुझे अदालत में नहीं जीतना चाहता, मन्नू। वो तुझे अदालत तक पहुँचने ही नहीं देना चाहता।”
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो उबल रहा था।
“रघुवीर,” मैंने कहा। “मंदिर जा। बही लेकर। तीन बजे अदालत में मिल।”
“और तू?”
“मैं अस्पताल।”
“इतनी धूप में? पोस्टर लगे हैं!”
“तो कोई और जाए।” मैंने सुमन का नंबर मिलाया।
“सुमन। सुन। पोस्टर की ख़बर मिली?”
“मिली।” उसकी आवाज़ सख़्त थी। “और मैंने भी एक काम किया है। अस्पताल के मुख्य अधिकारी को चिट्ठी लिख दी है — आज सुबह, तेरे सिर पर वार की रात। लिखा है कि मरीज़ों के काग़ज़ भवानी के होम भेजे जा रहे हैं, मेरे हस्ताक्षर के बिना। कॉपी मेरे पास है।”
“सुमन…”
“सुन आगे। मैंने कॉपी राजेंद्र को भी दी है। और अस्पताल के बाहर के पोस्टर हटवाने की शिकायत दर्ज करा दी है। अब तेरे पोस्टर लगाने वाले को सफ़ाई देनी पड़ेगी।”
“तू कहाँ है?”
“अस्पताल। और तेरे लिए एक बात है। सोहन के काग़ज़ में से एक फ़ाइल मुझे आज सुबह मिली थी — वो फ़ाइल जो नाम-कटी थी। उसमें सबसे ऊपर एक हस्ताक्षर है।” वो रुकी। “भवानी के होम का नहीं, मन्नू। अस्पताल के एक पुराने मुख्य अधिकारी का। जिसका नाम अब किसी रजिस्टर में नहीं है, पर जिसकी मोहर आज भी काम करती है।”
“कौन?”
“वो नाम मैं फ़ोन पर नहीं बोलूँगी।” उसकी आवाज़ धीमी हुई। “पर वो आदमी आज ज़िंदा है। और वो जानता है कि पाँचवाँ कौन है।”
दोपहर तीन बजे से पहले की रोशनी में मैं अस्पताल के बाहर फटा-सा पहुँचा। फाटक पर दो आदमी खड़े थे, सफ़ेद कुर्ते में। मैंने सिर पर गमछा बाँधा हुआ था, पट्टी के निशान पर।
मैं पीछे के फाटक से घुसा। रसोई के पास से। गलियारे में सुमन मिली — सफ़ेद कोट, हाथ में फ़ाइल — और उसके पीछे-पीछे एक बूढ़ा आदमी, झुकी कमर, चश्मा नाक पर।
“यह कौन?” मैंने पूछा।
“यही वो नाम हैं,” सुमन ने कहा, “जो रजिस्टर से गायब है। डॉक्टर जोशी के साथ काम करते थे। पचास साल से इसी अस्पताल में हैं।”
बूढ़े ने हाथ बढ़ाया। हाथ में पीतल की मोटी अँगूठी थी, जिस पर कोना-चिह्न खुदा था।
“मैं रामदीन का साथी हूँ,” वो बोला। “और मैंने तेरे बाप की लाश अपनी आँखों से नहीं देखी, मन्नू। इसलिए मैं आज तक चुप हूँ। अब खुलूँ?”
“खुलिए।”
“तेरा बाप ज़िंदा है। वो बसवा में है। और जो उसे छिपाए बैठा है, वो पाँचवाँ है।”
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। वो ठंडा हो गया था। पहली बार, बहुत देर बाद, ठंडा।
सुमन ने मेरा कंधा थामा। “तीन बजे अदालत। अब चल।”
“पहले एक काम।” मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा। “आपका नाम?”
“बद्री.”
“बद्री जी,” मैंने कहा, “अदालत में गवाही देंगे?”
बूढ़े ने अँगूठी को घुमाया। “मैं पचास साल से इस अस्पताल के काग़ज़ रख रहा हूँ, मन्नू। शादी नहीं की, बच्चे नहीं किए। बस एक चीज़ बची है — सच। वो बेच नहीं सकता।”
अदालत के आँगन में जब हम पहुँचे, घड़ी सवा तीन बजा रही थी। आँगन भरा हुआ था। भवानी एक तरफ़ बैठा था, दो वकील, चार गवाह। दूसरी तरफ़ रघुवीर, हरीश चंद्र, किशोरी लाल।
जज ने चश्मा उतारा। “रघुवीर, आपका पहला गवाह?”
“जी। किशोरी लाल।”
किशोरी लाल उठा। भीड़ में सरसराहट हुई। भवानी ने गर्दन घुमाई।
“हवेली का चौथा हिस्सा किसका है?” हरीश चंद्र ने पूछा।
“पाँच हिस्से थे, हुज़ूर।” किशोरी की आवाज़ धीमी थी पर साफ़। “चार तो आपके सामने हैं। पाँचवाँ — वो हिस्सा जिसे भवानी के बाप ने मिटाया।”
“नाम?”
“सुखदेव का बेटा। मनोहर का बाप। मोहन।”
अदालत में सन्नाटा। मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था, पर वो हिला नहीं।
“मोहन मरा नहीं है,” किशोरी ने कहा। “वो ज़िंदा है। बसवा में। और उसे वहाँ रखने वाला भवानी नहीं, भवानी का बाप है।”
जज ने कलम उठाई। “यह जानकारी आपको कब मिली?”
“कल रात। उस आदमी से जिसने आठ साल तक भवानी के होम में काग़ज़ जलाए। उसका नाम बद्री है। और वो आज यहाँ मौजूद है।”
बद्री आगे आया। अँगूठी वाला हाथ मेज़ पर रखा।
“मैंने आठ साल पहले एक लिफ़ाफ़ा जलाया था,” वो बोला। “उसमें मोहन की तस्वीर थी, बसवा के एक मकान का पता था, और एक पर्ची थी जिस पर लिखा था — ‘अगर मैं न लौटूँ, तो मेरा बेटा मुझे ढूँढेगा।’” उसने मेरी तरफ़ देखा। “मैंने वो लिफ़ाफ़ा जलाया, पर पता याद रख लिया। आठ साल से रोज़ उस पते पर जाने की सोचता रहा। आज सुबह गया। मोहन वहाँ है। बीमार, पर ज़िंदा।”
मेरी आँखों के आगे अंधेरा घूम गया। सुमन ने पीछे से कमर थामी।
भवानी खड़ा हुआ। “हुज़ूर, यह सब झूठ है। यह आदमी…”
“बैठिए, ठाकुर साहब।” जज ने कहा। “आपकी बारी बाद में।”
मैं आँगन के बाहर निकला। दीवार के सहारे खड़ा हुआ। साँस नहीं आ रही थी। बंसी दौड़कर आया।
“मन्नू…”
“आठ साल,” मैंने कहा। “आठ साल, बंसी। वो ज़िंदा था और मैं उसकी मौत का काग़ज़ जेब में रखे घूमता रहा।”
“अब भी तो ज़िंदा है।” बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। “यही तो बात है। अब भी ज़िंदा है।”
रघुवीर बाहर आया। “अंदर चल। तेरी बारी है। और भवानी की तिजोरी खोलने का आदेश भी जज ने दे दिया है।”
“तिजोरी में क्या है?”
“वही लिफ़ाफ़ा जिस पर तेरा नाम है।”
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो बिलकुल ठंडा था, पर उस पर एक शब्द उभरा था।
“लिखा क्या है?” रघुवीर ने पूछा।
“पहला पत्थर,” मैंने कहा। “अब भी वही कह रहा है।”
“तो कब?”
“बाद में। पहले उससे मिलना है।”
“किससे?”
“अपने बाप से।”
अदालत के अंदर जज ने अगली तारीख़ का ऐलान किया — सुबह दस बजे, बसवा से मोहन का बयान। भवानी की तिजोरी सील कर दी गई। और जब हम बाहर निकले, सुमन ने मेरी जेब में कुछ डाला।
“क्या है?”
“वो टुकड़ा,” उसने कहा। “जो हमलावर की जेब से गिरा था। उलटे कोना वाला।”
मैंने उसे निकाला। धूप में पीतल चमका। मैंने उसे टोकन के पास रखा — दोनों पर एक जैसा साँचा, बस एक सीधा, एक उलटा।
सुमन ने टुकड़ा मेरे हाथ से लिया और देखा। फिर उसका चेहरा बदल गया।
“मन्नू…”
“क्या?”
“यह तो ठीक मेरे होम के उस बंद कमरे वाले बक्से के निशान जैसा है।” उसने आँखें सिकोड़ीं। “मन्नू, तेरे पास यह कहाँ से आया?”
॥
सुमन का हाथ अभी भी मेरी कलाई पर था और उसकी आँखें उस पीतल के टुकड़े पर टिकी थीं। मैंने अपनी कलाई छुड़ाई और टुकड़ा उसके हाथ से ले लिया।
"रिकॉर्ड कमरे में," मैंने कहा। "जब सिर पर वार हुआ, वो आदमी भागा। भागते वक़्त उसकी जेब से ये गिरा था।"
सुमन ने मुझे देखा। उसकी नज़र में एक सवाल था, पर उसने पूछा नहीं। बस काग़ज़ का एक फटा कोना उसने अपनी जेब से निकाला।
"तो ये भी उसी की जेब से था," वो बोली। "सीढ़ी पर गिरा था। मैंने उठा लिया। इस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा है।"
मैंने वो कोना अपनी उँगलियों में लिया। पीला काग़ज़, कोना फटा हुआ, और उस पर नीली स्याही में एक शब्द — शेखर।
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया। बंसी पीछे खड़ा था, उसने भी देखा।
"मन्नू?" बंसी ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा और दोनों चीज़ें जेब में डाल दीं। "तुम दोनों घर चलो। मुझे अस्पताल में एक काम है।"
"कौन सा काम?" सुमन ने पूछा।
"जो अब तक नहीं किया," मैंने कहा। "वो करना है।"
सुमन ने मेरी पट्टी की तरफ़ देखा। "सिर का दर्द?"
"गया," मैंने झूठ बोला। दर्द था — भारी, हथौड़े जैसा। पर जो सच मैंने अभी देखा था, वो इस दर्द से बड़ा था।
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