The Token System – Chapter 736
“नाम नहीं,” सुमन ने कहा। “ड्राइवर का काग़ज़।” उसने अपना काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “यह एक गाड़ी के नंबर के नीचे जो नाम था, वो श्याही से काटा गया है। मुझे याद है, दो दिन पहले तक वहाँ किसी और का नाम था।”
“किसका?”
“मेरे ही रजिस्टर में। पर मैं याद नहीं कर पा रही। मुझ पर कोई दवा दी गई है, मन्नू। यही वजह है कि दो दिन में दो बार ड्यूटी बदली।”
बंसी ने उसका काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, करीब से देखा। “यह नाम तो उभर रहा है।”
“क्या कह रहा है?”
“अभी नहीं।” बंसी ने काग़ज़ मोड़कर मुझे दिया। “बाद में। अभी फ़र्श पर बैठकर पढ़ने का वक़्त नहीं है।”
सुमन ने एक और बात कही, धीरे से। “अस्पताल का फ़ोन बज रहा है तीन बार से। भवानी के दफ़्तार से कोई लाइन पर है। कह रहे हैं मेरी तबादला फ़ाइल आज फ़ाइनल होगी।”
“कब?”
“अभी। बजे तो।”
मैं सीधा खड़ा हो गया।
“कहाँ जा रहा है?” सुमन ने कहा।
“तेरे साथ।”
“तू मरीज़ नहीं है —”
“मैं गवाह हूँ,” मैंने कहा। “अगर काग़ज़ आज फ़ाइनल होगा, तो उस काग़ज़ पर भी एक सर्किल है, एक मुहर, एक तारीख़ है। और वो तारीख़ कल की नहीं होगी — दस साल पुरानी होगी।”
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। “मन्नू, माँ का रास्ता —”
“मैं जानता हूँ।” मैंने उसकी तरफ़ देखा। “तू घर जा। माँ को बता — रामदीन जो भी बोले, आज कुछ न करे। और रीना को —”
“रीना को क्या?”
“रीना से कह — सोहन को एक दोस्त मिला है।”
बंसी मुझे देखता रहा। फिर उसने सिर हिलाया, और मुड़कर गली के रास्ते चल दिया।
पीछे के दरवाज़े की कुंडी के नीचे का ताला ज़ंग लगा था और जैसे ही मैंने लोहे की पट्टी खींची, वो पूरी उखड़ आई। सिच्युएशन ऐसी थी कि ताला ख़ुद ही लगा रह गया हो जैसे। बाहर गली सूनी थी। दूर, खेत्री की सड़क पर, कोई पुरानी गाड़ी खड़ी थी, बोनट पर धूल।
मैंने साइकिल उठाई। सुमन पहले ही पैदल निकल चुकी थी।
तबादला दफ़्तार तीन ज़मीन के बाद, साइड के मकान में था। सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरा सिर फिर घूमा। सुमन ने ऊपर से पुकारा। “जल्दी!”
कमरे में एक आदमी बैठा था — पचास के आसपास, सफ़ेद कमीज़, चश्मा, सामने फ़ाइलों का ढेर। बगल में एक कुर्सी खाली थी, जिस पर एक मोटी काली कॉपी रखी थी। उसकी एक डंडी चश्मे के पीछे फँसी थी।
“डॉक्टर सुमन?” उसने सिर नहीं उठाया।
“मेरी फ़ाइल निकालो।”
“कौन सी फ़ाइल?”
“तबादले की। जो आज फ़ाइनल हो रही है।”
उसने आँख उठाई। “फ़ाइल तो ऐसे नहीं मिलती।”
“मैं जानती हूँ कि कौन लाइन पर बैठता है,” सुमन ने कहा। “अब निकाल।”
वो उठा। पीछे की आलमारी खोली। देर तक खोजता रहा। एक फ़ाइल बाहर निकाली, आधी, फिर वापस रख दी।
“यह क्या कर रहे हो?” सुमन ने कहा।
“फ़ाइल इधर नहीं है।”
“झूठ मत बोल।”
“झूठ नहीं बोल रहा, डॉक्टर साहब।” उसने चश्मा उतारा। उसकी आँखें छोटी थीं और थकी हुई। “कल रात इसी दफ़्तार में कोई आया था। दो आदमी थे। एक मोटी कॉपी लिए था। उस कॉपी में से उन्होंने तुम्हारी फ़ाइल निकाली और अपने बैग में रखी।”
“और तुम कुछ नहीं बोले?”
“मैंने बोलना चाहा।” उसने अपनी उँगली उठाई। “वो आदमी — जो मोटी कॉपी लिए था — कुछ लिखकर दे गया। और कह गया — अगर मैंने किसी से कुछ कहा, तो अगली बार मेरी बेटी का नाम उस कॉपी में आ जाएगा।”
सुमन कुर्सी पर बैठ गई।
“वो कौन था?”
“नाम नहीं बताया।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “पर उसकी उँगली पर अँगूठी थी। मोटी। पीतल की।”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ ठंडे हो गए।
“एक शर्त पर,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी फ़ाइल का सबूत दे सकता हूँ। यह मेरे हाथ का लिखा हुआ है — जो उन्होंने लिखकर दिया।” उसने मेज़ की दराज़ खोली। एक पीली पर्ची निकाली।
सुमन ने उसे लिया। पढ़ा। फिर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
उस पर लिखा था, बड़े अक्षरों में — “जो दीवार में है, वो दीवार से बाहर नहीं आएगा। फ़ाइल इसकी गवाही देगी।”
वही लाइन। वही जो मुझे घर के दरवाज़े पर मिली थी। लिखावट वही नहीं थी पर साँस वही थी।
“तुम काग़ज़ कॉपी कर सकते हो?” मैंने पूछा।
“कर सकता हूँ। पर फ़ायदा क्या? फ़ाइल गई।”
“फ़ायदा यह है,” मैंने कहा, “कि काग़ज़ का काग़ज़ मिलता है।”
वो मुझे देखता रहा।
“तुम्हारा काम इतना,” सुमन ने कहा। “इस पर्ची की तीन कॉपी। एक मेरे हाथ में। एक मेरे सुपरिंटेंडेंट को। एक अदालत में। तारीख़ आज की। और तुम्हारा नाम गवाह में।”
“मुझे डर है।”
“और मुझे नहीं है?” सुमन उठी। “तेरे बच्चे का नाम उस कॉपी में आ गया था। अब तेरा नाम मेरी फ़ाइल में जाएगा। तेरी मर्ज़ी।”
कमरे से बाहर निकलते वक़्त उसने पीछे से पुकारा।
“डॉक्टर साहब।”
“हाँ?”
“यह बात उन्होंने भी नहीं बताई थी। मुझसे ग़लती हुई। मुझे माफ़ करो।”
सुमन दरवाज़े पर रुकी।
“माफ़ी अपनी जगह है,” उसने कहा, “पर पहले नाम लिख।”
नीचे गली में धूप की पतली लकीर आ गई थी। मेरा सिर कम हो रहा था।
“तू अब घर जा,” सुमन ने कहा। “मैं सीधे अदालत जाऊँगी। हरीश चंद्र को काग़ज़ दिखाऊँगी। और हाँ —” उसने मेरी पट्टी पर उँगली रखी, “— इसे बदलवा।”
“अदालत से पहले हवेली जाना है।”
“क्यों?”
“क्योंकि पुजारी का तहखाना बंद नहीं होगा अगर भैया पहले पहुँच गया।”
सुमन एक क्षण रुकी। “तेरे पास चौथी चाबी है?”
“नहीं।”
“तो?”
“चौथी चाबी किसी 'सबसे ईमानदार' के पास है।”
“यह पागल आदमी है,” सुमन ने कहा। फिर उसने मेरा कंधा पकड़ा। “तो वो ईमानदार कहीं मिलेगा? वरना तहखाना बंद ही रहेगा।”
“एक इशारा है,” मैंने कहा। “और इशारा माँ की तरफ़ है।”
“तो जा।” उसने मेरा हाथ छोड़ा। “शाम तक मैं अदालत में हूँ। अगर तू न आया, तो मैं तेरे नाम के बिना गवाही नहीं दूँगी।”
“मेरे नाम के बिना?”
“क्योंकि तू शुरू में खड़ा था।”
मैं हँसा। सिर फटा, माथा सूजा, और हँसी आई। “तू अजीब औरत है, सुमन।”
“जा,” उसने कहा।
मैं साइकिल पर बैठा। रास्ते में गली के मोड़ पर रघुवीर खड़ा था। उसके हाथ में लाठी, और लाठी के साथ एक काग़ज़ लिपटा हुआ।
“सुना?” मैंने कहा।
“सुना।” उसने काग़ज़ आगे किया। “पुजारी ने इस सुबह हरीश चंद्र के पास भिजवाया।”
मैंने खोला। हरीश चंद्र की लिखाई थी, छोटी और साफ़ — “तहखाने का काग़ज़ बंद है। पर उसका एक दरवाज़ा अदालत की तरफ़ खुलता है। तीन बजे से पहले तीनों ताले खुले होने चाहिए, वरना भवानी आज शाम लोहे का सामान भिजवा देगा — जिसे उसने 'मरम्मत' का नाम दिया है।”
“मरम्मत?”
“तीन बजे मज़दूर आएँगे।”
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।
“घर चल,” मैंने कहा। “माँ से सीधा पूछना है।”
घर पहुँचे। दरवाज़ा खुला। माँ चारपाई पर बैठी थी और सामने उसी कुर्सी पर, जहाँ सुबह सुखराम बैठा था, आज कोई और बैठा था। पतला, साठ के आसपास, कंधों पर शॉल।
मैंने उसे देखा और मेरा पैर रुक गया।
“यह कौन है, माँ?”
माँ ने सिर उठाया। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो सुबह था। उसकी आँखों में सिर्फ़ थकान थी — वर्षों की।
“बैठ,” उसने कहा।
“माँ, यह कौन है?”
“यह वो है,” माँ ने कहा, “जिसके पास चौथी चाबी है।”
मैं उस आदमी की तरफ़ मुड़ा। उसने शॉल ठीक की और मुस्कुराया — धीमी, पुरानी मुस्कान, जैसे कोई रोज़ देखी चीज़ हठात सामने आ जाए।
“बैठ जा, बेटा,” उसने कहा। “तेरे पैरों की आवाज़ से पता चल रहा है, तू बहुत चल आया।”
“तू कौन है?”
“मेरा नाम किशोरी लाल है।” उसने एक पल रुककर कहा, “और मैं तेरे पापा का भाई हूँ।”
मैं साइकिल का हैंडल छोड़कर खड़ा रह गया। सड़क पर कोई गुज़र रहा था, कोई गाड़ी का हॉर्न बजा, पर कमरे की हवा रुक गई थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno