The Token System – Chapter 735
फ़र्श ठंडा था। पत्थर जैसा ठंडा। मेरे माथे पर कोई चीज़ बह रही थी — गरम, चिपचिपी। आँख खोली तो सफ़ेद छत दिखी, ऊपर पंखा घूम रहा था, और कान में एक आवाज़ घुस रही थी, दूर से, जैसे कुएँ से कोई बुला रहा हो।
“अस्पताल। आपातकाल। जान बचानी है।”
टोकन। जेब में जल रहा था। जल रहा था तो बुरी तरह — जैसे कोई चुटकी लेकर मांस पकड़ रहा हो।
मैं उठा। दीवार पकड़ी, दीवार ने साथ नहीं दिया, मैं फिर बैठ गया। रिकॉर्ड कमरा। रैक के पीछे की जगह। वो जाली। सिर के पीछे हाथ लगाया तो उँगली गीली हुई।
“जान बचानी है।”
“हाँ, चिल्लाने की ज़रूरत नहीं,” मैंने कहा। ज़ोर नहीं आई आवाज़ में। धूल में घुटने टेककर उठा। सीढ़ियाँ। नीचे जाना है।
सीढ़ियों के मोड़ पर एक नर्स मिली। गोरी, छोटी, हाथ में पट्टी का रोल।
“अरे! तुम्हारा सिर —”
“रास्ता छोड़ो,” मैंने कहा, और उसके हाथ से पट्टी खींच ली। भागता हुआ ही लपेट ली, आधी गर्दन पर, आधी माथे पर। वो मेरे पीछे कुछ बोलती रही।
नीचे का गलियारा भरा हुआ था। कोई रो रहा था। कोई गाड़ी का नंबर बोल रहा था।
और फिर मैंने स्ट्रेचर देखा।
लड़का। दस-ग्यारह साल का होगा। शर्ट पीली थी पर अब पहचान नहीं रही थी। सिर पर कपड़ा रखा था, वो लाल हो चुका था। आँख बंद। हाथ खुले।
स्ट्रेचर के दोनों तरफ़ एक औरत और एक आदमी चल रहे थे। औरत के पैरों में चप्पल भी नहीं थी। आदमी लड़खड़ा रहा था।
और उनके आगे-आगे एक आदमी था। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में ब्रीफ़केस।
“साइड, साइड!” वो चिल्ला रहा था। “गाड़ी तैयार है! होम में सेट है!”
मैं उसके रास्ते में खड़ा हो गया।
“यह बच्चा यहाँ से नहीं जाएगा।”
सफ़ेद कुर्ते वाले ने रुककर मुझे देखा। पहले मेरा मुँह देखा, फिर मेरा सिर — खून से भीगी पट्टी। फिर हँसा।
“हट।”
“नहीं हटूँगा।”
उसने धक्का दिया। मैं गिरा। घुटने के बल। सिर में अंधेरा आया और चला गया। मैंने हाथ बढ़ाकर स्ट्रेचर का पहिया पकड़ लिया।
“छोड़!” वो चिल्लाया।
“यह सरकारी अस्पताल है,” मैंने कहा, पहिये से चिपके हुए। “यहाँ मरीज़ का काग़ज़ पहले बनता है, फिर कहीं जाता है। यह अभी भर्ती नहीं हुआ।”
“तेरे बाप का अस्पताल है?”
“नहीं। तेरे बाप का भी नहीं है।”
लड़के की माँ ने एक शब्द कहा। सिर्फ़ एक। “बचाओ।”
और मेरे पीछे से आवाज़ आई, ज़ोर की, साफ़ काटती हुई।
“क्या हो रहा है यहाँ?”
सुमन। सफ़ेद कोट, हाथ में दस्ताने का एक पीस, आँखों में वो भाव जो किसी भी औरत में होता है जब वो तीन रात से नहीं सोई हो और चौथी रात भी सोने नहीं दे रहे हों।
सफ़ेद कुर्ते वाले का लहजा बदला। “डॉक्टर साहब, मरीज़ को होम ले जा रहे हैं। परिवार की मर्ज़ी है।”
“किसकी मर्ज़ी?” सुमन ने उसकी तरफ़ देखे बिना कहा। वो सीधे बच्चे के पास गई। कपड़ा उठाया। देखा। “यह बच्चा अभी ऑपरेशन टेबल पर जाएगा।”
“पर डॉक्टर —”
“मरीज़ मेरा है।” सुमन ने सफ़ेद कुर्ते वाले की आँख में आँख डाली। “इसे छूने की कोशिश की, तो तेरी गाड़ी का काग़ज़ अस्पताल में जमा हो जाएगा — सीधा पुलिस के पास। और तू जानता है न, मेरे हाथ में आजकल काग़ज़ बहुत हैं।”
सफ़ेद कुर्ते वाले ने मुँह खोला। बंद किया।
“आपका नाम?” सुमन ने पूछा।
“मैं… मैं तो बस —”
“नाम?”
“ये… होम का काम है। मैं तो लाने आया था।”
“तो वापस जा। और जिसने भेजा है उससे कह — आज से इस अस्पताल का एक भी मरीज़ बिना मेरे हस्ताक्षर के बाहर नहीं जाएगा।”
वो पीछे हटा। एक बार सुमन को देखा, एक बार मुझे। फिर ब्रीफ़केस पकड़कर तेज़ी से निकला। दो और आदमी, जो दीवार से चिपके खड़े थे, उसके पीछे चले गए।
सुमन ने स्ट्रेचर के पास खड़े कर्मचारियों को डाँटा। “क्या देख रहे हो? ऑपरेशन थियेटर खाली करो। ब्लड बुलाओ। जल्दी!”
स्ट्रेचर चला। मैं पहिये से चिपका रह गया। सुमन ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“तू भी चल।”
“मैं ठीक हूँ।”
“तेरा सिर फटा है और तू ठीक है?” उसने चलते-चलते कहा। “बैठ।”
“मरीज़ को देख —”
“मरीज़ मेरी ज़िम्मेदारी है। तू मेरी आँख में खून लगाकर रोड पर गिरेगा, तो मुझे किस पर बोलूँगा?” उसने मेरी कलाई पकड़कर बेंच पर बिठा दिया। “बैठ।”
मैं बैठ गया। अब सिर में चक्कर आ रहा था। टोकन जेब में फिर मिला — ठंडा।
बच्चे की माँ मेरे पास आई। मेरे पैरों के पास बैठ गई। कुछ नहीं बोली। बस बैठ गई।
“तुम्हारा नाम?” मैंने पूछा।
“कमला।”
मैंने उसे देखा — कमला देवी नहीं, कोई और औरत, कोई और कमला — पच्चीस-तीस के बीच, सूखा चेहरा, हाथ में जो पकड़ा था वो एक फटा हुआ फ़ोटो था।
“बच्चा कैसे हुआ?”
“गिर गया,” उसने कहा। आवाज़ सूखी थी। “स्कूल के पास। मोटर ने धक्का दिया। मैंने उसे यहाँ लाया। फिर वो सफ़ेद कुर्ते वाला आ गया — कहने लगा सरकारी अस्पताल में सुविधा नहीं, होम चलो, वहाँ डॉक्टर बड़ा है।”
“तू मान गई?”
“मेरे पास क्या था?” उसने फ़ोटो उन्नीस से मेरी तरफ़ बढ़ाई। “मेरे पास सिर्फ़ यह था। फ़ोन भी नहीं।”
फ़ोटो में एक लड़का खड़ा था, वही लड़का, फटी शर्ट में, एक हाथ में बस्ता।
“यह कौन?”
“मेरा सोहन।” उसने फ़ोटो सीने से लगा लिया।
और मुझे पीछे से रामदीन की आवाज़ याद आई — “अस्पताल में इन दिनों भवानी के होम भेजने का धंधा चल रहा है।” हर घायल। हर मरीज़। एक दिखावा, एक गाड़ी, और ज़िंदगी भर का ज़ख्म।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। “सोहन बचेगा।”
“ऐसे क्या बोल देते हैं?”
“क्योंकि सुमन ने ऐसा कहा है,” मैंने कहा। “और सुमन जो कहती है, वो करती है।”
आधा घंटा। एक घंटा। नहीं पता। मैं बेंच पर बैठा था, सिर पर पट्टी, और गली के दरवाज़े से धूल उड़ती दिख रही थी। बंसी आया। बंसी का चेहरा देखकर ही लगा जैसे उसने भी कुछ ऐसा देखा है जो कोई नहीं देखता।
“मन्नू, तू ठीक है?” उसने मेरा सिर छुआ।
“जान बच रही है,” मैंने कहा। “मरीज़ की।”
वो मेरे पास बैठ गया। “और वहाँ कमरे में —”
“छत से आई,” मैंने कहा। “रामदीन ने ही भेजी होगी।”
“रामदीन नहीं था, मन्नू।” बंसी ने धीरे से कहा।
“क्या?”
“वो मैंने सुना।” उसने बाहर की तरफ़ देखा। “आवाज़ बदली थी। और जो भागा, वो लंगड़ा रहा, पर रामदीन लंगड़ाता नहीं।”
“तो कौन?”
“जो अदालत में तेरे पीछे खड़ा था। जिसका हाथ जेब में था।”
“भैया?”
बंसी ने कुछ नहीं कहा।
मेरे हाथ में फ़ोटो आई — सोहन की। मैंने उसे जेब में रखा। माँ के पास जाना है। उन्हें पूछना है — इस घर में कौन सा 'ईमानदार' है, जिसका नाम चौथे ताले की चाबी के साथ जुड़ा है।
डॉक्टर सुमन के जूते की आवाज़ आई और मैंने सिर उठाया। उसके चेहरे पर वो चीज़ नहीं थी जो लोग सोचते हैं — किसी की जान बचाने के बाद वाली जीत। उसके चेहरे पर करीब-करीब खालीपन था। थकान इतनी कि भावना तक बची नहीं थी।
“बच गया,” उसने कहा।
कमला ने सुना। वो ज़मीन पर बैठ गई, दोनों हाथ मुँह पर रखकर, और सोहन की फ़ोटो उसकी गोद से गिर गई।
“पर अगले चौबीस घंटे बाहर नहीं जाएगा,” सुमन ने कहा। “और मैंने जो काग़ज़ अस्पताल में जमा करवाए, उनमें सबसे ऊपर वही सफ़ेद कुर्ते वाला है। मैंने उसकी गाड़ी का नंबर लिया।”
“उसकी गाड़ी पर नंबर था?” बंसी ने पूछा।
सुमन ने अपनी जेब से कोरा काग़ज़ निकाला। ऊपर कुछ लिखा था — जल्दी में लिखा, धुंधला। “होम की गाड़ियाँ मेरी ही गाड़ियाँ हैं, मेरे हिसाब में दर्ज हैं।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “सिर्फ़ एक का नाम हटा है। और यह किसी ने मेरे पैन से नहीं किया।”
“क्या हटा है?”
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