The Token System – Chapter 731
“मैं इसे पंद्रह साल से रखे हुई हूँ,” लक्ष्मी ने कहा। “रामदीन भी जानता है कि यह मेरे पास है। इसीलिए वो मुझे मारने से डरता है। अगर मैं मरी तो यह काग़ज़ उसके हाथ नहीं आएगा — कोई और उठा लेगा।”
“कौन और?”
“जो उस रात पापा के साथ था,” लक्ष्मी ने कहा।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। उसका चेहरा एक पल के लिए किसी और का हो गया। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।
“सुखिया,” बंसी ने कहा।
लक्ष्मी ठिठकी। “तू जानता है?”
“मुझे नहीं मालूम,” बंसी ने कहा। “पर मेरे पास सुखिया का आख़िरी ख़त है, और उसमें यही लिखा है — ‘अगर मैं न लौटूँ, तो जो चीज़ मेरे पास है, वो बाबा से बड़ी है।’”
लक्ष्मी ने लंबी साँस ली। उसकी आँखें भर आईं।
“तो तू वो है,” उसने कहा। “बंसी — वो बंसी, जिसका नाम सुखिया ने लिखा था।”
“तू सुखिया को जानती है?” बंसी ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई।
“सुखिया मेरे साथ रामदीन के घर में रहती थी,” लक्ष्मी ने कहा। “एक साल। फिर रामदीन ने उसे बसवा भेज दिया। जब वो गई, तो उसने मेरे कान में कहा था — ‘लक्ष्मी, जिस दिन मन्नू अपने पापा का हिसाब माँगने आए, उस दिन मेरा नाम याद करना।’”
अब सुखराम उठा। उसने लाठी को पकड़ा और उसी की नोक से ज़मीन पर एक लकीर खींची।
“यह लाइन,” उसने कहा, “मेरे पापा की लाठी की है। मैं इसे नहीं पहचानता। पर मेरे पापा ने मरने से पहले एक बार कहा था — ‘दूसरा ताला उस औरत के पास है जो बच्चा छीनकर लाई थी।’”
लक्ष्मी ने सिर झुकाया।
“हाँ,” उसने कहा। “मैंने ही तेरे पापा का बेटा छीना था। जब उन्होंने मुझसे कहा था — इसे ले जा, भवानी के आदमी इसका नाम मिटा देंगे। मैंने बच्चा छीनकर अपनी बहन के पास छिपाया। वो तेरा भाई था — और वो अब भी है। पर उसे कभी जानने मत देना। जिस दिन वो जान जाएगा, उस दिन उसे भी वही चीज़ होगी जो तुझे हुई।”
मेरा दिमाग़ चकराया।
“मैं कुछ नहीं समझा,” मैंने कहा।
“इसी तरह रहने दो,” लक्ष्मी ने कहा। “अभी सिर्फ़ एक बात सुन।”
वो मेरे करीब आई, कान के पास झुकी।
“अगर कल तेरा सब सच जुड़ गया और तुझे कोई नाम बताऊँ जो हवेली के काग़ज़ में तीसरा है, तो याद रखना — वो नाम किसी पापा का नहीं, उस बेटे का है जिसे उसने ज़िंदा रखने के लिए अपना नाम मिटाया।”
मैंने सिर उठाया। गाड़ी के पीछे लिखा निशान अब भी वहीं था।
“यह निशान?” मैंने पूछा।
“यह रामदीन का नहीं,” लक्ष्मी ने कहा। “यह हरि सिंह का है। और हरि सिंह ज़िंदा है। जब तक यह निशान उभरता है, जान लेना कि हरि सिंह ने ख़ुद उसे बनाया है।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “हरि सिंह? जो दस साल से मरा हुआ है?”
“कोई नहीं मरता,” लक्ष्मी ने कहा, “जब तक उसका हिसाब बाकी है।”
तभी सुखराम ने मेरी तरफ़ देखा और उसका चेहरा वैसा हो गया जैसा दुकान के पीछे बंसी का हुआ था।
“मन्नू,” उसने कहा। “तूने अभी याद किया — ‘केवल कौशल्या को’ वाली पर्ची। मेरे पिता की लाठी में यही पर्ची क्यों छिपी थी? क्योंकि वो पर्ची माँ को देनी थी। माँ को। पहले। बाकी बाद में।”
मैंने टोकन जेब में टटोला। ठंडा था। पर पिछली बार जब ठंडा हुआ था, तो अगली सुबह कुछ न कुछ होने वाला था। इस बार भी वही।
“अब सब सुनो,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने कानों में पहली बार भारी लगी। “अदालत सुबह दस बजे है। उससे पहले हमें दो चीज़ें करनी हैं। पहली — रघुवीर की गवाही को पक्का करना, और उसके बाद शेखर बाबू को भी। दूसरी — लक्ष्मी, तू मेरे साथ आएगी। तेरी गवाही उस आधी जली पर्ची के साथ दर्ज होगी।”
“और संदूक का दूसरा ताला?” बंसी ने पूछा।
“वो अदालत के बाद,” मैंने कहा। “क्योंकि अगर पहले खोला, तो रामदीन को खबर हो जाएगी और वो उसे रात में उठवा ले जाएगा।”
लक्ष्मी मुस्कुराई — पहली बार, सच में।
“पंद्रह साल बाद,” उसने कहा, “कोई तेरे पापा जैसा बोल रहा है।”
“तो ठीक है,” मैंने कहा, और उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। “तू चल। सुबह चार बजे तक तैयार रह।”
“मैं नहीं आऊँगी,” लक्ष्मी ने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि अदालत में जाते वक़्त मैं गवाह बनकर आऊँगी,” उसने कहा। “और जब तक मैं गवाह बनूँ, मैं अपने बेटे को ज़िंदा देखना चाहती हूँ। उसे चेतावनी देना है।”
“तेरा बेटा कहाँ है?”
“कल सुबह नौ बजे वो तहसील के पीछे वाले कमरे में आएगा।” उसने कहा। “क्योंकि उसे भी बुलाया गया है।”
“किसने?”
लक्ष्मी मुस्कुराई और गाड़ी की तरफ़ बढ़ गई।
“मैंने,” उसने कहा।
वो गाड़ी में बैठी। चाबी घुमाई। इंजन की आवाज़ वैसे ही उठी जैसे सुबह की पहली चाय की केतली से भाप उठती है। गाड़ी दूर हुई, पीछे धूल उठी, और धूल में फिर वो निशान बना — दो लकीरें, बीच में बिंदु।
बंसी मेरे बराबर आ खड़ा हुआ। उसने मेरी जेब में डिब्बा महसूस किया। कुछ नहीं बोला।
“तू डर रहा है?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा। “पर डरने से कोई चीज़ नहीं टलती, यह तेरे पापा ने सिखाया था।”
मैं हँसा। पहली बार उस दिन।
“पापा ने सिखाया था या नहीं, मुझे नहीं मालूम,” मैंने कहा। “पर आज मैं जान गया कि जब काग़ज़ नहीं बोलता, तब लाठी बोलती है। और जब लाठी नहीं बोलती, तब गाड़ी का हॉर्न।”
“और जब हॉर्न नहीं बोलता?” बंसी ने पूछा।
“तब मैं बोलता हूँ। सुबह अदालत में।”
हम घर लौटे। सुखराम लाठी लेकर अपने रास्ते चला। घर के दरवाज़े पर पहुँचे तो लालटेन जल रही थी — माँ जाग रही थी। रीना पलंग पर बैठी थी, और उसके हाथ में एक पीला लिफ़ाफ़ा था।
“यह सुबह दरवाज़े के नीचे से मिला,” उसने कहा। “माँ कह रही है — इसे तू खोल।”
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। ऊपर मेरा नाम नहीं, सिर्फ़ एक निशान — सीधा कोना-चिह्न। अंदर से एक पुरानी तस्वीर निकली — एक औरत, क़रीब पचास की, बैलगाड़ी के पहिये के पास खड़ी, हाथ में छोटा पीतल का डिब्बा। पीछे मेरी माँ की लिखाई — “कौशल्या। जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं।”
“माँ,” मैंने कहा, और आवाज़ धीमी निकली। “यह कौन है?”
माँ ने लालटेन की रोशनी में तस्वीर देखी। उसकी आँखें पहले बड़ी हुईं, फिर भर गईं। उसने तस्वीर मेरे हाथ से नहीं ली।
“यह मेरी माँ है,” उसने कहा।
“माँ तो यहाँ है — तू।”
“तेरी माँ,” माँ ने कहा, और उसका हाथ काँपा। “यानी तेरी नानी। यही गिरधारी देवी है। यही हवेली की चौथी हिस्सेदार है। और यही वो औरत है जो अपनी मौत ख़ुद तय करने बसवा गई थी। पर जो अभी भी ज़िंदा है — और जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा गया, क्योंकि हरि सिंह ने उसे मिटा दिया था।”
“तो फिर लक्ष्मी क्या है?” मैंने कहा, और आवाज़ किसी और की लगी। “लक्ष्मी ने ख़ुद को माँ का दोस्त बताया। कहा — उसने मुझे बचाया। कहा — मेरा एक भाई है।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर था — वैसा डर जो पहाड़ के नीचे कहीं दबा हो।
“यह सब मत पूछ,” उसने कहा। “अभी मत पूछ। अभी सिर्फ़ एक बात सुन।”
“क्या?”
“जो डिब्बा रात में मिला — उसे मत खोल।”
“मैंने तो खोल लिया, माँ।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने रीना से पानी माँगा, एक घूँट पिया और पलंग पर पीठ टिका दी।
“तो अब जो होगा,” उसने कहा, “वो होने देना। पर एक बात याद रख। अदालत में जब वो पर्ची पढ़ी जाए, तो उस पर्ची को फाड़ने वाले हाथों को ग़ौर से देखना। जो हाथ पर्ची को फाड़े, वो काग़ज़ को फाड़ेगा नहीं — वो किसी का नाम फाड़ेगा।”
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