The Token System722 / 1154

The Token System – Chapter 722

7 min read November 6, 2026

शेखर बाबू कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे, फिर बोले, "तू जानता है, भवानी साहब मुझे कल से कुछ कहने को नहीं दे रहे? मेरे बेटे को स्कूल से हटवाने की बात कर रहे हैं। मेरी बीवी आज सुबह रो रही थी। मैंने उससे कहा — एक हफ़्ता, बस एक हफ़्ता और।"

"आपने हिस्सा बाँट लिया," मैंने कहा, "कभी उनके साथ, कभी हमारे। मैं कुछ नहीं कहता। पर आज आपने जो शर्त मेरे आगे रखी, वो मेरे दादा का नाम नहीं था — वो आपकी तरफ़ से अंदाज़ा था कि मैं कितने का बिकूँगा।"

"मन्नू —"

"आप जानते हैं, मेरे दादा ने यह नाम किस लिए खड़ा किया था?" मैंने कहा। "उस दिन पत्थर के नीचे जो पर्ची मिली थी, उसमें सिर्फ़ एक लाइन थी — 'हिसाब किसी का नहीं, हिसाब ख़ुद एक आदमी है।' मेरे दादा ने कोई दौलत नहीं छोड़ी। उन्होंने एक हिसाब छोड़ा जो अब तक खुल रहा है। मैं उसे आपके हाथ में नहीं दूँगा।"

शेखर बाबू चुप खड़े रहे। फिर उन्होंने चश्मा पहना और बोले, "अदालत में जो पेश होगा, वो मेरे हाथ में नहीं। पर इतना कहता हूँ — तू सीधा खेल रहा है, और भवानी साहब सीधा खेलने वालों से डरते हैं। इसीलिए वो तुझे ख़त्म नहीं करते, तुझे झुकाना चाहते हैं। झुकता है तो बच जाता है, सीधा खड़ा रहता है तो उनके लिए ख़तरा है।"

"तो मैं सीधा खड़ा रहूँगा," मैंने कहा।

"फिर तो तुझे रामदीन से जल्दी मिलना होगा," शेखर बाबू ने कहा, और मुझे एक पर्ची थमा दी। "ये सुबह किसी ने मेरी मेज़ पर रख दी। मुझे पता नहीं किसने।"

पर्ची पर लिखा था — "अब तेरी जेब में जो है, वो किसी और की जेब में भी है। संभाल।"

मैंने पर्ची जेब में रख ली और शेखर बाबू से पूछा, "आपको कोई ऐसा मरीज़ याद है, जिसकी फ़ाइल अस्पताल से गायब हो गई हो? भवानी के होम में भेजने के बाद?"

शेखर बाबू रुके। फिर बोले, "तू सुमन से पूछ। वो इस साल के रजिस्टर देख रही है। मैं — मैं काग़ज़ों से दूर रहना चाहता हूँ अब।"

वो चले गए।

दोपहर बारह बजे सुमन मुझे इमरजेंसी के बाहर मिली। हाथ में शकुंतला देवी की फ़ाइल थी, जिसकी कॉपी उसने रात भर बनाई थी।

"एक और मामला है," उसने कहा, और मुझे चाय-विश्राम वाले कमरे की तरफ़ चलने का इशारा किया। वहाँ कोई नहीं था। उसने दरवाज़ा बंद किया और फ़ाइल खोली।

"ये तीन साल पहले की फ़ाइल है," सुमन ने कहा। "मरीज़ का नाम नहीं है। सिर्फ़ बेड, तारीख़, और भवानी के होम का नाम। इलाज के नाम पर कुछ लिखा नहीं, बस ट्रांसफ़र का स्टाम्प है। और उसके नीचे कोई टिप्पणी नहीं कि वो मरीज़ कौन था।"

"कोई भी मरीज़? अंदाज़ा?"

"पर्ची पर लिखी एक लाइन है — 'बसवा से आई, डॉक्टर बीरा ने भेजा।' अब ये डॉक्टर बीरा देवी कौन थीं, ये अस्पताल के किसी रजिस्टर में नहीं हैं। मैंने दो दिन से खोजा।"

मैंने फ़ाइल पढ़ी। अस्पताल का नंबर, बेड, तारीख़, और नीचे — भवानी नर्सिंग होम के कोने पर एक फीका नीला हस्ताक्षर, जिसमें सिर्फ़ "रा" पढ़ा जा सकता था।

"ये फ़ाइल अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड कमरे में है," सुमन ने कहा। "उसी रैक पर जहाँ शकुंतला की थी। तूने उस रैक में देखा था?"

"वहाँ तीन रैक हैं," मैंने कहा। "शकुंतला की फ़ाइल पहले वाले रैक में थी। बाकी दो में क्या है, देखा नहीं।"

"तो जा, ले आ," सुमन ने कहा। "मैं साथ चलूँगी। अब अकेले मत जा। उस दिन सिर पर लाठी पड़ी थी।"

मैंने हामी भरी। हम दोनों सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। रास्ते में सुमन मुझे ये भी बताती गई कि उसने बसवा के पुराने रजिस्टर के बारे में ज़िले के एक रिटायर क्लर्क को फ़ोन किया था, और उसने कहा था — "डॉक्टर बीरा देवी का नाम बसवा के रजिस्टर में था, फिर मिटा दिया गया। ये नाम किसी की माँ का था।"

"किसकी माँ?"

"पता नहीं," सुमन ने कहा। "पर जब भी नाम मिटाया जाता है, उसके पीछे कोई बेटा ज़रूर होता है। ये तो तू जानता है — कल की तेरी कहानी।"

हम दूसरी मंज़िल की ओर बढ़ रहे थे कि रिकॉर्ड कमरे के गलियारे में मुझे वो दिखा।

लाठी वाला बूढ़ा।

वो सीढ़ियों के मोड़ पर खड़ा था, सफ़ेद दाढ़ी, टोपी। जैसे ही मेरी नज़र पड़ी, वो मुड़ा। बीस साल का पुराना जूता फिर सीढ़ी पर टिका, और वो भागने लगा — सीढ़ियों की तरफ़, नीचे की तरफ़ नहीं, ऊपर की तरफ़।

"रुक!" मैंने पुकारा।

सुमन ने मेरी कलाई पकड़ी। "अकेले मत जा।"

पर मैं निकल चुका था।

उसकी लाठी सीढ़ियों पर खटखटा रही थी, कदम धीमे थे पर तेज़ निकल रहे थे। ऊपर की मंज़िल पर मुड़ा, फिर गलियारे के आख़िर में, और दीवार के सहारे रुक गया। मैंने उसे भागते देखा — दीवार पर कुछ बना रहा था — उँगली या कोयला, मुझे दूर से दिखा नहीं।

"रामदीन!" मैंने पुकारा। "रुक जा!"

वो ठिठका। फिर सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा और खड़ा हो गया। उसने लाठी दीवार से टिकाई और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में थकान थी, डर भी — पर डर भागने वाला नहीं, छिपने वाला।

"तू आ गया," उसने कहा।

"तू मुझे छोड़कर क्यों जा रहा था?"

"छोड़कर नहीं," उसने कहा। "मैं रास्ता खोलने आया था। रैक के पीछे जो दीवार है, वहाँ पत्थर निकला है। उसके पीछे तीन रैक और हैं। वो रैक अस्पताल नहीं, भवानी के हैं।"

"तू इन्हें कैसे जानता है?"

"क्योंकि मैं ये अस्पताल बनाते वक़्त से जानता हूँ," उसने कहा। "भवानी के पापा के ज़माने में मैं उनके पास तिजोरी पर बैठता था। तिजोरी खुलती थी तो हिसाब पहले मैं देखता था। यही चीज़ मुझे छिपकर रहने के लिए मजबूर कर गई।"

"तूने मुझे कुएँ पर बुलाया था — फिर आज यहाँ?"

"हाँ। मैंने सोचा था संदूक पहले खोलेंगे। पर तेरा टोकन कुछ और कह रहा हो, तो पहले काग़ज़ निकालो, फिर संदूक।"

"तू जानता था टोकन कहेगा रुक?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। "टोकन की आवाज़ मुझे सुनाई नहीं देती। बस इतना जानता हूँ कि जब वो रुकने को कहे, तब हर चीज़ ठहर जाती है — पत्थर, काग़ज़, हाथ। मैंने एक बार भवानी के पापा के हाथ में टोकन देखा था जब वो किसी को मारने वाले थे। टोकन गरम हुआ, और उनका हाथ ठहर गया। वो रुके, और मरने वाला बच गया।"

"अब क्या करना है?"

"अब वो दीवार खोलनी है जो तेरे और सच के बीच में है," रामदीन ने कहा। "पर एक शर्त है — जो उसमें मिलेगा, वो मेरा नहीं, तेरा भी नहीं। वो उस बच्चे का जिसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं है।"

"किसका बच्चा?"

"अभी नहीं," रामदीन ने कहा, और सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा। "पहले रैक। बाद में नाम।"

वो नीचे उतरने लगा, और उसके पीछे-पीछे मैंने दीवार पर देखा — जहाँ उसने हाथ फेरा था। दीवार पर कोयले से एक उलटा कोना-चिह्न बना था। मेरे टोकन के कोने के निशान से बिलकुल उलटा।

सुमन ऊपर आ चुकी थी, साँस फूली हुई। "वो कौन था?"

"रामदीन," मैंने कहा।

"जिसका नाम तेरे पापा की फ़ाइल में है?"

"वही," मैंने कहा, "जो मरा हुआ दिखाया गया, पर ज़िंदा है — और जो अब हमें एक तीसरे रैक तक ले जा रहा है।"

सुमन ने दीवार पर कोयले का निशान देखा। "ये तो तेरे टोकन का उलटा है।"

"मुझे भी यही लग रहा है," मैंने कहा। "और इसका मतलब ये नहीं कि ये निशान झूठा है — इसका मतलब ये भी हो सकता है कि ये निशान किसी और दिशा का है।"

"किस दिशा का?"

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, पर उस पर, पहली बार, एक नई लकीर की शुरुआत — एक छोटी सी, आधी — दिख रही थी।

"अभी पता नहीं," मैंने कहा। "पर पत्थर के पीछे का रैक अगर भवानी का है, तो वहाँ जो है, वो इस उलटे निशान की तरफ़ ज़रूर ले जाएगा।"

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