The Token System – Chapter 72
वह रुक गई। उसका चेहरा एकदम से पत्थर हो गया।
फाटक के बाहर सड़क पर एक सफ़ेद जीप रुकी थी। उससे दो आदमी उतरे — एक मोटा, काली शर्ट में, और एक पतला, जिसके हाथ में बेंत जैसी पतली लाठी थी।
मैंने उन्हें पहचाना। भवानी के आदमी। वही जो कल पीछे की गली में औरत को रोकने की कोशिश कर रहे थे।
"अबे, तू यहाँ?" मोटे ने कहा। उसकी नज़र थैले पर पड़ी। "और यह थैला?" उसने बूढ़ी औरत की तरफ़ देखा। "और तू! बुढ़िया, तू भवानी साहब की हवेली की नौकरानी है। तेरी चोरी?"
बूढ़ी औरत ठिठकी नहीं। उसने अपनी चादर ठीक की और सीधी उनकी तरफ़ देखा।
"चोरी?" उसने कहा। "जो चीज़ साठ साल मेरे हाथ में रही, वह चोरी है?"
"थैला दे इधर।"
मोटा आगे बढ़ा। उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा। मैंने पीछे हटकर थैला सीने से लगा लिया।
"तू करेगा क्या?" पतले ने लाठी उठाई।
इस बार बूढ़ी औरत आगे आई। उसने मेरे और उनके बीच खड़े होकर अपनी चादर फैला दी।
"इस लड़के को मत छूना!" वह चिल्लाई। उसकी आवाज़ अस्पताल की दीवारों से टकराकर लौटी। "यह हवेली का हक़दार है!"
दोनों रुक गए। मोटे का हाथ हवा में अटका रह गया।
"क्या बोली?"
"जो बोला, सुन लिया।" उसने मुझे अपनी पीठ से ढका। "तेरे मालिक ने हवेली का चौथा हिस्सा इसके दादा से छीना था। यह लड़का उसी हिस्से का हक़दार है। और आज सुबह से यह हवेली का हिसाब अपने पास रखता है। अब तू एक बार हाथ बढ़ा, और देख कि तेरे मालिक का क्या हाल होता है।"
पतले ने मोटे की तरफ़ देखा।
"साहब ने यह नहीं बोला था —"
"साहब को बोल देना," बूढ़ी औरत ने कहा, "कि जो थैला वह तलाशी में ढूँढ रहा था, वह मिल गया। पर वह उसके पास नहीं जाएगा। अदालत तय करेगी।"
मोटे का चेहरा बदला। उसने मेरी तरफ़ एक बार देखा, फिर पतले को कोहनी मारी।
"चल।"
"पर साहब —"
"चल, बोला न!" वे पीछे हटे, जीप में कूदे, और गाड़ी आवाज़ करती हुई निकल गई।
बूढ़ी औरत ने चादर सँभाली। उसकी साँस थोड़ी तेज़ चल रही थी, पर चेहरे पर वही पत्थर जमा था।
"तू अंदर जा," उसने कहा। "अब ज़्यादा देर मत कर।"
"तुम?" मैंने पूछा। "तुम साथ चलो। वे लौटेंगे —"
"मैं नहीं लौटूँगी।" उसने अपनी चादर उतारी और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "यह भी रख ले।"
"यह क्या —"
"यह चादर उसी सेठ के घर की है," उसने कहा। "जिस दिन मैं वहाँ आई थी, उस दिन यह मुझे दी गई थी। मेरी नहीं है। पर आज के बाद, जो भी इस हवेली का हिसाब लिखेगा, वह इसे ओढ़ेगा।"
मैंने चादर ली। वह भारी थी — हल्की, फिर भी भारी। उसमें वह बदबू थी जो पुराने कपड़ों में होती है, और उसमें एक अजीब सी महक भी थी — धूप में सूखी लकड़ी जैसी।
"अब जा।" उसने मुझे धकेला। "और अगली बार जब आएगा —" वह हँसी, "तो सीधा सामने के दरवाज़े से आ। पिछली बार की तरह छत से मत चढ़।"
"तुम कहाँ जाओगी?"
"मुझे कहीं नहीं जाना।" उसने अस्पताल की तरफ़ देखा। "बाहर वाले बरामदे में एक बेंच है जहाँ मरीज़ों के लोग बैठते हैं। मैं वहीं बैठूँगी। जब तू अंदर का सब काम निपटा ले, तब आकर मुझे बुला।"
मैं अस्पताल के अंदर गया, थैला सीने से लगाए, चादर कंधे पर। दालान में शेखर बाबू मिले। उनके हाथ में फ़ाइल थी और आँखों में वही डर, जो कल से था।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा। "तुम्हारा चेहरा?"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं सीधा उनके छोटे कमरे तक गया, दरवाज़ा बंद किया और थैला मेज़ पर रख दिया।
"यह देखिए।"
थैला खोला, बही निकाली।
शेखर बाबू ने बही की जिल्द पर उँगली रखी और एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने पन्ने पलटे — धीरे, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म खोल रहा हो। पहला पन्ना। उनका हाथ रुक गया।
"यह —" उनकी आवाज़ टूटी। "यह वही लिखाई है। सेठ गोवर्धनदास की।"
"आपने पहले देखी है?"
"मैंने इसका ज़िक्र सुना है," उन्होंने कहा। "मेरे पिता तहसील में क्लर्क थे। वह कहते थे — एक बही है जो हवेली की दीवार में रखी है। जिस दिन वह बाहर आएगी, उस दिन शहर का पूरा हिसाब बदल जाएगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे लगा वह बूढ़े की बात थी। पता नहीं था कि मैं ख़ुद उस दिन तक ज़िंदा रहूँगा।"
"इंद्रजीत बाबू?"
"हाँ।"
मैंने बही के पन्नों के बीच से पीतल का टुकड़ा निकाला और मेज़ पर रखा।
शेखर बाबू ने देखा और पीछे हट गए।
"यह —"
"भवानी के टोकन का टूटा कोना," मैंने कहा। "बूढ़ी औरत ने साठ साल पहले उठाया था।"
"तो अब —"
"अब हमारे पास सब कुछ है," मैंने कहा। "बही, टुकड़ा, रसीद, हरि सिंह की गवाही, गंगा के बच्चों के काग़ज़, विक्रम की गवाही। पर एक चीज़ है जो अब भी गायब है।"
"रजिस्टर।"
"रजिस्टर," मैंने कहा। "और वह हमारे बिना नहीं मिलेगा।"
शेखर बाबू ने अपना चश्मा उतारा और उसे साफ़ किया। हाथ धीमे थे।
"मैं एक बात कहूँ?" उन्होंने कहा। "रजिस्टर मैंने नहीं लिया था। पहले मैंने सोचा कि यह भवानी का काम है। फिर सोचा — भवानी को क्या ज़रूरत? वह तो रसीद माँग रहा था, रजिस्टर तो उसके पास ही आ जाता अदालत से। तो किसने लिया?" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "उसने जो लिया, उसने अपना बचाव किया। मतलब वह डरा हुआ था। मतलब वह भवानी के साथ है, पर भवानी से डरता है।"
"मतलब वह पलट सकता है।"
"या फिर वह पहले से पलटा हुआ है, और हम नहीं जानते।"
कमरे की खिड़की से बाहर का शोर आ रहा था — स्ट्रेचर की चरचराहट, किसी का रोना, दूर कहीं अम्बुलेंस की सीटी।
"बही कहाँ रहेगी?" मैंने पूछा।
"मेरे पास," शेखर बाबू ने कहा। "मेरी लॉकर में। तहसील वाले दफ़्तर की चाबी अब सिर्फ़ मेरे पास है — वह चाबी जो राजेंद्र ने कल मुझे दी थी।" उन्होंने बही उठाई और उसे अपने छोटे से लॉकर में रखा। "पर सुनो।" वे रुके। "यह बही जब सामने आएगी, तो भवानी सिर्फ़ पैसा नहीं हारेगा। उसका पूरा नाम — हरि सिंह का नाम, भवानी का नाम, उसके बेटे का नाम — सब हरेक पन्ने पर लिखा है। यह अदालत में खुलेगा, तो वह आदमी ज़िंदा नहीं रहेगा। समझ रहे हो न? वह जेल से भी बाहर नहीं निकलेगा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"और उसका बेटा?"
"विक्रम हमारा गवाह है," मैंने कहा। "उस पर कोई केस नहीं बनेगा।"
शेखर बाबू ने सिर हिलाया और लॉकर की चाबी जेब में डाली।
मैं बाहर आया। पीतल का टुकड़ा मेरी जेब में था। वह अब भी ठंडा था। मैंने सोचा — अगर भवानी का टोकन इस टुकड़े के साथ जुड़ जाए, तो क्या होगा? राजेंद्र के लिफ़ाफ़े में बंद टोकन क्या महसूस करेगा?
सीढ़ियों से उतरते हुए मैंने बाहर वाले बरामदे की तरफ़ देखा। बूढ़ी औरत बेंच पर बैठी थी, आँखें बंद, चेहरा धूप की तरफ़। जैसे वह साठ साल से इस धूप का इंतज़ार कर रही हो।
तभी मेरी जेब में ज़ोर की गरमाहट हुई।
मैं रुक गया। सीढ़ियों के बीच में। गरमाहट जेब से सीधी कलाई तक गई — जलने जैसी।
मैंने जेब से काग़ज़ निकाला, जो कल रात टोकन ने ख़ुद भेजा था।
उस पर लकीरें मिट रही थीं। "वह औरत ही असली है" धुँधला हो रहा था। उसकी जगह नई लकीर उभर रही थी, अक्षर मोटे और साफ़।
"आज नौ बजे, हवेली। तीन टुकड़े, एक मेज़। और वह आदमी जो रजिस्टर ले गया — वह ख़ुद आएगा।"
मैंने लकीर पढ़ी और दोबारा पढ़ी। नौ बजे। हवेली। वह आदमी ख़ुद आएगा।
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