The Token System – Chapter 73
मैंने बाहर बेंच की तरफ़ देखा। बूढ़ी औरत ने आँखें खोल ली थीं और मुझे देख रही थी।
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और बाहर जाकर उसके पास खड़ा हो गया।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"नौ बजे हवेली चलना है," मैंने कहा। "और तुम्हें भी।"
"मुझे?" उसने सिर उठाया। "क्यों?"
"क्योंकि टोकन कह रहा है — आज वह आदमी ख़ुद आएगा जिसने रजिस्टर लिया था।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "और तुम वहाँ रहोगी, तो वह डरेगा। तुम्हें देखकर डरेगा।"
उसने कुछ सोचा। फिर अपनी सूखी हँसी हँसी।
"साठ साल बाद," उसने कहा, "वह कमरा फिर खुलेगा। और इस बार मैं सामने के दरवाज़े से जाऊँगी, छुपकर नहीं।"
मैंने बाहर देखा। सुबह की धूप अस्पताल की दीवार पर चढ़ रही थी। गली में एक ऑटो गुज़रा। फाटक के बाहर कुछ मरीज़ों के लोग बैठे थे, चाय के काग़ज़ी गिलास हाथों में।
और मेरी जेब में काग़ज़ अभी भी गरम था, जैसे पीतल का टुकड़ा, जो अब भी उस थैले में था — उस काग़ज़ तक अपनी आवाज़ भेज रहा हो।
मैंने बूढ़ी औरत की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"चलिए," मैंने कहा। "दो घंटे बाकी हैं। रास्ते में बंसी की दुकान पर चाय पी लेंगे।"
वह उठी। उसकी हड्डियाँ चटकीं। उसने मेरा हाथ पकड़ा — ठंडा हाथ, सूखी उँगलियाँ।
"एक बात याद रख," उसने चलते-चलते कहा। "जो आदमी ख़ुद आएगा — वह डरा हुआ है। डरा हुआ आदमी सबसे पहले अपनी ग़लती बताता है। सुन लेना, पर उस पर तरस मत खाना।"
"क्यों?"
"क्योंकि वह तरस के लायक होगा," उसने कहा, "और तरस उस दिन सबसे महँगी चीज़ होगी।"
हम अस्पताल के गेट से बाहर निकले। धूप चेहरे पर लगी। सड़क पर भीड़ बढ़ रही थी।
और मुझे लगा — आज के बाद कुछ भी वैसा नहीं रहेगा। न भवानी, न हवेली, न वह कमरा, जिसमें सब शुरू हुआ था।
॥
दो आदमी बूढ़ी औरत के दोनों तरफ़ खड़े थे। उनमें से एक ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“बहुत हो गया,” उसने कहा। “अब चलो, ठाकुर साहब बुला रहे हैं।”
मैंने उसकी कलाई नहीं छोड़ी। बूढ़ी औरत ने भी नहीं। वह खड़ी थी, सीधी, और उसकी आँखों में डर नहीं था।
“ठाकुर साहब को बोल देना,” बूढ़ी औरत ने कहा, “कि मैं आ गई हूँ। साठ साल बाद।”
आदमी ने उसका हाथ झटका। “यही बोलेंगे। और यह भी बोलेंगे कि तेरे साथ यह लड़का भी है।”
दूसरा आदमी मेरी तरफ़ झुका। उसकी साँस से पुरानी शराब की बू आ रही थी।
“मनोहर,” उसने धीरे से कहा, “ठाकुर साहब ने तुझे चार बार छोड़ा है। चार बार। पाँचवीं बार उनका सब्र टूटेगा, तो तेरी नहीं, तेरी बहन की शादी की बात उठेगी।”
“फिर उठेगी,” मैंने कहा।
वह एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर हँसा और पीछे हट गया। दोनों गली के मोड़ तक गए और एक पीली जीप में बैठकर चले गए।
बूढ़ी औरत ने अपना कलाई का कपड़ा ठीक किया।
“पाँचवीं बार?” मैंने पूछा।
“मेरा भी यही हिसाब है,” उसने कहा। “साठ साल में पाँचवीं बार उनका आदमी मेरा हाथ पकड़ रहा है। पहली बार मैं सोलह की थी।”
हम अस्पताल की दीवार छोड़कर सड़क की तरफ़ बढ़े। उसने धीरे चलना शुरू किया, एक हाथ मेरे कंधे पर, दूसरा थैले पर। रास्ते में एक फल वाला था जो अमरूद छील रहा था। बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ़ देखा, फिर आगे देखने लगी।
“बंसी की दुकान दूर है?” उसने पूछा।
“कुछ ही दूरी। पाँच मिनट।”
“पाँच मिनट में मैं तुम्हें एक बात बता दूँगी,” उसने कहा। “साठ साल में जो सीखा, वो पाँच मिनट में।”
“बोलिए।”
“ठाकुर भवानी सिंह से कभी बात मत हारना,” उसने कहा। “जब वह ग़ुस्से में हो, चुप रहना। जब वह शांत हो, डरना।”
“क्यों?”
“क्योंकि ग़ुस्से में वह ग़लती करता है। शांत होकर वह अपना काम करता है।”
बंसी की दुकान पर पहुँचे तो सुबह की चाय की भीड़ थी। तीन आदमी बेंच पर बैठे थे, बंसी चूल्हे के पास झुका था। उसने हमें देखा और चम्मच हाथ से रख दिया।
“अरे!” वह दौड़कर आया। “यह कौन हैं?”
“यही तो,” मैंने कहा। “असली वाली।”
बंसी एक पल रुका। फिर उसने आदर से अपनी चौकी हटाई और दुकान के पिछले हिस्से की तरफ़ इशारा किया, जहाँ एक छोटी मेज़ थी और दो कुर्सियाँ।
“अंदर आ जाओ,” उसने कहा। “चाय मैं लाता हूँ।”
“तीन कप,” बूढ़ी औरत ने कहा। “और जो भी बाकी आएँ, उनके लिए भी।”
बंसी ने मुझे देखा। मैंने सिर हिलाया।
बूढ़ी औरत ने थैला मेज़ पर रखा। उसका हाथ थैले के मुँह पर रुका। फिर उसने धागा खोला।
थैले में एक जर्जर मोटी बही थी, लाल जिल्द की, जिसके कोने फटे थे और किनारे कालिख जैसे पड़े थे। बूढ़ी औरत ने उसे बाहर निकाला और मेज़ पर सीधा रखा।
“यह है,” उसने कहा। “सेठ गोवर्धनदास की बही। साठ साल की। मैंने इसे अपनी चारपाई के नीचे ईंट के नीचे रखा था। वह ईंट अब भी वहीं है, ऊपर सफ़ेदी कर दी है।”
बंसी चाय लेकर आया और मेज़ पर रख दी। तीन कप। वह भी खड़ा हो गया।
“बैठो,” बूढ़ी औरत ने कहा। “यह तुम्हारा भी हिसाब है, बंसी।”
बंसी बैठ गया। उसका चेहरा गंभीर था, जो मैंने पहली बार देखा।
बूढ़ी औरत ने बही खोली। पन्ने भूरे पड़ गए थे, स्याही कहीं हल्की थी, कहीं मोटी। पहले पन्ने पर ऊपर एक नाम लिखा था और नीचे एक लकीर।
“यह देखो,” उसने उँगली रखी। “‘भवानी सिंह। पहला काम।’”
“भवानी सिंह का?” बंसी ने आगे झुका।
“नहीं,” बूढ़ी औरत ने कहा। “यह भवानी का दादा नहीं। यह भवानी का चाचा था। अलग भवानी सिंह। असली नाम। और नीचे लिखा है — ‘अपने ही चाचा की ज़मीन का काग़ज़ अपने नाम करवाना।’”
मेरा हाथ चाय के कप पर रुक गया।
“मतलब?” मैंने पूछा।
“मतलब यह,” बूढ़ी औरत ने कहा, “कि जिस आदमी ने आज आधे शहर से ज़मीन ली है, उसके दादा ने सबसे पहला काम अपने ही चाचा की ज़मीन का काग़ज़ अपने नाम कराने से शुरू किया था।”
बंसी का चेहरा काला पड़ गया। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने मेज़ पर हाथ रखा और हँसा — वह हँसी नहीं थी, खाँसी जैसी।
“मेरे पिता,” उसने कहा। “मेरे पिता की ज़मीन। उसी तरह छीनी थी। वही चाचा का किस्सा मेरे घर में बार-बार आता था, पर मुझे कभी पता नहीं चला कि किसने छीनी। अब पता चला।”
दुकान के बाहर से किसी ने आवाज़ दी — “बंसी, चाय!” — और बंसी उठकर चला गया। वह लौटा तो उसकी आँखें लाल थीं। उसने बही अपनी तरफ़ खींची और पन्ने पलटने लगा।
“रुको,” बूढ़ी औरत ने कहा। “थोड़ा-थोड़ा। बही को कोई भी नहीं पढ़ सकता एक बार में। यह साठ साल का हिसाब है।”
“पर मैं—"
“मैं जानती हूँ,” उसने कहा। “मैंने इसे पहली बार पढ़ा था सोलह की उम्र में। तब भी इसने मुझे तीन रात सुलाया नहीं।”
तभी दुकान का दरवाज़ा खुला और शेखर बाबू अंदर आए। सफ़ेद कमीज़, हाथ में फ़ाइल, चश्मा नाक पर फिसला हुआ। उन्होंने सबको देखा और एक पल रुके।
“मनोहर,” उन्होंने कहा। “मैंने सुना तुम यहाँ हो। अस्पताल में हड़कंप है, भवानी के आदमी सुबह से घूम रहे हैं।”
“आ जाइए,” मैंने कहा। “बैठिए। यह देखिए।”
शेखर बाबू ने बही देखी। उनका चेहरा बदला। उन्होंने चश्मा ऊपर किया और बिना बैठे झुककर पढ़ने लगे।
“यह सेठ की बही है,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। “यह तो…”
“आप भी इसे पहचानते हैं?” बूढ़ी औरत ने कहा।
“मेरे पिता इसकी कॉपी करते थे,” शेखर बाबू ने कहा। “हवेली में। काम के बदले। फिर हवेली से हिसाब हड़प लिया गया और उन्होंने भी कॉपी बनानी बंद कर दी।”
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