The Token System – Chapter 711
“वो आएगा,” मैंने कहा।
हम बेंच पर बैठ गए। रात गहरी हो रही थी। सड़क पर कोई नहीं था। फाटक के पार अस्पताल की पुरानी इमारत की खिड़कियों में अंधेरा था।
पंद्रह मिनट बाद फाटक के पीछे से आवाज़ आई — लकड़ी के लाठी की आवाज़, ज़मीन पर।
मैं उठा। बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा।
“मन्नू,” उसने फुसफुसाया, “ये तेरी लिखाई में जो पर्ची आई, वो किसी ने तेरे हाथ से लिखवाई है।”
“हाँ?”
“मतलब वो तेरी आवाज़ में बोल सकता है। तेरी लिखाई लिख सकता है।”
“तो?”
“तो,” बंसी ने कहा, “ये भी सोच — जो भी आ रहा है, वो तेरे जैसा दिख सकता है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। उसकी बात मुँह में कड़वी लगी, पर सच थी।
लाठी की आवाज़ करीब आई। फाटक के पीछे से आकर एक आदमी खड़ा हुआ — लंबा, सफ़ेद कुर्ता, खुली लाठी। चेहरा अंधेरे में था।
“मनोहर?” उसने आवाज़ दी — रूखी, भारी।
“हाँ।”
“संदूक मिला?”
“मिला।”
“ताले पर निशान था?”
“था।”
“अब सुन,” उसने कहा और लाठी को बेंच के ऊपर रख दिया। “ये लाठी सुखराम के बाप की है। बिचले हिस्से में एक पीतल की नली है। उसे निकाल। उसमें चौथी चाबी है।”
“तुम कौन हो?” मैंने पूछा।
“मैं,” उसने कहा, “वही हूँ जो तुम्हारे पापा के साथ था। और जो उस रात के बाद से भवानी के पीछे-पीछे चल रहा है।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” उसने लाठी उठाई और बेंच पर टिकाकर मेरी तरफ़ झुका, “मैंने तेरे पापा को एक क़सम दी थी। और वो क़सम अभी पूरी नहीं हुई।”
“कौन सी क़सम?”
“यही,” उसने कहा, “कि जो हिसाब उन्होंने शुरू किया था, उसे उनका बेटा पूरा करेगा।”
वो पीछे हटा और लाठी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
“ले। और उससे पहले कि भवानी को पता चले कि लाठी किसकी है, इसे खोल।”
मैंने लाठी पकड़ी। वो काँप रही थी — या मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने सिर हिलाया।
लाठी का बिचला हिस्सा घुमाया। नली खुली। अंदर पीतल की छोटी सी चाबी थी — तीन दाँते। और उसके साथ एक मुड़ी हुई पीली पर्ची।
मैंने पर्ची खोली। पापा की लिखाई थी — “ये चौथी चाबी उस संदूक की नहीं, उस कमरे की है जिसमें संदूक रखा है। संदूक के नीचे की ज़मीन में पत्थर है। उसके नीचे जो है, उसे उठाना मत। उसे सिर्फ़ हिसाब उठाएगा।”
मैंने पर्ची श्यामू की तरफ़ बढ़ा दी और चाबी जेब में रखी।
“तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने उस आदमी से पूछा।
वो मुड़ा। उसने टोपी उतारी। सफ़ेद बाल। झुर्रियाँ। पर चेहरा — पहचाना हुआ।
“मैं रामदीन हूँ,” उसने कहा। “असली रामदीन। जिसे मरा हुआ माना गया। और जिसे भवानी आज तक अपने पास लाठी वाले के नाम से रखता है।”
श्यामू आगे बढ़ा। “भाई —”
“श्यामू,” रामदीन ने उसका कंधा पकड़ा। “माफ़ कर दे। मैं तुझे बताना चाहता था। पर भवानी के आदमी हर जगह हैं। अगर उसे पता चलता कि मैं ज़िंदा हूँ, तो वो मुझे वही कर देता जो उसने तेरे पापा के साथ किया था।”
“तू मरा नहीं था,” श्यामू की आवाज़ टूट रही थी।
“मैं मरा हुआ था,” रामदीन ने कहा। “भवानी की नज़र में। और वही काफ़ी था।”
मैंने बीच में कहा, “रामदीन, मेरे पास जो चौथी चाबी है, वो उस संदूक के नीचे के पत्थर की है। मेरे घर में संदूक रखा है, और उसके ताले पर मेरे टोकन का निशान है।”
“तो?”
“तो मुझे जानना है — भवानी को मेरे टोकन के बारे में कैसे पता चला?”
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर। असली डर।
“क्योंकि,” उसने धीरे से कहा, “भवानी के पास भी टोकन है। और वो दोनों टोकन —”
वो रुक गया।
“दोनों क्या?”
“दोनों एक ही हाथ से आए हैं,” उसने कहा। “और उस हाथ का नाम तेरे पापा ने कभी नहीं लिया।”
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो एकदम ठंडा था, पर जैसे ही रामदीन ने अपनी लाठी उठाई, टोकन पर सत्रहवीं लकीर के नीचे एक नया शब्द उभरा — “संदूक।”
और फिर, उसके नीचे, आधा मिटा हुआ नाम, जिसे मैं पढ़ नहीं पाया।
रामदीन ने टोकन देखा। उसने लाठी नीचे रखी।
“घर चल,” उसने कहा। “मुझे वो संदूक देखना है।”
हम तीनों — मैं, बंसी, श्यामू और रामदीन — मोहल्ले की तरफ़ चले। रास्ते में रामदीन ने कहा, “मन्नू, एक बात सुन।”
“हाँ?”
“तेरे घर में जो संदूक है, वो उस कमरे से आया है जिसका हिसाब आज तक कोई नहीं कर पाया।”
“कौन सा कमरा?”
“हवेली के नीचे, पुरानी नींव से भी नीचे,” रामदीन ने कहा। “और वहाँ जो है, वो टोकन का है — पर टोकन का नहीं भी है।”
“ये पहेली क्या है?”
“ये पहेली नहीं है, मन्नू,” रामदीन ने कहा। “ये हिसाब का वो हिस्सा है जो कभी किसी काग़ज़ पर नहीं आया।”
हम घर पहुँचे। दरवाज़ा खुला था। रीना दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखें लाल। माँ पीछे खड़ी थी, छड़ी के सहारे।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“वो — वो संदूक,” रीना ने कहा। “वो ख़ुद से हिल रहा था।”
“क्या?”
“अभी-अभी,” रीना ने कहा। “जब तुम आ रहे थे। माँ ने भी देखा।”
माँ ने सिर हिलाया।
मैं अंदर गया। संदूक वहीं था, मेज़ के पास, ज़मीन पर। पर अब उसके ताले पर वो निशान पहले से गहरा लग रहा था, जैसे अंदर से किसी ने धकेला हो।
रामदीन ने संदूक के पास जाकर घुटने टेके। उसने हाथ से लोहे को छुआ और फिर पीछे हट गया।
“ये वही है,” उसने कहा।
“क्या वही है?” मैंने पूछा।
“ये संदूक,” रामदीन ने कहा, “हवेली की उस आलमारी से है जिसका ताला दोनों तरफ़ से बंद है।”
“दोनों तरफ़ से?”
“हाँ,” रामदीन ने कहा। “एक तरफ़ से चाबी से, दूसरी तरफ़ से हिसाब से।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“और अब,” उसने कहा, “जो चाबी मेरे पास थी, वो तेरे पास है। तो सवाल ये है — दूसरी तरफ़ का ताला किसके पास है?”
मैंने टोकन निकाला। वो अब भी ठंडा था। पर उँगली जब निशान पर टिकी, तो एक शब्द उभरा, जैसे पानी के नीचे से तैरकर आया हो — “लक्ष्मी।”
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा।
“लक्ष्मी का बेटा,” मैंने कहा।
रामदीन का चेहरा बदल गया।
“क्या कहा तूने?”
“लक्ष्मी का बेटा,” मैंने दोहराया। “जिसका नाम कहीं नहीं।”
रामदीन ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
“मन्नू,” उसने धीरे से कहा, “लक्ष्मी का कोई बेटा नहीं था।”
“क्या मतलब?”
“लक्ष्मी के दो बेटे थे,” रामदीन ने कहा। “एक मर गया, जब वो छोटा था। और दूसरा —”
वो रुका।
“दूसरा कौन?”
रामदीन ने मेरी आँखों में देखा।
“दूसरा,” उसने कहा, “भवानी के होम में काम करता है, पर भवानी उसे नहीं जानता।”
“क्यों नहीं जानता?”
“क्योंकि,” रामदीन ने कहा, “भवानी उसे अपने बेटे की तरह पाल रहा है।”
मेरे हाथ से टोकन छूटने को हुआ। मैंने उसे पकड़ा, और उँगली फिर निशान पर टिकी — पर इस बार शब्द नहीं उभरा। बस टोकन ठंडा से गुनगुना हो गया, जैसे किसी ने दूर से उसे छुआ हो।
मैंने संदूक के ताले पर हाथ रखा। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
“रामदीन,” मैंने कहा, “अगर भवानी का बेटा उसका नहीं है, तो भवानी का असली बेटा कौन है?”
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा और बिना कुछ कहे दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गया, जैसे बाहर किसी को आते देखा हो।
बाहर गली में सफ़ेद गाड़ी की लाइट चमकी।
“संदूक के ताले पर वही निशान था जो मेरे टोकन पर था — और तब मैंने पहली बार सोचा कि भवानी को मेरे टोकन के बारे में कैसे पता चला।”
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