The Token System – Chapter 710
काग़ज़ खोला। पीला, पुराना। ऊपर मोटी स्याही में दो लाइनें थीं — “श्यामू, तू अपने भाई का हिसाब लेकर चल रहा है। अपना हिसाब भूल गया। लाठी वाले को मत छूना। वो तेरे भाई का ही आदमी है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
“रामदीन का आदमी?” बंसी ने कहा। “रामदीन तो मर गया।”
“मरा हुआ आदमी लाठी नहीं चलाता,” मैंने कहा। “कुछ गड़बड़ है।”
श्यामू ने काग़ज़ वापस जेब में रखा और अपना सिर पकड़कर बैठ गया।
“मैं नहीं जानता, भाई,” उसने कहा। “मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि मेरा भाई मरा नहीं। मैंने उसे ज़िंदा देखा है।”
“कब?”
“आज सुबह,” श्यामू ने कहा। “गफ़ूर के साथ। दफ़्तार के पीछे की गली में। वो घूम रहा था, जैसे कुछ ढूँढ रहा हो। मैंने उसे पुकारा — ‘रामदीन भाई’ — तो वो मुड़कर देखकर भाग गया।”
माँ ने धीरे से कहा, “तो वही है।”
सबने उनकी तरफ़ देखा।
“क्या?” मैंने पूछा।
“जो लाठी वाला है,” माँ ने कहा। “वो रामदीन है।”
ये सुनकर श्यामू उठ खड़ा हुआ।
“मेरा भाई ज़िंदा है? और लाठी से मुझे धमका रहा है?”
“या कोई उसे धमका रहा है,” मैंने कहा। “या वो किसी और के हिसाब में बंधा है।”
मैं संदूक की तरफ़ गया, उसके ताले को छुआ। ठंडा लोहा। पर उँगली जहाँ निशान पर थी, वहाँ से कुछ-कुछ महसूस हुआ — जैसे हल्की गर्मी।
“बंसी,” मैंने कहा। “श्यामू। माँ।”
“अब मत कहना कि तू अकेले जाएगा,” बंसी उठा।
“नहीं,” मैंने कहा। “अब मैं अकेले नहीं जाऊँगा।”
“तो क्या?”
“हमें ये संदूक यहीं नहीं छोड़ना,” मैंने कहा। “अगर ये चाबियों के बदले माँगा गया है, तो मतलब इसमें कुछ है जो उन्हें चाहिए।”
“और अगर हम इसे खोल लें?” रीना ने पूछा।
“ताले पर मेरे टोकन का निशान है,” मैंने कहा। “मतलब इसे खोलने की कोई और कुंजी है। और वो कुंजी किसी और के पास है।”
“किसके पास?”
मैंने टोकन जेब में रखा।
“यही ढूँढना है।”
शाम से पहले श्यामू फिर दुकान पर आया, पर इस बार उसके साथ कोई था — एक लंबा आदमी, पचास के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, पीली अँगूठी। बंसी की दुकान पर उसने कदम रखा और सीधे मेरी तरफ़ देखा।
“मनोहर?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“मैंने तुम्हारी गली में संदूक रखवाया था,” उसने कहा। “पर वो मेरा संदूक नहीं था। मुझे जीप वालों ने सिर्फ़ संदूक उतारने के पैसे दिए थे।”
“कौन जीप वाले?”
“मैं नहीं जानता।”
“तो क्यों आए हो?”
“क्योंकि,” उसने कहा, “उन्होंने मुझे एक पर्ची भी दी थी। कहा था — ‘अगर मनोहर पूछे, तो दे देना।’ मैंने उस वक़्त नहीं पढ़ी। घर जाकर पढ़ी, तो समझ नहीं आई। आज दिन भर सोचता रहा। फिर सोचा — जो भी हो, इसे पहुँचा दूँ।”
उसने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
काग़ज़ पर चार लाइनें थीं, मेरी ही छोटी सीधी लिखाई में — “तीन दिन का हिसाब, तीन चाबियों में। चौथी चाबी उस लाठी में है जो हमेशा साथ रहती है। और वो लाठी जिसे जानती है, वो आज दस बजे अस्पताल के पुराने फाटक पर मिलेगी।”
मैंने सिर उठाया।
“तुमने ये कब पढ़ी?”
“कल रात।”
“और तुमने आज दिन भर किसी को नहीं बताया?”
“अपनी बीवी को बताया,” उसने कहा। “उसने कहा — फेंक दे। मैंने नहीं फेंका।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” उसने कहा, “मेरी माँ ने मरने से पहले एक बात कही थी। उसने कहा था — ‘बेटा, एक दिन कोई तेरे पास काग़ज़ लेकर आएगा जिसमें तू नहीं समझेगा कि क्या लिखा है। उस वक़्त मत फेंकना। वो काग़ज़ तेरे बाप का हिसाब है।’”
बंसी ने उसकी तरफ़ देखा।
“तेरे बाप कौन थे?”
“तिजोरी वाले,” उसने कहा। “भवानी के दफ़्तार में तिजोरी का काम देखते थे। मेरा नाम सुखराम है।”
सुखराम। नाम से कुछ याद नहीं आया, पर चेहरा जाना-पहचाना लगा।
“तुम भवानी के दफ़्तार में काम करते हो?” मैंने पूछा।
“पहले करता था,” सुखराम ने कहा। “अब नहीं। मैंने छोड़ दिया जब उसने पापा को निकाल दिया।”
“क्यों निकाला?”
“क्योंकि पापा ने तिजोरी के एक ताले की चाबी छिपा दी थी,” सुखराम ने कहा। “वो चाबी आज तक नहीं मिली। भवानी ने साल भर पहले पापा को रिटायर कर दिया, पर चाबी आज भी गायब है।”
मैंने सुखराम की आँखों में देखा।
“तुम्हारे पापा की लाठी थी?” मैंने पूछा।
सुखराम ने गर्दन झुकाई।
“हाँ। लाठी हमेशा साथ रहती थी। पर अब वो उनके पास नहीं है। किसी ने उनकी मृत्यु के बाद लाठी ले ली।”
“तुम्हारे पापा मर गए?”
“तीन साल पहले।”
“तो लाठी किसने ली?”
“पता नहीं। पर एक आदमी ने कहा था कि लाठी अब ‘उस बूढ़े’ के पास है।”
“कौन सा बूढ़ा?”
“जो भवानी के साथ उसके दफ़्तार में घूमता है। साठ-पैंसठ साल का। सफ़ेद बाल। टोपी।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने सिर हिलाया — वही लाठी वाला।
“तो तुम्हारे पापा की लाठी में कुछ छिपा था?”
“मुझे नहीं पता क्या,” सुखराम ने कहा। “पर पापा कहते थे — ‘जो लाठी में है, वो मेरे साथ मरेगी नहीं।’”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
“तुम्हारे पापा ने अपनी लाठी किसी को दी भी थी?”
“मुझे नहीं पता,” सुखराम ने कहा। “पर हाँ, पापा के एक साथी थे, जो लाठी को छूने से मना करते थे। कहते थे — ‘ये लाठी सिर्फ़ मालिक के हाथ में रहेगी।’”
“और वो साथी कौन था?”
“रामदीन,” सुखराम ने कहा।
मैं चुप हो गया।
“रामदीन ज़िंदा है?” मैंने पूछा।
“मरा माना गया था,” सुखराम ने कहा। “पर मुझे लगता है वो ज़िंदा है।”
“क्यों?”
“क्योंकि जब पापा मरे, तो अर्थी के पीछे एक आदमी चल रहा था — लाठी लेकर। उसने चेहरा नहीं दिखाया। पर पापा की लाठी उसके हाथ में थी।”
रात का अंधेरा जल्दी आ गया। मैंने सुखराम को दुकान पर बंसी के साथ छोड़ा और घर लौटा। माँ चारपाई पर बैठी थी। रीना उसके पास।
“रीना,” मैंने कहा, “माँ के पास रहना।”
“तू कहाँ जा रहा है?”
“अस्पताल के पुराने फाटक पर।”
“मन्नू!”
“रीना,” माँ ने उसका हाथ पकड़ा। “ये दबे हुए चाबी जब तक न निकले, ये नहीं मानेगा। बैठ जा।”
“लेकिन माँ —”
“बैठ जा,” माँ ने कहा।
मैंने संदूक की तरफ़ आख़िरी बार देखा — काला, भारी, चुप्प — जैसे धरती पर पड़ा कोई इंतज़ार। उसके ताले पर वही निशान था जो मेरे टोकन पर था। मैंने टोकन जेब से निकाला और उसे उँगली में दबाया।
मैंने दरवाज़े से पहले एक पल रुककर माँ की तरफ़ देखा।
“माँ,” मैंने कहा, “लाठी वाला अगर रामदीन है, तो उसने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि,” माँ ने कहा, “वो ख़ुद किसी और के हिसाब में बंधा है।”
रात आठ बजे। मैं, बंसी और श्यामू अस्पताल के पुराने फाटक की तरफ़ चले। रास्ते में श्यामू ने कहा, “अगर मेरा भाई ज़िंदा है और छिप रहा है, तो उसका मतलब है कि वो भवानी के डर से छिपा है। पर भवानी तो उसे लाठी लेकर अपने साथ रखता है। तो वो छिपा क्यों है?”
“या फिर वो भवानी से छिपा है,” मैंने कहा, “और भवानी उसे लाठी वाले के रूप में जानता ही नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब — जो लाठी वाले को भवानी के आदमी समझते हैं, वो दरअसल किसी और का आदमी है। और भवानी को शक नहीं हुआ।”
“किसका आदमी?”
“यही तो,” मैंने कहा। “जो अंदर है। वो बच्चा नहीं है।”
हम फाटक के पास पहुँचे। पुराना लोहे का फाटक, जिस पर टाला लगा था। पास में एक बेंच और बेंच के पीछे अंधेरा। मैंने टोकन जेब में उँगली से छुआ — ठंडा।
बंसी ने धीरे से कहा, “अंदर से कोई आ नहीं रहा।”
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