The Token System – Chapter 709
“और तुम?”
“मैं घर।”
“मन्नू —”
“सुमन,” मैंने कहा, “जो भी ये खेल खेल रहा है, वो जानता है कि मैं कहाँ जाऊँगा। अगर वो मेरे घर पहुँच गया, तो माँ अकेली है।”
सुमन ने एक पल मेरी पट्टी पर नज़र डाली, फिर सिर हिलाया और बिना कुछ कहे चल पड़ीं।
मैं और बंसी पैदल ही मोहल्ले की तरफ़ चले। पिंटू साइकिल पर पीछे-पीछे आ रहा था।
रास्ते में बंसी ने कहा, “एक बात है।”
“बोल।”
“श्यामू कल रात से ग़ायब है। हरीश चंद्र के दफ़्तार के बाहर से निकला था, फिर कहीं नहीं दिखा।”
“उसने कुछ देखा था,” मैंने कहा। “शायद वो लाठी वाला बूढ़ा।”
“या फिर जो उस गाड़ी में बैठी औरत थी।”
घर की गली के मोड़ पर पहुँचे तो दरवाज़ा खुला था। खुला और अंदर से आवाज़ नहीं आ रही थी।
मेरे पैर रुक गए।
“बंसी,” मैंने कहा, “दरवाज़ा माँ कभी खुला नहीं छोड़ती।”
हम दौड़े।
अंदर माँ चारपाई के पास ज़मीन पर पड़ी थी। रीना उसके सिरहाने बैठी पंखा झल रही थी, आँखें लाल। मेज़ पर एक काला संदूक रखा था — लोहे का, मोटा, जैसे पुराने ज़माने की तिजोरी का छोटा भाई।
“माँ!” मैं घुटनों के बल बैठा। “माँ, उठो —”
माँ की आँख खुली। उसने मेरा चेहरा देखा और होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने उँगली उठाकर मेरी पट्टी की तरफ़ इशारा किया। आँख से आँसू बहकर कान तक आ गया।
“क्या हुआ?” मैंने रीना से पूछा। “किसने किया?”
रीना ने संदूक की तरफ़ देखा।
“दो आदमी आए थे,” उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी। “सफ़ेद जीप में। एक बड़ा संदूक लाए। माँ ने दरवाज़ा खोला तो उन्होंने संदूक अंदर रखा और एक पर्ची मेज़ पर रख दी। माँ ने पूछा — किसका है? तो उनमें से एक ने कहा — ‘तेरे बेटे को बोल देना, ये उसका हिसाब है।’ माँ ने उन्हें रोका, तो उस आदमी ने धक्का दे दिया। माँ गिर पड़ी।”
“किसने धक्का दिया?” मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी। “कैसा दिखता था?”
“लंबा, सफ़ेद कुर्ता। मुँछें — बड़ी।”
“और दूसरा?”
“पतला। साठ-पैंसठ। सफ़ेद बाल, टोपी। लाठी थी उसके हाथ में।”
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। दोनों को एक ही नाम याद आया — लाठी वाला बूढ़ा, जो अस्पताल से भागा था।
“कुछ और कहा?” मैंने पूछा।
“हाँ,” रीना ने कहा। “लाठी वाले ने दरवाज़े से लौटकर कहा — ‘तीन दिन ख़त्म। अब हिसाब बराबर करने का वक़्त है।’”
मैं उठा। संदूक के पास गया।
काला लोहा। भारी। ऊपर मोटा ताला, जिसका लटकता हुआ कुंडा ज़ंग से पीला पड़ा था। और ताले के ठीक बीच में, गहरा खुदा हुआ — वही निशान।
दो लकीरें। बीच में बिंदु।
बिल्कुल वैसा ही, जैसा मेरे टोकन पर था।
मेरे हाथ संदूक को छूने से पहले ही रुक गए। मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था — बिल्कुल ठंडा — पर जैसे ही मैंने उसे ताले के करीब लाया, टोकन पर सत्रहवीं आधी लकीर के आगे एक और आधी लकीर झलकी, फिर मिट गई।
“मन्नू,” बंसी ने कहा, “ये ताला…”
“हाँ,” मैंने कहा। “ये ताला मेरे टोकन का है। या फिर मेरा टोकन इस ताले का।”
“मतलब?”
मैंने संदूक के चारों तरफ़ घूमकर देखा। पीछे की तरफ़, नीचे के कोने पर, एक छोटी सी पीतल की पत्ती लगी थी। उस पर दो शब्द खुदे थे — “हिसाब। रुका।”
बंसी ने पर्ची उठाई जो मेज़ पर रखी थी। पढ़कर मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
“तीन दिन ख़त्म। अब हिसाब बराबर करने का वक़्त है। संदूक तभी खुलेगा जब मनोहर अपनी सारी चाबियाँ हमारे हवाले कर दे। वरना जो अंदर है, वो हमेशा के लिए बंद रहेगा।”
“कौन सी चाबियाँ?” रीना ने पूछा।
“हवेली की,” मैंने कहा। “तीनों। और नींव वाली। और पापा के कमरे की।”
“दे दे,” रीना ने कहा। “दे दे न, मन्नू। माँ…”
“रीना।”
“माँ गिरी है! तूने देखा नहीं?”
“रीना,” मैंने उसका कंधा पकड़ा, “अगर मैं चाबियाँ दे दूँ, तो हवेली का हिसाब हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। जो काग़ज़ उस दीवार में हैं, वो उनके हाथ लग जाएंगे। और फिर माँ को ठीक करने वाला कोई नहीं बचेगा।”
“तो माँ को कौन ठीक करेगा?” रीना फूट-फूटकर रो पड़ी।
माँ ने रीना का हाथ खींचा। उसकी आवाज़ आई — धीमी, रूखी।
“चुप।”
रीना चुप हो गई।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
“मन्नू, पट्टी बदल,” उसने कहा। “खून सूख गया है।”
“माँ, तुम…”
“मैं ठीक हूँ,” उसने कहा। “पहले पट्टी।”
मैं बैठ गया। माँ उठी, किसी तरह, और रीना की मदद से रसोई से साफ़ कपड़ा लाई। मेरे सिर की पट्टी खोलते हुए उसके हाथ काँप रहे थे, पर चेहरा सख़्त था।
“तेरे दादा के साथ भी ऐसा ही हुआ था,” माँ ने धीमे से कहा। “सिर पर पट्टी, और फिर चुप।”
“मैं चुप नहीं रहूँगा।”
“मैंने ये नहीं कहा कि तू चुप रह,” माँ ने कपड़ा कसकर बाँधा। “मैंने ये कहा कि तेरे दादा चुप हो गए थे। तू नहीं होना।”
वो मेरे सामने बैठी और मेरी आँखों में देखा।
“उस लाठी वाले को मैं जानती हूँ,” उसने कहा।
मैं सीधा हो गया।
“क्या?”
“नाम नहीं पता,” माँ ने कहा। “पर उसकी लाठी का हैंडल — उस पर वही निशान है जो तेरे टोकन पर। मैंने उसे एक बार तेरे पापा के कमरे में देखा था। तेरे पापा ने उससे कुछ लिया था। और फिर उसे वापस करने की क़सम खाई थी।”
“क्या लिया था?”
“मुझे नहीं बताया। बस इतना कहा था — ‘ये चीज़ अगर मेरे पास रही, तो मेरा बेटा सीधा रास्ते पर नहीं चलेगा।’”
बंसी ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, “मतलब वो लाठी वाला कोई बाहर का नहीं। वो पापा के हिसाब का हिस्सा है।”
“और अब वो भवानी के साथ है,” मैंने कहा।
“या भवानी उसके साथ है,” माँ ने कहा।
हम सब एक पल चुप रहे। फिर बाहर गली में किसी के दौड़ने की आवाज़ आई। दरवाज़े पर श्यामू खड़ा था — हाँफता हुआ, कुर्ता फटा, मुँह पर धूल।
“मन्नू भाई!” वो अंदर घुसा। “मैं — मैं कल रात से उनके पीछे था —”
“बैठ,” मैंने कहा। “पानी पी।”
“पानी नहीं,” उसने हाथ उठाया। “सुनो। कल रात मैं हरीश चंद्र के दफ़्तार से निकला, तो मुझे वो सफ़ेद जीप दिखी। मैं उसके पीछे-पीछे गया। वो तुम्हारी गली की तरफ़ आई। रास्ते में एक जगह रुकी, और उसमें से एक आदमी उतरा — बड़ी मूँछों वाला, लंबा। उसने रास्ते में एक लड़के से तुम्हारी गली का पता पूछा। फिर जीप आगे बढ़ी।”
“और संदूक?”
“वो जीप में था,” श्यामू ने कहा। “बड़ा सा। काला। दो आदमी उसे उठाकर लाए थे — लाठी वाला बूढ़ा भी था उनमें। मैंने उसे लाठी से पहचाना।”
“तो संदूक यहाँ कैसे पहुँचा?” बंसी ने पूछा। “अगर तू उनके पीछे था, तो तूने उन्हें संदूक रखते देखा होता।”
श्यामू ने गला साफ़ किया।
“मैं — मैं जीप के पीछे नहीं रहा,” उसने कहा। “मैं रास्ते में रुक गया। एक दुकान पर। सोचा — फ़ोन करूँ। फिर डर गया। जब लौटा, तो जीप जा चुकी थी।”
“तो तूने ये नहीं देखा कि संदूक किसने रखा?”
“नहीं।”
मैंने श्यामू की तरफ़ देखा। वो थका हुआ था, डरा हुआ था — पर उसकी आँखें साफ़ थीं।
“श्यामू,” मैंने कहा, “तू कल रात से कहाँ था?”
“मैं — मैं छुपा था,” उसने कहा। “उस लाठी वाले ने मुझे देख लिया था। हरीश चंद्र के दफ़्तार के बाहर। उसने मेरी तरफ़ देखकर लाठी उठाई थी। मैं भाग गया।”
“क्यों उठाई?”
श्यामू ने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला।
“क्योंकि,” उसने कहा, “उसने मुझे ये देने के लिए कहा था।”
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