The Token System – Chapter 708
“शेखर बाबू,” मैंने कहा, “तुम्हारे भतीजे को किसने भेजा था? भवानी ने, या वो लाठी वाला?”
शेखर बाबू ने गर्दन उठाई।
“मुझे भवानी साहब का फ़ोन आया था,” वो बोले। “पर फ़ाइल मैंने खुद उठाई थी। फ़ाइल देने के बाद जब मैं नीचे उतरा, तब मेरे भतीजे के साथ वो लाठी वाला खड़ा था। उसने मेरा कंधा पकड़ा और कहा — ‘तू बस फ़ाइल देता जा, बाकी हम देख लेंगे।’”
“तो सिर पर वार उसने किया?”
“मैंने नहीं देखा,” शेखर बाबू ने कहा। “पर मैंने भवानी साहब को एक बार ये कहते सुना था — ‘वो लाठी वाला डरा नहीं, सीधा मारता है।’”
मैं कमरे से बाहर आया। गलियारे में शालिनी खड़ी थी, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा।
“मनोहर भाई,” उसने कहा, “ये आपके दरवाज़े के नीचे से मिला। किसी ने अभी डाला।”
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक पर्ची थी — मेरी ही लिखाई में, पर मैंने नहीं लिखी:
“सिर पर वार उसने किया जो तेरा कल अपना हिसाब लिखेगा। कल अदालत में जो चाबी पेश होगी, वो अधूरी है। पूरी चाबी उसके पास है जिसकी तस्वीर मैंने शेखर बाबू के बैग में देखी।”
मैंने पर्ची पलटी। पीछे एक नाम था — “लक्ष्मी का बेटा।”
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
“ये लिफ़ाफ़ा किसने डाला?”
“कोई दिखा नहीं,” उसने कहा। “बस एक साइकिल की घंटी सुनाई दी और ये पड़ा मिला।”
मैंने पर्ची जेब में रखी। मेरे पीछे गलियारे के आख़िर में एक शक्ल गुज़री — सफ़ेद कुर्ता, झुकी कमर, हाथ में लाठी। मैं भागा।
गलियारा खाली था। सिर्फ़ बाहर के दरवाज़े की सीढ़ियों पर एक पुरानी साइकिल खड़ी थी, हैंडल पर रस्सी बँधी।
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। सामने सड़क पार करके एक बूढ़ा आदमी जा रहा था — सफ़ेद कुर्ता, टोपी, लाठी। पर वो हमारी तरफ़ नहीं, दूसरी तरफ़ जा रहा था।
“ओ बाबा!” मैंने आवाज़ दी।
वो नहीं रुका। पर उसकी लाठी एक बार ज़मीन पर ठोकी गई — तीन बार, लगातार, जैसे कोई इशारा हो। फिर वो गली के मोड़ पर मुड़ गया।
मैं उसके पीछे दौड़ा, पर मोड़ पर पहुँचा तो वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ एक पुरानी दीवार और दीवार पर कोयले से बना एक निशान — उलटा कोना-चिह्न।
मैं रुक गया।
जेब से टोकन निकाला। वो अब भी ठंडा था। पर उस पर सोलह लकीरों के नीचे एक नई आधी लकीर उभर आई थी — जैसे अभी-अभी शुरू हुई हो।
मैंने पीछे मुड़कर अस्पताल की तरफ़ देखा। इमरजेंसी की खिड़की से सुमन मेरी तरफ़ देख रही थीं। उन्होंने हाथ हिलाया — “आ जा।”
मैं वापस चला। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मेरे मन में एक ही बात थी — लक्ष्मी का बेटा। लक्ष्मी का बेटा, जो उन काग़ज़ों को लेकर आया था। लक्ष्मी का बेटा, जो भवानी के होम का काम देखता था। लक्ष्मी का बेटा — जिसका नाम कहीं नहीं…
मैं दरवाज़े पर पहुँचा। सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस एक बूढ़ा और उसकी लाठी।”
“मन्नू…”
“सुमन,” मैंने उनकी आँखों में देखा, “शेखर बाबू मान गए हैं। कल गवाही देंगे। और उन्होंने बताया कि सिर पर वार किसने किया — वो लाठी वाला। शेखर बाबू के भतीजे के साथ था।”
सुमन ने मेरे हाथ की पकड़ कस दी।
“तो अब क्या?”
“अब,” मैंने कहा और टोकन जेब में रखा, “हरीश चंद्र के पास। कल से पहले उन्हें सब कुछ पता होना चाहिए — शकुंतला की फ़ाइल, शेखर बाबू की गवाही, और लक्ष्मी का काग़ज़।”
“और ये पर्ची?”
“ये पर्ची,” मैंने उसे दिखाई, “कह रही है कि कल जो चाबी अदालत में पेश होगी, वो अधूरी है। पूरी चाबी उसके पास है जिसकी तस्वीर शेखर बाबू के बैग में देखी गई।”
“कौन?”
“लक्ष्मी का बेटा,” मैंने कहा। “जिसका नाम कहीं नहीं लिखा। और जो कल अदालत में हिसाब खोलेगा।”
सुमन एक पल चुप रहीं। फिर बोलीं — “तो कल से पहले उसे ढूँढना है।”
“हाँ,” मैंने कहा। “पर पहले एक काम है।”
“क्या?”
मैंने शेखर बाबू के दफ़्तार की तरफ़ देखा।
“शेखर बाबू ने कहा था — सिर पर वार उसने किया जो भवानी के आदेश से नहीं, अपने हिसाब से चला। भवानी ने कहा था — डरा दो, मारो नहीं। फिर सिर पर वार किसने किया? भवानी के आदेश तो कुछ और ही थे।”
मैंने पर्ची फिर पढ़ी। उस पर मेरी ही लिखाई थी, पर मैंने कभी वो लाइन नहीं लिखी। और नीचे जो नाम था — “लक्ष्मी का बेटा” — वो किसी और ने जोड़ा था।
“सुमन,” मैंने कहा, “ये पर्ची मेरे हाथ में किसी ने डाली है। और वो जानता है कि मैं कल अदालत जाऊँगा।”
“तो?”
“तो वो भी जानता है,” मैंने कहा, “कि मैं कल से पहले उससे मिलने आऊँगा।”
मैंने टोकन निकाला। वो अब भी ठंडा था, पर उस नई आधी लकीर पर उँगली फेरते हुए मैंने महसूस किया — जैसे कोई तार खिंच रहा हो, कहीं दूर से।
“चल,” मैंने सुमन से कहा, “पहले हरीश चंद्र। फिर अस्पताल का पिछला फाटक।”
“वहाँ क्यों?”
“क्योंकि वो औरत — लक्ष्मी — वहीं से भागी थी,” मैंने कहा। “और उसका बेटा भी वहीं से आया होगा।”
सुमन ने मेरी पट्टी की तरफ़ देखा।
“सिर ठीक है?”
“सिर ठीक है,” मैंने कहा। “हिसाब बाकी है।”
हम सीढ़ियों से उतरे। बाहर धूप तेज़ हो रही थी। सामने बंसी का चेला पिंटू साइकिल पर आ रहा था, हाथ में चाय का कुल्हड़।
“मन्नू भाई!” वो चिल्लाया। “बंसी भाई ने कहा — तुम्हें दुकान पर बुला रहे हैं। कह रहे हैं कुछ ज़रूरी है।”
“क्या?”
“नहीं बताया,” पिंटू ने कहा। “पर एक बात और — बंसी भाई के घर के बाहर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी है। खाली।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
“लगता है,” मैंने कहा, “आज हिसाब खुद मेरे पास आ रहा है।”
और हम तीनों — मैं, सुमन और पिंटू — बंसी की दुकान की तरफ़ चल पड़े, जहाँ चाय हमेशा की तरह उबल रही थी, पर आज उसकी भाप में कुछ और भी उठ रहा था।
॥
बंसी की दुकान के सामने सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। खाली। बोनट पर धूल थी, और धूल में किसी ने उँगली से निशान बनाया था — वही कोना-चिह्न, दो लकीरें और बीच में बिंदु।
बंसी दुकान के पीछे खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास, पर पी नहीं रहा था। उसने मुझे देखा और सीधा अंदर बुलाया।
“देखा?” उसने कहा।
“देखा। गाड़ी तीन घंटे से खड़ी है। कोई नहीं उतरा, कोई नहीं चढ़ा।”
“और ये,” उसने गाड़ी की सीट पर रखी पीली पर्ची उठाई। “अभी-अभी किसी लड़के ने दौड़कर सीट पर फेंकी और भाग गया।”
पर्ची पर पाँच शब्द थे — “जो अंदर है, वो बच्चा नहीं है।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सख़्त हो गया।
“कौन सा बच्चा?” सुमन ने पूछा।
“यही तो,” बंसी ने कहा। “कोई बच्चा नहीं है, पर बच्चा कहकर डरा रहे हैं। मतलब जो हमारे पास है, वो बच्चा नहीं।”
“कमला का छोटू?” मैंने कहा।
“या अस्पताल में जो बचा, वो।”
मैंने पर्ची उलटी की। पीछे कुछ नहीं था। बस किनारे पर एक छोटा सा धब्बा-सा था, जैसे कोई उँगली रगड़कर मिटा गया हो।
“ये गाड़ी,” बंसी ने कहा, “भवानी की नहीं है। भवानी की गाड़ियों के बोनट पर उसका झंडा-सा निशान होता है। ये सादी है। खाली।”
“तो किसकी?”
“यही सोच रहा हूँ।”
पिंटू साइकिल से उतरा और पीछे आकर खड़ा हो गया।
“भाई,” उसने कहा, “मैंने इस गाड़ी को सुबह देखा था। उस वक़्त इसमें एक औरत बैठी थी। सिर ढका हुआ था। काले कुर्ते में।”
“कहाँ गई?”
“पता नहीं। जब मैं लौटा तो गाड़ी खाली थी।”
मैंने सुमन से कहा, “आप अस्पताल जाइए। छोटू और उसकी माँ के पास कोई रहे।”
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