The Token System – Chapter 705
रस्सी पकड़कर मैं कुएँ में उतरने ही वाला था कि तभी पीछे से कुत्ते भौंकने लगे। एक आदमी दौड़ता हुआ आया और उसने रोशनी की तरफ़ इशारा किया।
पर जैसे ही मैंने रस्सी पकड़ी, बंसी मेरे आगे आ गया। भवानी का आदमी पीछे हटा और मेरी तरफ़ देखकर हँसा। उसकी हँसी इस कुएँ की तरह ठंडी थी।
“ठाकुर साहब ने कहा था,” उसने कहा, “आज तू खुद मेरे हाथ लगेगा।”
॥
रस्सी मेरे हाथ से छूट गई और मैं पीछे हटा। बंसी ने मेरा बाज़ू पकड़कर खींचा — “भाग, बेवकूफ़, कुएँ में नहीं, गली में।”
हम भागे। पीछे भवानी के आदमी की साँसें सुनाई दे रही थीं, भारी और तेज़। गली का मोड़ आया, फिर दूसरा। मैंने बंसी को बाईं तरफ़ धकेला और खुद दाईं तरफ़। बंसी चिल्लाया — “दुकान!” मैं समझ गया।
हम बंसी की चाय की दुकान के पीछे वाले कमरे में घुसे। बंसी ने शटर गिराया, पर आधा ही — शटर की ज़ंजीर फँस गई। “रहने दे,” मैंने कहा, “दुकान खुली दिखेगी तो कोई शक नहीं करेगा।”
हम खटिया के नीचे दुबक गए। दरवाज़े पर पैरों की आवाज़ आई। भवानी का आदमी दुकान के सामने रुका। मैंने उसकी परछाईं देखी — लंबी, दुबली, दरवाज़े के सामने ठिठकी हुई।
तभी मोहल्ले की गली से आवाज़ आई — किसी बच्चे ने चिल्लाकर कहा, “अरे, ये कौन है? रात को कोई आदमी खड़ा है!” और फिर औरतों की आवाज़ें मिलीं — “कौन है भाई? यहाँ क्या कर रहे हो?” कोई बाल्टी की आवाज़ आई, कोई झाड़ू की।
उसकी परछाईं हिली और हट गई। मैंने खटिया के नीचे से झाँका — वो गली के मोड़ की तरफ़ तेज़ कदमों से जा रहा था, और पीछे शांति काकी की आवाज़ आ रही थी, “भागो मत, तुम्हें पहचान लिया!”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “ये औरतें अगर न होतीं तो आज हम दोनों…”
“हाँ,” मैंने कहा, “कल सुबह तक इंतज़ार करते।”
हम दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठे रहे। बंसी ने पुरानी अलमारी से एक तामचीनी का डिब्बा निकाला और उसमें से गुड़ की डली निकाली। “ले, मुँह मीठा कर।”
मैंने डली मुँह में रखी। “कल सुबह हरीश चंद्र के पास जाना है। जो काग़ज़ नींव के कमरे में मिले थे, उन्हें उन्हें दिखाना है।”
“और टोकन?” बंसी ने पूछा।
मैंने अपनी जेब टटोली। टोकन ठंडा था। “ये मेरे पास रहेगा। हरीश चंद्र को सिर्फ़ काग़ज़ दिखाऊँगा।”
सुबह छह बजे हम हरीश चंद्र के दफ़्तार पहुँचे। वो अभी नहाए भी नहीं थे — नीली धोती और कंधे पर तौलिया। “इतनी सुबह?” उन्होंने चश्मा पहनते हुए कहा।
“सुनवाई कल है, वकील साहब,” मैंने कहा। “और मेरे पास कुछ काग़ज़ हैं जो ये साबित करते हैं कि भवानी के दादा ने हिस्सा बाँटकर भी गरीबों वाला हिस्सा कभी दिया ही नहीं।”
हरीश चंद्र ने काग़ज़ लिए, मेज़ पर फैलाए, और एक-एक पन्ना पढ़ने लगे। उनका चेहरा बदलता गया — पहले हैरानी, फिर सन्नाटा, फिर एक लंबी साँस।
“मन्नू,” उन्होंने काग़ज़ नीचे रखते हुए कहा, “ये काग़ज़ सौ साल पुराने हैं। इनमें लिखा है कि हर हिस्से की कमाई का तिहाई हिस्सा उस इलाक़े के गरीबों के इलाज पर जाएगा। और भवानी के दादा ने सिर्फ़ पहले दो साल दिया। उसके बाद हिसाब में घपला।”
“तो ये अदालत में जमा हो सकते हैं?” मैंने पूछा।
“हो सकते हैं,” उन्होंने कहा, “पर एक शर्त है। इन्हें जमा करने वाले को भी कोर्ट के सामने खड़ा होना पड़ेगा। तू खड़ा हो सकता है?”
“मैं तो पहले से खड़ा हूँ,” मैंने कहा।
मैंने काग़ज़ हरीश चंद्र की मेज़ पर रख दिए, पर जब मैंने पीछे से लाल पोटली निकाली तो उसे अपनी जेब में ही रखा। हरीश चंद्र की नज़र पोटली पर पड़ी — एक पल के लिए — फिर वो काग़ज़ों में लग गए।
“ये काग़ज़ आज ही सील करा लेता हूँ,” उन्होंने कहा। “कल सुबह जज के सामने पेश करूँगा।”
मैं बाहर निकला ही था कि मेरा मोबाइल बजा। सुमन का नंबर था।
“मन्नू,” उनकी आवाज़ तेज़ थी, “अस्पताल आ जा। जल्दी।”
“क्या हुआ?”
“भवानी के होम में एक मरीज़ की मौत का मामला दबाया गया है। पिछले महीने की बात है। फ़ाइल अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड कमरे में है। मुझे आज सुबह ख़बर मिली है।”
“किसने बताया?”
“कोई औरत थी। फ़ोन पर। नाम नहीं बताया। बस इतना कहा कि फ़ाइल रिकॉर्ड कमरे में है और उसे कोई निकालने वाला नहीं है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। “तू घर जा,” मैंने कहा। “माँ को बता देना कि मैं अस्पताल गया हूँ।”
“अकेले?”
“सुमन हैं ना।”
बंसी ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। “वो चीज़ संभालकर रखना।”
“रखे हुए है।”
अस्पताल पहुँचकर मैंने सीधे दूसरी मंज़िल का रास्ता लिया। रिकॉर्ड कमरे का दरवाज़ा खुला था — सुमन पहले से अंदर थीं। कमरे में धूल और बंद काग़ज़ों की गंध थी। रैक पर फ़ाइलें बेतरतीब पड़ी थीं।
“मुझे यहाँ आना मना है,” सुमन ने धीरे से कहा। “मैं ड्यूटी पर हूँ। तू अंदर जा। मैं बाहर खड़ी रहूँगी। अगर कोई आए तो खाँसूँगी।”
मैंने फ़ाइलें खँगालनी शुरू कीं। पंद्रह मिनट बाद मुझे एक पीली फ़ाइल मिली — “मरीज़: शकुंतला देवी, अड़तालीस साल, भर्ती: रात ग्यारह बजे, हालत: स्टेबल, भेजा गया: भवानी नर्सिंग होम।” और नीचे एक लाइन जो किसी और की लिखाई में जोड़ी गई थी — “मृत्यु: अगली सुबह, कारण: देर से इलाज।”
मैंने फ़ाइल की कॉपी बनाई और उसे अपनी जेब में रखा। मैंने रैक वापस सीधा किया और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा।
मुझे कुछ पीछे से टकराया — सिर के पीछे, ज़ोर से। मेरे घुटने मुड़े और फ़र्श मेरी तरफ़ आ गया।
मैं पस्त पड़ा रहा। कितनी देर, पता नहीं। जब आँख खुली तो रिकॉर्ड कमरे का दरवाज़ा खुला था और बाहर गलियारे की लाइट जल रही थी। मेरे सिर के पीछे से खून बह रहा था — मैंने हाथ लगाकर देखा, उँगलियाँ भीगी थीं।
और मेरी जेब ज़ोर से गरम थी।
मैंने टोकन निकाला। वो हथेली में जल रहा था।
कान में आवाज़ आई — अस्पताल, आपातकाल, जान बचानी है।
मैं उठा। सिर घूमा, पर दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया। गलियारे में भागते कदमों की आवाज़ आई। सुमन की आवाज़ — “मन्नू! मन्नू, नीचे आ!”
मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा, पर तभी इमरजेंसी की तरफ़ से एक औरत की चीख़ आई — “डॉक्टर! बच्चा साँस नहीं ले रहा!”
मैंने खुद को सीढ़ियों से नीचे गिराया। सुमन मेरी तरफ़ दौड़ीं पर मैंने हाथ से इशारा किया — “पहले बच्चा।”
इमरजेंसी में एक औरत बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी। बच्चा नीला पड़ रहा था। सुमन ने बच्चा उसकी गोद से लिया और स्ट्रेचर की तरफ़ दौड़ीं। “ऑक्सीजन! जल्दी!”
मैं दीवार का सहारा लेकर खड़ा रहा। मेरा सिर चकरा रहा था। सुमन ने बच्चे को मशीन पर लगाया और पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। “तू भी लेट जा, बेवकूफ़!”
“पहले ये,” मैंने कहा। “ये किसका बच्चा है?”
औरत ने रोते हुए कहा, “मेरा। छोटू। उसे कल शाम से बुख़ार था। हम भवानी के होम ले गए थे तो उन्होंने कहा — भर्ती करो, पैसे जमा कराओ। पर हमारे पास पैसे नहीं थे। तो उन्होंने हमें यहाँ भेज दिया — रात में।”
“रात में?” सुमन ने पूछा। “कौन भेजा?”
“सफ़ेद कोट वाला आदमी। वो बोला — यहाँ डॉक्टर साहिबा हैं, वो देख लेंगी। मुझे मालूम नहीं था कि ये पैसे वाले बात करते हैं।”
सुमन की आँखें मेरी तरफ़ आईं।
तभी कोई और आया — इमरजेंसी के दरवाज़े पर सफ़ेद कोट में एक आदमी खड़ा था। उसने हमारी तरफ़ देखा और पीछे मुड़ा।
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